हर घर की एक जानी-पहचानी तस्वीर है। सत्यनारायण की कथा पूरी हुई, आरती हो गई, और पंडित जी ने कहा — "हाथ आगे कीजिए।" दाहिनी हथेली पर चार दाने अक्षत, और कलाई पर लाल-पीले धागे के कुछ फेरे। फिर मंत्र की एक पंक्ति, एक गाँठ — और कलावा बँध गया।
पर उसके बाद के सवाल हर किसी के मन में आते हैं, और Google पर सबसे ज़्यादा यही खोजे जाते हैं — कलावा कौन से हाथ में बांधना चाहिए? कितने दिन तक पहनना चाहिए? कब उतारना या बदलना चाहिए? बांधते समय कौन सा मंत्र बोलें? और पुराने कलावे का क्या करें?
इंटरनेट पर इन सवालों के बहुत पक्के-पक्के जवाब मिलते हैं — "21 दिन", "मंगलवार को ही उतारें", "तीन बार लपेटें"। मैंने इन जवाबों का स्रोत खोजने के लिए भविष्य पुराण, शांखायन गृह्यसूत्र और हिंदी-संस्कृत कोश के संदर्भों से मिलान किया। जो मिला, वह इस लेख में है — और जो नहीं मिला, वह भी साफ़-साफ़।
कलावा क्यों बांधते हैं? — सीधा जवाब
कलावा रक्षा का धागा है। पूजा, यज्ञ या संस्कार के बाद पुरोहित या घर का कोई बड़ा इसे कलाई पर बाँधता है, इस भाव के साथ कि बाँधने वाले का आशीर्वाद और देवता की रक्षा पहनने वाले के साथ रहे। इसके और नाम हैं — मौली, रक्षासूत्र, प्रतिसर, और दक्षिण में कापु। Wikipedia इसे यों परिभाषित करता है:
“a red-yellow coloured ritual protection thread, sometimes with knots” … “tied by the priest or oldest family member on the wrist of a devotee, patron, loved one”
— Kautuka, Wikipedia (साभार: Wikipedia)हिंदी-अंग्रेज़ी कोश में भी "कलावा" का अर्थ यही है — "a red thread (tied on the wrist by the Hindus on auspicious occasions)" (A practical Hindi-English dictionary, साभार: wisdomlib.org)।
"मौली" शब्द पर एक बात। इंटरनेट पर लिखा मिलता है कि "मौली" का अर्थ "सबसे ऊपर" है, इसलिए यह "श्रेष्ठ धागा" है। मैंने संस्कृत कोश देखे तो "मौलि" का अर्थ सिर, मुकुट या शिखर मिला — पर धागे वाला अर्थ किसी कोश में नहीं मिला। धागे के लिए "मौली" नाम लोक-प्रयोग से आया लगता है; इसकी व्युत्पत्ति पर मैं पक्का दावा नहीं करूँगा।
कलावा बांधने का मंत्र — और वह किस ग्रंथ में है
"कलावा बांधते समय कौन सा मंत्र बोलना चाहिए" — यह सवाल सबसे ज़्यादा खोजा जाता है। जवाब है यह श्लोक, जो पंडित जी लगभग हर पूजा के बाद बोलते हैं:
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥
yena baddho balī rājā dānavendro mahābalaḥ / tena tvāmabhibadhnāmi rakṣe mā cala mā cala
अर्थ (Roopalia): "जिस (रक्षा) से दानवों के राजा, महाबली बलि बाँधे गए थे, उसी से मैं तुम्हें बाँधता हूँ। हे रक्षा, तुम डिगना मत, डिगना मत।"
मैंने इसका स्रोत खोजा। यह श्लोक भविष्य पुराण, उत्तरपर्व, अध्याय 137, श्लोक 20 में है (संस्कृत पाठ, साभार: wisdomlib.org)। इतिहासकार आर. सी. हाज़रा ने अपनी पुस्तक Studies in the Upapuranas में इसी अध्याय का विषय लिखा है — "137 (on sravana-purnima-raksa-bandhana-vidhi)", यानी श्रावण पूर्णिमा के रक्षाबंधन की विधि (साभार: wisdomlib.org)। हाज़रा इस भाग को "भविष्योत्तर" नाम से अलग ग्रंथ भी मानते हैं, इसलिए कहीं-कहीं आपको यही श्लोक "भविष्योत्तर पुराण" के नाम से मिलेगा।
पाठ का एक छोटा फ़र्क़। कई जगह यह श्लोक "तेन त्वां प्रतिबध्नामि रक्ष मा चल" लिखा मिलता है। जिस प्रामाणिक पन्ने पर मैंने मूल पाठ पढ़ा, वहाँ "त्वाम् अभिबध्नामि" और "रक्षे" है। "प्रतिबध्नामि" वाला रूप मुझे किसी प्रामाणिक पन्ने पर नहीं मिला — अर्थ दोनों का लगभग एक ही है, पर जो पाठ मिला, वही ऊपर दिया है।
पर उसी अध्याय में एक और बात है, जो आज के कलावे से थोड़ी अलग है — और बहुत दिलचस्प है।
मूल रूप में "रक्षा" सिर्फ़ धागा नहीं, एक पोटली थी
भविष्य पुराण के इसी अध्याय में रक्षा बनाने की विधि है:
- दिन: "संप्राप्ते श्रावणे चैव पौर्णमास्यां दिनोदये" — श्रावण की पूर्णिमा को, दिन चढ़ने पर (श्लोक 10)।
- रक्षा कैसी: "रक्षापोटलिकाः शुभाः कारयेच्चाक्षतैः शस्तैः सिद्धार्थैः हेमभूषिताः" — अपराह्न में अक्षत और सिद्धार्थ (सफ़ेद सरसों) की शुभ "रक्षा-पोटलियाँ" बनवाएँ, सोने से सजी हुई (श्लोक 14)।
- फल: "स सर्वदोषरहितः सुखी संवत्सरं भवेत्" — वह सब दोषों से रहित होकर एक वर्ष तक सुखी रहता है (श्लोक 22)।
(संस्कृत पाठ साभार: wisdomlib.org; अर्थ Roopalia के।) यानी रक्षाबंधन की मूल "रक्षा" अक्षत-सरसों की पोटली थी जो धागे से बाँधी जाती थी। आज वह पोटली छूट गई है और सिर्फ़ धागा रह गया है — वही कलावा। और ध्यान देने की बात — शास्त्र में मुझे जो एकमात्र अवधि मिली, वह "एक वर्ष" है, और वह भी धागा उतारने का नियम नहीं, रक्षा का फल है।
विवाह का सूत्र — सबसे पुराना लिखित रूप
कलाई पर धागे की परंपरा पुराणों से भी पुरानी है। शांखायन गृह्यसूत्र (1.12) में विवाह की विधि में वर, वधू के दाहिने हाथ में "a string of three twisted threads" — तीन लड़ों को बटकर बना धागा — देता है, और वधू के संबंधी उसे "a red and black, woollen or linen cord" यानी लाल-काली डोरी बाँधते हैं (The Grihya Sutras, SBE 29, अनुवाद: हरमन ओल्डेनबर्ग, साभार: sacred-texts.com)। आज भी हल्दी के समय वर-वधू के हाथ में बँधने वाला "कंगना" इसी परंपरा का रूप है। शादी की रस्मों पर हमारा लेख — शादी में कितने फेरे होते हैं।
कलावा कौन से हाथ में बांधना चाहिए?
परंपरा में सबसे प्रचलित नियम यह है: पुरुष दाहिने हाथ में, स्त्रियाँ बाएँ हाथ में। Wikipedia भी इसी को परंपरा के रूप में लिखता है — "traditionally worn on the right wrist or arm by the males and on the left by the females"।
पर यहाँ भी ईमानदारी ज़रूरी है: इस नियम का शास्त्रीय स्रोत मुझे नहीं मिला। उलटे, जो ग्रंथ मैंने पढ़ा, उसमें शांखायन गृह्यसूत्र वधू के भी दाहिने हाथ की बात करता है। इसलिए व्यवहार में — अपने परिवार और अपने पंडित जी की रीत मानिए; कई परिवारों में सभी को दाहिने हाथ में ही बाँधा जाता है — दोनों रीतें प्रचलित हैं।
कितनी बार लपेटना चाहिए?
"तीन बार", "पाँच बार", "सात बार" — तीनों जवाब इंटरनेट पर मिलते हैं। किसी ग्रंथ में फेरों की गिनती नहीं मिली। शांखायन गृह्यसूत्र में "तीन लड़ों" का धागा ज़रूर है, पर वह धागे की बनावट है, फेरे नहीं। व्यवहार में धागा इतना लपेटा जाता है कि कलाई पर टिका रहे और ढीला होकर फिसले नहीं।
अब वह सवाल, जिस पर सबसे ज़्यादा भ्रम है — कितने दिन तक?
कलावा कितने दिन तक पहनना चाहिए, और कब बदलना चाहिए?
मैंने सीधा जवाब खोजा: "21 दिन" या "मंगलवार/शनिवार को बदलें" जैसे नियमों का कोई शास्त्रीय स्रोत मुझे नहीं मिला। ये बातें समाचार-पोर्टलों और ब्लॉगों में मिलती हैं, पर वे किसी ग्रंथ का नाम नहीं बताते। शास्त्र में मिली एकमात्र अवधि भविष्य पुराण की "एक वर्ष तक सुखी" वाली है — जो रक्षा का फल है, धागा पहनने की शर्त नहीं।
तो व्यवहार में क्या करें? परंपरा और समझ दोनों को मिलाकर यह क्रम ठीक बैठता है:
- अगली पूजा तक — ज़्यादातर घरों में कलावा अगली कथा, व्रत या त्योहार पर नया बँधता है, और पुराना तभी उतरता है। यह सबसे सहज नियम है।
- जब धागा मैला, गीला-सा या फटने लगे — फीका और घिसा धागा न देखने में अच्छा, न साफ़-सफ़ाई के लिहाज़ से।
- जब त्वचा पर खुजली या दाने हों — तुरंत उतार दीजिए (नीचे "फ़ायदे का सच" देखें)।
- अगर आपके परिवार में कोई ख़ास दिन तय है — मंगलवार, शनिवार या पूर्णिमा — तो उसी को मानिए। यह परिवार की रीत है, और उसका सम्मान ठीक है।
कलावा कब और कैसे उतारें?
- दिन: नया कलावा बँधवाने के दिन, पूजा से पहले पुराना उतारना सबसे सरल है।
- तरीक़ा: गाँठ खुल जाए तो खोल लीजिए; न खुले तो छोटी कैंची से सावधानी से काटिए, ताकि त्वचा न कटे। दाँत से मत काटिए।
- उतारकर: उसे इधर-उधर फेंकने के बजाय एक साफ़ काग़ज़ या कपड़े में रख लीजिए, और नीचे बताए तरीक़े से विसर्जित कीजिए।
पुराने कलावे का क्या करें?
लोक-परंपरा में तीन रास्ते चलते हैं — पीपल या किसी पवित्र पेड़ के नीचे रख देना, बहते जल में प्रवाहित करना, या मिट्टी में दबा देना। इनका भी कोई शास्त्रीय विधान मुझे नहीं मिला; ये श्रद्धा की रीतें हैं।
एक व्यावहारिक सलाह: असली मौली कच्चे सूत की होती है, जो मिट्टी में अपने-आप गल जाती है। इसलिए सबसे सरल और साफ़ तरीक़ा है — घर के गमले या पेड़ की मिट्टी में दबा देना। आजकल बाज़ार में चमकीले सिंथेटिक धागे भी मिलते हैं; ऐसे धागे पानी में डालने से नदी-तालाब में गंदगी बढ़ती है। पुरानी पूजा-सामग्री के सम्मानजनक निपटान पर हमारा विस्तृत लेख — पुरानी मूर्ति और पूजा सामग्री का क्या करें।
कलावा बांधने से क्या होता है? — फ़ायदों का सच
"कलावा बांधने के फायदे" खोजेंगे तो पढ़ने को मिलेगा कि यह कलाई की नाड़ी दबाकर रक्तचाप ठीक करता है, लकवे से बचाता है, वगैरह। मैंने इसका प्रमाण खोजा — कोई वैज्ञानिक अध्ययन नहीं मिला। उलटे, स्वास्थ्य फ़ैक्ट-चेक करने वाली संस्था THIP ने "कलावा लकवे से बचाता है" वाले दावे की जाँच की और उसे ग़लत पाया:
“there is no scientific evidence to support the notion that a kalava has any health benefits”
— THIP Media fact-check, जिसमें अपोलो अस्पताल, कोलकाता के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. देबायन दत्ता की राय शामिल है (साभार: THIP)इसका मतलब यह नहीं कि कलावे का कोई अर्थ नहीं। उसका अर्थ आस्था, आशीर्वाद और याद का है — किसी बड़े ने रक्षा की कामना से बाँधा, और हर बार कलाई पर नज़र पड़ते ही वह भाव याद आता है। बस उसे दवा मत समझिए; रक्तचाप या कोई बीमारी हो तो डॉक्टर ही रास्ता है।
त्वचा का ध्यान। रंगे हुए कपड़ों के रंग से कुछ लोगों को एलर्जी होती है। त्वचा-रोग संदर्भ DermNet के अनुसार यह "Allergy to textile dye is confirmed by performing special allergy tests, i.e. patch tests" से पक्की होती है (साभार: DermNet)। अगर कलावे के नीचे खुजली, लाली या दाने हों, तो धागा उतार दीजिए, और बात बढ़े तो त्वचा-रोग विशेषज्ञ को दिखाइए। गीला धागा देर तक त्वचा पर न रहे, इसका भी ध्यान रखिए।
बच्चों को कलावा
बच्चों को कलावा अक्सर दादी-नानी बाँधती हैं। बस इतना ध्यान रखिए कि धागा ढीला हो, कसा न हो, गाँठ के लंबे सिरे काट दें ताकि बच्चा मुँह में न डाले, और बहुत छोटे बच्चों की कलाई रोज़ देखें कि त्वचा लाल तो नहीं हो रही। बच्चों में परंपराएँ कैसे उतारें, इस पर हमारा लेख — बच्चों को संस्कार कैसे दें।
भारत से बाहर रहती हैं? कलावा, दफ़्तर और अस्पताल
- अस्पताल में काम करती हैं? ब्रिटेन की NHS England की वर्दी-नीति कहती है कि मरीज़ की सीधी देखभाल के दौरान कलाई पर कोई आभूषण न हो। धार्मिक कारण से कंगन या बाँह ढकने वालों के लिए वह लिखती है — "ensure that sleeves or bracelets can be pushed up the arm and secured in place for hand washing" (साभार: NHS England)। कलावा कलाई से खिसककर ऊपर नहीं जाता, इसलिए ड्यूटी वाले दिनों में अपने विभाग से पूछ लें; कई लोग ड्यूटी से पहले उतारकर घर की पूजा में नया बँधवाती हैं।
- रसोई या खाद्य-उद्योग में भी कई देशों में खाना बनाते समय कलाई पर आभूषण की मनाही है — यह नियम धागे पर भी लागू हो सकता है।
- पुराना कलावा नदी में नहीं। ब्रिटेन की Environment Agency के पर्चे में साफ़ लिखा है कि अस्थि-विसर्जन के साथ भी "other items should not be placed in the water with the ashes" (साभार: Bedford Borough Council / Environment Agency (PDF))। इसलिए भारत से बाहर पुराना कलावा गमले की मिट्टी में दबाना ही सबसे अच्छा है।
- पूछने वालों को क्या कहें: "It’s a blessing thread tied after a prayer at home" — इतना काफ़ी है। दुनिया की कई संस्कृतियों में ऐसे धागे पहने जाते हैं।
घर पर पूजा कैसे करें, इस पर हमारा लेख — बिना मंदिर के घर पर पूजा कैसे करें।
मैंने क्या खोजा — क्या मिला, क्या नहीं
| सवाल | नतीजा |
|---|---|
| "येन बद्धो बली राजा" मंत्र का स्रोत | मिला — भविष्य पुराण, उत्तरपर्व 137.20 (पाठ: अभिबध्नामि, रक्षे)। |
| रक्षा का मूल रूप | मिला — अक्षत-सरसों की रक्षा-पोटली, श्रावण पूर्णिमा (137.10, 14)। |
| कितने दिन | शास्त्र में सिर्फ़ "एक वर्ष तक सुखी" (137.22) — फल के रूप में; "21 दिन" नहीं मिला। |
| विवाह में हाथ पर धागा | मिला — शांखायन गृह्यसूत्र 1.12, वधू के दाहिने हाथ में। |
| पुरुष दाहिने, स्त्री बाएँ | परंपरा के रूप में मिला (Wikipedia); शास्त्रीय स्रोत नहीं मिला। |
| फेरों की गिनती, मंगलवार/शनिवार, पीपल/जल | शास्त्रीय स्रोत नहीं मिला — लोक-रीतें। |
| नाड़ी/रक्तचाप/लकवे से बचाव | प्रमाण नहीं मिला; फ़ैक्ट-चेक में दावा ग़लत। |
निचोड़। कलावा रक्षा और आशीर्वाद का धागा है, और उसका मंत्र — "येन बद्धो बली राजा…" — भविष्य पुराण में श्रावण पूर्णिमा की रक्षा-विधि से आता है। "21 दिन", "मंगलवार को ही उतारें", "पाँच फेरे" जैसे नियम ग्रंथों में नहीं मिले; वे परिवारों की रीतें हैं।
तो सबसे सीधा रास्ता: अगली पूजा तक पहनिए, मैला या ढीला हो तो बदल दीजिए, खुजली हो तो उतार दीजिए, और पुराने को मिट्टी में दबा दीजिए। और हाथ कौन-सा — इसका फ़ैसला आपके घर की रीत करे। परंपराओं के पीछे का अर्थ जानने के लिए चूड़ियाँ क्यों पहनी जाती हैं भी पढ़िए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
कलावा क्यों बांधते हैं?
कलावा कौन से हाथ में बांधना चाहिए?
कलावा कितने दिन तक पहनना चाहिए?
कलावा कब उतारना या बदलना चाहिए?
कलावा बांधते समय कौन सा मंत्र बोलना चाहिए?
पुराने कलावे का क्या करें?
कलावा बांधने के फायदे क्या हैं? क्या इससे रक्तचाप ठीक होता है?
कलावा कितनी बार लपेटना चाहिए?
स्रोत और सावधानी: शास्त्र-संदर्भ प्रामाणिक स्रोतों से मिलाए गए — भविष्य पुराण, उत्तरपर्व, अध्याय 137 (श्लोक 10, 14, 20, 22; केवल संस्कृत पाठ, अर्थ Roopalia के; साभार: wisdomlib.org), आर. सी. हाज़रा की Studies in the Upapuranas (साभार: wisdomlib.org), शांखायन गृह्यसूत्र 1.12 (The Grihya Sutras, SBE 29, अनुवाद: हरमन ओल्डेनबर्ग; साभार: sacred-texts.com) और हिंदी-अंग्रेज़ी कोश। परंपरा: Wikipedia (Kautuka); स्वास्थ्य: THIP फ़ैक्ट-चेक, DermNet; भारत से बाहर: NHS England, Environment Agency का पर्चा। तीन बातें साफ़ कह देना ज़रूरी है। पहली — "21 दिन", "मंगलवार/शनिवार को बदलें", फेरों की गिनती, हाथ का नियम और पीपल/जल में विसर्जन का कोई शास्त्रीय स्रोत हमें नहीं मिला; यह खोज का नतीजा है, अंतिम निर्णय नहीं। दूसरी — "प्रतिबध्नामि" वाला पाठ किसी प्रामाणिक पन्ने पर नहीं मिला, इसलिए मिला हुआ पाठ दिया है। तीसरी — कलावा कोई इलाज नहीं; त्वचा पर प्रतिक्रिया या कोई बीमारी हो तो डॉक्टर से मिलें। किसी ब्रांड या दुकान की सिफ़ारिश नहीं।