घर में बच्चा आता है, और दसवें दिन तक सबसे ज़्यादा पूछा जाने वाला सवाल एक ही रहता है — "नामकरण कब करेंगे?"

दादी कहती हैं ग्यारहवें दिन। पंडित जी कहते हैं बारहवें। पड़ोस वाली आंटी बताती हैं कि उनके यहाँ तो इक्कीसवें दिन हुआ था। और अगर आप कनाडा या इंग्लैंड में हैं, तो सवाल और उलझ जाता है — अस्पताल से घर आए अभी चार दिन हुए हैं, पंडित तीन सौ किलोमीटर दूर है, और दादा-दादी वीडियो कॉल पर।

तो मैं सीधे उन ग्रंथों तक गया जहाँ से यह संस्कार आता है। वहाँ जवाब भी मिला, और एक ऐसी बात भी जो बहुत से परिवारों को राहत देगी।

नामकरण संस्कार क्या है

नामकरण हिंदू परंपरा के सोलह संस्कारों में से एक है — जन्म के बाद का पहला बड़ा संस्कार, जिसमें बच्चे को उसका नाम विधि से दिया जाता है। इससे पहले जातकर्म आता है, जो जन्म के समय ही होता है; नामकरण उसके बाद, जब माँ और बच्चा थोड़ा सँभल चुके होते हैं।

इसके लिए सबसे पुराने और साफ़ निर्देश गृह्यसूत्रों में हैं — वे ग्रंथ जो घर के संस्कारों की विधि बताते हैं। उत्तर भारत में सबसे ज़्यादा चलन पारस्कर गृह्यसूत्र का है, जो शुक्ल यजुर्वेद से जुड़ा है। उसके साथ मनुस्मृति भी इस विषय पर बात करती है।

धूप भरे आँगन में गेंदे और आम के पत्तों से सजे लकड़ी के पालने में सोता शिशु, ऊपर झुककर आशीर्वाद देते दादा-दादी, पास तुलसी का पौधा — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
नामकरण वह दिन है जब बच्चा परिवार की पहचान में औपचारिक रूप से शामिल होता है।

नामकरण संस्कार कितने दिन बाद होता है — शास्त्र का सीधा जवाब

यही वह सवाल है जो Google पर सबसे ज़्यादा पूछा जाता है — "नामकरण संस्कार कितने दिन बाद होता है", "जन्म के कितने दिन बाद", "कब करना चाहिए"। दोनों प्रमुख ग्रंथों ने इसका जवाब दिया है।

“On the tenth day (after the birth of the child) the father, having made (his wife) get up, and having fed the Brāhmaṇas, gives a name.”

— पारस्कर गृह्यसूत्र 1.17.1

यानी पारस्कर के अनुसार दसवाँ दिन, और नाम देने वाला पिता। "पत्नी को उठाकर" का अर्थ है कि प्रसूति के बाद जिस कक्ष में माँ विश्राम कर रही थीं, वहाँ से उनका उठना — यानी नामकरण वह दिन भी है जब माँ फिर से घर के जीवन में लौटती हैं।

“One should have his ‘naming’ done on the tenth or the twelfth (day), on an auspicious lunar date and at an auspicious moment, and under a propitious lunar asterism.”

— मनुस्मृति 2.30, मेधातिथि भाष्य सहित

मनुस्मृति दसवाँ या बारहवाँ दिन कहती है — और साथ में शुभ तिथि, शुभ मुहूर्त और शुभ नक्षत्र की शर्त भी जोड़ती है।

अब वह बात जो बहुत से परिवारों को राहत देगी। मनुस्मृति के भाष्यकार मेधातिथि साफ़ लिखते हैं कि अगर दसवाँ या बारहवाँ दिन शुभ न बने, तो नामकरण किसी दूसरी शुभ तिथि पर किया जाए।

यानी शास्त्र ख़ुद रास्ता देता है। अस्पताल में देर हो गई, माँ की तबीयत ठीक नहीं, परिवार नहीं पहुँच पाया — तो दसवें दिन की ज़िद में घबराने की ज़रूरत नहीं। दसवाँ दिन आदर्श है, अनिवार्य बंधन नहीं।

मेधातिथि एक और बात साफ़ करते हैं, जो घरों में अक्सर उलझन पैदा करती है — ये दिन जन्म के दिन से गिने जाते हैं, चंद्र तिथि से नहीं। यानी अगर बच्चा सोमवार को हुआ, तो दसवाँ दिन अगले हफ़्ते का बुधवार होगा, चाहे उस दिन तिथि कोई भी हो।

तो घरों में ग्यारहवाँ, बारहवाँ या इक्कीसवाँ दिन क्यों?

क्योंकि घर-घर की परंपरा ने इसे सूतक से जोड़ दिया। बहुत से परिवारों में जन्म के बाद के दस दिन सूतक माने जाते हैं, और नामकरण सूतक ख़त्म होने के बाद — यानी ग्यारहवें या बारहवें दिन — रखा जाता है। कहीं यह इक्कीसवें दिन तक चला जाता है, कहीं सवा महीने पर।

दिलचस्प यह है कि मेधातिथि इस व्याख्या को स्वीकार नहीं करते। उनके अनुसार दसवें-बारहवें दिन का अर्थ सूतक का अंत नहीं, और नामकरण सूतक के भीतर भी हो सकता है — जैसे जन्म के संस्कार होते हैं। पर जीवित परंपरा ने अपना रास्ता बना लिया, और उसमें कुछ ग़लत नहीं। आपके परिवार में जो दिन चलता आया है, वही आपके लिए सही है।

दिन तय हो गया। अब सवाल — उस दिन होता क्या है?

नामकरण संस्कार में क्या होता है — पूरी विधि

पारस्कर गृह्यसूत्र की विधि बहुत छोटी है — पिता ब्राह्मणों को भोजन कराता है और नाम देता है। आज जो विधि घरों में होती है, वह उसके ऊपर पीढ़ियों में जुड़ी परंपराओं से बनी है। वह क्रम ज़्यादातर ऐसा रहता है:

  1. स्नान और नए वस्त्र — माँ और शिशु दोनों नहाकर नए कपड़े पहनते हैं। शिशु के लिए आमतौर पर पीले या सफ़ेद रंग के कोमल सूती कपड़े।
  2. संकल्प — पिता हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प करते हैं कि वे अपनी संतान का नामकरण कर रहे हैं।
  3. गणेश पूजन और कलश स्थापना — हर शुभ काम की तरह।
  4. हवन — छोटा हवन, जिसमें बच्चे के दीर्घ जीवन और स्वास्थ्य की कामना की जाती है।
  5. नाम की घोषणा — पिता बच्चे के कान के पास उसका नाम धीरे से कहते हैं, फिर परिवार के सामने घोषित करते हैं।
  6. बड़ों का आशीर्वाद — दादा-दादी, नाना-नानी बच्चे को आशीर्वाद देते हैं, और कई घरों में बुआ की ख़ास भूमिका होती है।
  7. भोजन — ब्राह्मणों या ज़रूरतमंदों को भोजन, फिर परिवार का भोज। ध्यान दीजिए, पारस्कर गृह्यसूत्र में भोजन कराना विधि का हिस्सा है — सजावट का नहीं।
घर के फ़र्श पर ईंटों पर रखे ताँबे के हवन कुंड में जलती अग्नि, लकड़ी की कलछी से घी अर्पित करते केसरिया वस्त्र में पुरोहित, सामने बैठे युवा माता-पिता और माँ की गोद में शिशु — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
हवन छोटा हो सकता है — उसकी अग्नि बच्चे के लंबे जीवन की कामना के लिए है।

नामकरण संस्कार सामग्री

चावल की थाली पर नाम — यह परंपरा कहाँ से आई?

लाल रेशमी कपड़े पर पीतल की बड़ी थाली में बिछे सफ़ेद कच्चे चावल, पास में सोने की अँगूठी, कुमकुम की कटोरी, गेंदे के फूल, आम के पत्तों वाला कलश और जलता दीपक — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
कई घरों में पिता इसी थाली पर अँगूठी से पहली बार बच्चे का नाम लिखते हैं।

बहुत से घरों में पिता थाली में बिछे चावल पर सोने की अँगूठी से बच्चे का नाम लिखते हैं। यह दृश्य इतना प्रचलित है कि लोग इसे विधि का मूल हिस्सा मान लेते हैं।

मैंने इसका आधार खोजने की कोशिश की। पारस्कर गृह्यसूत्र के नामकरण वाले खंड में यह नहीं मिला — वहाँ नाम कहने की बात है, लिखने की नहीं। जिन पन्नों पर यह रस्म बताई गई है, उनमें भी किसी ग्रंथ का नाम नहीं दिया गया। यह एक सुंदर, जीवित परंपरा है — और इसका भाव साफ़ है: चावल समृद्धि का, सोना शुद्धता का प्रतीक। बस इसे शास्त्र-विधान कहकर मत बताइए।

कान में नाम कहने का आधार

यहाँ एक दिलचस्प कड़ी मिली। पारस्कर गृह्यसूत्र में शिशु के कान के पास कुछ कहने की बात आती है — पर नामकरण में नहीं, उससे पहले वाले जातकर्म में। सूत्र 1.16.6 के अनुसार पिता शिशु की नाभि या दाहिने कान के पास दीर्घ आयु के मंत्र बुदबुदाता है।

यानी जो रिवाज़ आज नामकरण का सबसे भावुक पल बन चुका है — पिता का झुककर कान में नाम कहना — उसकी जड़ जन्म के पहले संस्कार में है। परंपरा ने दोनों को जोड़ दिया।

विधि समझ आ गई। पर असली बेचैनी तो नाम चुनने में होती है।

बच्चे का नाम कैसे निकालें — नक्षत्र, अक्षर और शास्त्र के नियम

चश्मा लगाए सफ़ेद बालों वाले बुज़ुर्ग पंडित लकड़ी की मेज़ पर फैले कोरे पुराने काग़ज़ पर उँगली रखकर सोचते हुए, सामने ध्यान से सुनता युवा पिता, पास में पीतल का दीपक और रुद्राक्ष — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
नाम का पहला अक्षर अक्सर जन्म-नक्षत्र से तय होता है — पर यह अकेला नियम नहीं।

नक्षत्र के अनुसार नाम का पहला अक्षर

"नक्षत्र के अनुसार नाम का पहला अक्षर" — यह भी Google पर बहुत खोजा जाता है। तरीक़ा यह है: ज्योतिष में आकाश को 27 नक्षत्रों में बाँटा गया है, और हर नक्षत्र के 4 चरण (पद) होते हैं। यानी कुल 108 चरण, और पंचांग-परंपरा में हर चरण के साथ एक अक्षर जुड़ा होता है। बच्चे के जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र के जिस चरण में होता है, उसी चरण का अक्षर नाम का पहला अक्षर माना जाता है।

मैंने यहाँ अक्षरों की पूरी तालिका जानबूझकर नहीं दी है। वजह यह कि सही चरण निकालने के लिए जन्म का ठीक समय और स्थान चाहिए — एक घंटे के अंतर से चरण बदल सकता है। तालिका देखकर अंदाज़ा लगाने से ग़लत अक्षर निकलना आसान है। इसलिए जन्म-समय के साथ किसी पंचांग या जानकार पंडित से चरण निकलवाइए।

पारस्कर गृह्यसूत्र के नाम-नियम

नक्षत्र वाला नियम आज सबसे प्रचलित है, पर गृह्यसूत्र नाम की बनावट पर भी नियम देता है — और ये नियम नक्षत्र वाले नियम जितने जाने-पहचाने नहीं हैं।

पारस्कर गृह्यसूत्र के अनुसार
बेटे का नाम (1.17.2)दो या चार अक्षर का; घोष (कोमल) वर्ण से शुरू; बीच में य, र, ल, व में से कोई अक्षर; अंत में दीर्घ स्वर या विसर्ग
बेटी का नाम (1.17.3)विषम अक्षरों का — यानी तीन या पाँच; आ-कारांत

इसके साथ मनुस्मृति बेटी के नाम पर एक और बहुत सुंदर बात कहती है —

“That of women should be easily pronouncible, not harsh, of plain meaning, heart-captivating and auspicious; it should end in a long vowel and contain a benedictory term.”

— मनुस्मृति 2.33

यानी बेटी का नाम बोलने में आसान, कोमल, साफ़ अर्थ वाला, मन को भाने वाला और मंगल-सूचक हो। "बेटी का नाम कैसे रखें" — इस सवाल का यह शायद सबसे पुराना और सबसे सधा हुआ जवाब है।

ये नियम आज के हर नाम पर लागू करने की ज़रूरत नहीं। पर इनके पीछे की सोच आज भी काम की है: नाम ऐसा हो जो आसानी से बोला जाए, जिसका अर्थ अच्छा हो, और जो बच्चे के साथ उम्र भर अच्छा लगे। हज़ारों साल पुरानी यह कसौटी आज भी किसी भी नाम पर लगाकर देखी जा सकती है।

एक सवाल जो हर नामकरण से पहले कोई न कोई ज़रूर पूछता है — उस दिन क्या करें, क्या न करें?

नामकरण के दिन क्या करना चाहिए, क्या नहीं

चटाई पर तह किए सूती कपड़े पर लेटे मुस्कुराते शिशु को पीले नए कपड़े पहनाती पीली साड़ी में माँ, शिशु की कलाई पर काला धागा, पास पीतल का दीपक और कुमकुम-चावल की थाली — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
नए कपड़े, साफ़ कमरा और आराम से सोया बच्चा — इस दिन की सबसे ज़रूरी तैयारी।

पहले एक साफ़ बात। मैंने "नामकरण के दिन क्या नहीं करना चाहिए" की कोई शास्त्रीय सूची खोजी — पारस्कर गृह्यसूत्र या मनुस्मृति में ऐसी सूची नहीं मिली। जो नियम चलते हैं, वे परिवारों के अनुभव से बने हैं। इसलिए नीचे वही बातें हैं जो व्यावहारिक और समझदार हैं:

क्या करें:

क्या न करें:

नामकरण में क्या गिफ़्ट देना चाहिए

क्रीम रेशमी कपड़े पर घुँघरू वाली चाँदी की पायल, चाँदी की कटोरी-चम्मच, तह किया पीला नया शिशु वस्त्र, लाल धागा और गेंदे के फूल — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
पारंपरिक उपहार — चाँदी की कटोरी-चम्मच, पायल और नए कपड़े।

"Namkaran me kya gift dena chahiye" — यह सवाल मेहमान सबसे ज़्यादा पूछते हैं। इसकी भी कोई शास्त्रीय सूची नहीं है; जो चलन है, वह यह:

भारत से बाहर नामकरण — जब पंडित दूर हो और दादा-दादी स्क्रीन पर

सर्दियों की शाम घर के पूजा-स्थान के सामने गोद में शिशु लिए बैठे युवा माता-पिता, सामने टैबलेट पर हाथ उठाकर आशीर्वाद देते दादा-दादी, खिड़की के बाहर बर्फ़ से ढका शहर — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
आशीर्वाद स्क्रीन से भी आता है — और वह उतना ही सच्चा होता है।

अमेरिका, कनाडा, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया या यूरोप में रहने वाले परिवारों के लिए नामकरण की चार असली अड़चनें होती हैं। चारों का हल परंपरा में ही मौजूद है।

1. दसवाँ दिन नहीं निकल पा रहा। ऊपर मेधातिथि की बात पढ़ चुके हैं — दसवाँ या बारहवाँ दिन शुभ न बने तो कोई दूसरी शुभ तिथि ली जा सकती है। बहुत से परिवार भारत से बाहर नामकरण पहले सप्ताहांत पर रखते हैं, जब सब इकट्ठा हो सकें। शास्त्र इसकी गुंजाइश देता है।

2. पंडित नहीं मिल रहा। पारस्कर गृह्यसूत्र के अनुसार नाम देने वाला पिता है, पंडित नहीं। पंडित विधि में सहायक हैं, अनिवार्य नहीं। बिना पंडित के हवन कैसे करें — यह पूरी विधि अलग लेख में है, और नामकरण में वही काम आती है।

3. घर में मंदिर या पूजा-स्थान नहीं है। एक साफ़ चौकी, उस पर लाल कपड़ा, कलश और दीपक — यही पूरा पूजा-स्थान बन जाता है। बिना मंदिर के घर पर पूजा कैसे करें, यह भी विस्तार से लिखा है।

4. दादा-दादी भारत में हैं। वीडियो कॉल को विधि का हिस्सा बनाइए — नाम की घोषणा से ठीक पहले उन्हें स्क्रीन पर लाइए, और नाम पहली बार उन्हीं से कहलवाइए। बहुत से परिवार यही करते हैं, और यह पल पूरे कार्यक्रम का सबसे भावुक पल बन जाता है।

एक व्यावहारिक बात: भारत से बाहर जन्म-प्रमाणपत्र (birth certificate) के लिए अस्पताल अक्सर कुछ ही दिनों में नाम माँगता है — कई बार नामकरण से पहले। ऐसे में बहुत से परिवार काग़ज़ पर वही नाम पहले दर्ज कर देते हैं जो नामकरण में रखा जाना है, और संस्कार बाद में विधि से करते हैं। संस्कार का अर्थ नाम को परिवार और परंपरा के सामने स्वीकार करना है — वह काग़ज़ के बाद भी पूरा होता है।

घर पर सादी सजावट

घर के दरवाज़े पर गेंदे और आम के पत्तों का तोरण, दोनों ओर जलते पीतल के दीपस्तंभ और फूलों से भरे पीतल के पात्र, सामने फ़र्श पर फूलों की पंखुड़ियों की रंगोली — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
आम के पत्तों का तोरण, दो दीपक और फूलों की रंगोली — सादगी में भी पूरा उत्सव।

"Naming ceremony decoration at home" भी बहुत खोजा जाता है। पारंपरिक सजावट बहुत सरल है: दरवाज़े पर आम के पत्तों और गेंदे का तोरण, दोनों ओर दीपक, और फ़र्श पर फूलों की रंगोली। भारत से बाहर अपार्टमेंट में भी यह आसानी से हो जाता है — और बच्चे के लिए यह गुब्बारों और प्लास्टिक से कहीं ज़्यादा सुरक्षित है।

शास्त्र में क्या मिला, क्या नहीं — एक नज़र में

बातकहाँ मिली
नामकरण दसवें दिन, पिता द्वारामिली — पारस्कर गृह्यसूत्र 1.17.1
दसवाँ या बारहवाँ दिन, शुभ तिथि-नक्षत्र मेंमिली — मनुस्मृति 2.30
दिन जन्म से गिने जाएँ; शुभ न बने तो दूसरी शुभ तिथिमिली — मेधातिथि भाष्य, मनुस्मृति 2.30
बेटे-बेटी के नाम के अक्षर-नियममिली — पारस्कर गृह्यसूत्र 1.17.2–3
बेटी का नाम कोमल, सुखोच्चार्य, मंगल-सूचकमिली — मनुस्मृति 2.33
कान के पास मंत्रमिली — पर जातकर्म में, पारस्कर 1.16.6
चावल पर अँगूठी से नाम लिखनानहीं मिली — जीवित परंपरा है
उपहारों की सूची, "क्या न करें" की सूचीनहीं मिली — परिवारों का अनुभव है

"नहीं मिला" का अर्थ "नहीं है" नहीं होता। यह मेरी खोज का ईमानदार नतीजा है, अंतिम निर्णय नहीं।

निचोड़। नामकरण संस्कार का शास्त्रीय दिन दसवाँ या बारहवाँ है, जन्म से गिनकर — पर शास्त्र ख़ुद कहता है कि वह शुभ न बने तो दूसरी शुभ तिथि ली जा सकती है। नाम देने वाला पिता है, और भोजन कराना विधि का केंद्र है।

बाक़ी सब — चावल की थाली, उपहार, सजावट — परिवारों का प्रेम है जो पीढ़ियों में जुड़ता गया। उसे पूरे मन से निभाइए; बस यह याद रखिए कि संस्कार का असली क्षण वह है जब बच्चा पहली बार अपने नाम से पुकारा जाता है। बाक़ी सब उस क्षण की सजावट है। बच्चों को संस्कार कैसे दें — यह सफ़र इसी दिन से शुरू होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

नामकरण संस्कार जन्म के कितने दिन बाद होता है?
शास्त्र के अनुसार नामकरण संस्कार जन्म के दसवें या बारहवें दिन होता है। पारस्कर गृह्यसूत्र 1.17.1 दसवाँ दिन बताता है, और मनुस्मृति 2.30 दसवाँ या बारहवाँ दिन, शुभ तिथि, मुहूर्त और नक्षत्र में। मनुस्मृति के भाष्यकार मेधातिथि के अनुसार ये दिन जन्म के दिन से गिने जाते हैं, चंद्र तिथि से नहीं; और अगर वह दिन शुभ न बने तो नामकरण किसी दूसरी शुभ तिथि पर किया जा सकता है। घरों में सूतक की परंपरा के कारण यह अक्सर ग्यारहवें, बारहवें या इक्कीसवें दिन भी होता है। इसलिए दसवाँ दिन आदर्श है, अनिवार्य बंधन नहीं — परिवार में जो दिन चलता आया है, वह भी सही है।
नामकरण संस्कार में क्या होता है?
नामकरण संस्कार में आमतौर पर यह क्रम होता है: माँ और शिशु का स्नान और नए वस्त्र, पिता द्वारा संकल्प, गणेश पूजन और कलश स्थापना, बच्चे के दीर्घ जीवन के लिए छोटा हवन, फिर नाम की घोषणा — पिता बच्चे के कान के पास नाम धीरे से कहते हैं और फिर सबके सामने घोषित करते हैं — इसके बाद बड़ों का आशीर्वाद और अंत में भोजन। पारस्कर गृह्यसूत्र 1.17.1 के अनुसार मूल विधि बहुत छोटी है: दसवें दिन पिता ब्राह्मणों को भोजन कराकर नाम देता है। बाक़ी क्रम पीढ़ियों की परंपरा से जुड़ा है। कई घरों में पिता चावल की थाली पर सोने की अँगूठी से नाम भी लिखते हैं, पर यह रस्म गृह्यसूत्र में नहीं मिली — यह जीवित परंपरा है।
नक्षत्र के अनुसार बच्चे का नाम का पहला अक्षर कैसे निकालें?
ज्योतिष में आकाश को 27 नक्षत्रों में बाँटा गया है और हर नक्षत्र के 4 चरण होते हैं — यानी कुल 108 चरण, और पंचांग-परंपरा में हर चरण के साथ एक अक्षर जुड़ा है। बच्चे के जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र के जिस चरण में होता है, उसी चरण का अक्षर नाम का पहला अक्षर माना जाता है। इसके लिए जन्म का ठीक समय, तारीख़ और स्थान चाहिए, क्योंकि एक घंटे के अंतर से भी चरण बदल सकता है। इसलिए किसी सामान्य तालिका से अंदाज़ा लगाने के बजाय पंचांग या जानकार पंडित से जन्म-समय के अनुसार चरण निकलवाना सबसे सुरक्षित तरीक़ा है।
शास्त्र के अनुसार बेटे और बेटी का नाम कैसा होना चाहिए?
पारस्कर गृह्यसूत्र 1.17.2 के अनुसार बेटे का नाम दो या चार अक्षर का हो, कोमल (घोष) वर्ण से शुरू हो, बीच में य, र, ल या व हो, और अंत में दीर्घ स्वर या विसर्ग हो। 1.17.3 के अनुसार बेटी का नाम विषम अक्षरों का — यानी तीन या पाँच — और आ-कारांत हो। मनुस्मृति 2.33 बेटी के नाम के लिए कहती है कि वह बोलने में आसान, कोमल, साफ़ अर्थ वाला, मन को भाने वाला और मंगल-सूचक हो, दीर्घ स्वर पर ख़त्म हो और उसमें आशीर्वाद का भाव हो। आज हर नाम पर ये नियम लागू करना ज़रूरी नहीं, पर इनकी मूल सोच — आसान उच्चारण और अच्छा अर्थ — आज भी किसी भी नाम की अच्छी कसौटी है।
नामकरण संस्कार कौन करता है — पिता या पंडित?
पारस्कर गृह्यसूत्र 1.17.1 के अनुसार नाम पिता देता है — "दसवें दिन पिता, पत्नी को उठाकर और ब्राह्मणों को भोजन कराकर, नाम देता है।" यानी संस्कार का कर्ता पिता है। पंडित विधि कराने में सहायक होते हैं — संकल्प, पूजन और हवन के मंत्र बोलते हैं — पर नाम देना पिता का अधिकार और दायित्व है। इसीलिए भारत से बाहर जहाँ पंडित आसानी से नहीं मिलते, वहाँ भी परिवार यह संस्कार ख़ुद कर सकता है: पिता संकल्प लें, छोटा हवन करें, बच्चे के कान के पास नाम कहें और फिर सबके सामने घोषित करें। कई घरों में दादा-दादी या बुआ की भी विशेष भूमिका रहती है।
नामकरण में क्या गिफ़्ट देना चाहिए?
नामकरण में उपहारों की कोई शास्त्रीय सूची नहीं मिलती, पर जो परंपरा चलती है उसमें सबसे प्रचलित हैं: चाँदी की कटोरी-चम्मच (जो आगे अन्नप्राशन में काम आती है), चाँदी की पायल या कड़े (अक्सर बुआ या नानी की ओर से), नए कोमल सूती कपड़े (एक-दो साइज़ बड़े, क्योंकि बच्चा जल्दी बढ़ता है), और शगुन का लिफ़ाफ़ा — 11, 21, 51 या 101 जैसी विषम राशि में। एक अलग और यादगार उपहार है बच्चों की कहानियों या श्लोकों की किताब, जिसे बच्चा बड़ा होकर पढ़ सके। उपहार में दिखावे से ज़्यादा उपयोगिता और भाव मायने रखते हैं।
नामकरण के दिन क्या नहीं करना चाहिए?
पारस्कर गृह्यसूत्र या मनुस्मृति में "क्या न करें" की कोई शास्त्रीय सूची नहीं मिली; जो नियम चलते हैं वे परिवारों के अनुभव से बने हैं। व्यावहारिक रूप से: बच्चे को हाथों-हाथ घुमाने से बचें, ताकि वह थके नहीं; तेज़ संगीत, पटाखे और ज़्यादा शोर न करें, क्योंकि नवजात के लिए यह लंबा और थकाने वाला दिन होता है; माँ को दौड़ाएँ नहीं — गृह्यसूत्र ने यही दिन माँ के उठने का दिन माना है; और बिना अर्थ जाने नाम न रखें। करने वाली सबसे ज़रूरी बातें हैं — कार्यक्रम बच्चे की नींद और दूध के समय के अनुसार रखना, नाम का अर्थ सबको बताना, और भोजन कराना, जो विधि का मूल हिस्सा है।
भारत से बाहर रहकर नामकरण संस्कार कैसे करें?
चार बातें काम आती हैं। पहली — दिन की चिंता न करें: मेधातिथि के अनुसार दसवाँ या बारहवाँ दिन शुभ न बने तो कोई दूसरी शुभ तिथि ली जा सकती है, इसलिए बहुत से परिवार इसे पहले सप्ताहांत पर रखते हैं। दूसरी — पंडित अनिवार्य नहीं: पारस्कर गृह्यसूत्र के अनुसार नाम पिता देता है, इसलिए परिवार ख़ुद संकल्प, छोटा हवन और नाम-घोषणा कर सकता है। तीसरी — पूजा-स्थान सरल रखें: एक साफ़ चौकी, लाल कपड़ा, कलश और दीपक काफ़ी हैं। चौथी — दादा-दादी को वीडियो कॉल से जोड़ें और नाम पहली बार उन्हीं से कहलवाएँ। ध्यान रहे कि वहाँ जन्म-प्रमाणपत्र के लिए नाम अक्सर पहले देना पड़ता है; संस्कार उसके बाद भी पूरी विधि से हो सकता है।

स्रोत और सावधानी: इस लेख के शास्त्र-संदर्भ खोलकर मिलाए गए — पारस्कर गृह्यसूत्र 1.17.1 (दसवें दिन पिता द्वारा नाम, ब्राह्मण-भोजन के बाद), 1.17.2–3 (बेटे और बेटी के नाम के अक्षर-नियम), 1.16.6 (जातकर्म में नाभि या दाहिने कान के पास आयुष्य-मंत्र), मनुस्मृति 2.30 मेधातिथि भाष्य सहित (दसवाँ या बारहवाँ दिन; दिन जन्म से गिने जाएँ; शुभ न बने तो दूसरी शुभ तिथि) और मनुस्मृति 2.33 (बेटी का नाम)। तीन बातें साफ़ कह देना ज़रूरी है। पहली — चावल पर अँगूठी से नाम लिखने की रस्म, उपहारों की सूची और "क्या न करें" की सूची हमें किसी ग्रंथ में नहीं मिली; ये परिवारों की परंपरा हैं। दूसरी — नक्षत्र-चरण के अक्षरों की तालिका जानबूझकर नहीं दी गई, क्योंकि सही चरण जन्म के ठीक समय और स्थान पर निर्भर है; इसके लिए पंचांग या जानकार पंडित की मदद लीजिए। तीसरी — "नहीं मिला" का अर्थ "नहीं है" नहीं; यह हमारी खोज का ईमानदार नतीजा है, अंतिम निर्णय नहीं। नवजात और प्रसूता के स्वास्थ्य से जुड़ा कोई भी फ़ैसला अपने डॉक्टर की सलाह से कीजिए।