चरण स्पर्श का मतलब क्या होता है?

शब्द बहुत सीधा है। चरण यानी पैर, स्पर्श यानी छूना। पर संस्कृत ग्रंथों में इस क्रिया के लिए एक नहीं, तीन शब्द मिलते हैं — और तीनों का अर्थ थोड़ा-थोड़ा अलग है।

यानी हर प्रणाम चरण स्पर्श नहीं होता, पर हर चरण स्पर्श एक प्रणाम है। यह छोटा-सा अंतर आगे बहुत काम आएगा, ख़ासकर तब जब आप तय कर रही हों कि किसी अवसर पर झुकना है या सिर्फ़ हाथ जोड़ने हैं।

स्कूल जाने से पहले माँ के पैर छूता बालक, माँ सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देती हुईं — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)

ध्यान दीजिए कि परंपरा में यह क्रिया दो हिस्सों वाली है — एक अकेली नहीं। छोटा झुकता है, और बड़ा आशीर्वाद देता है। अगर बड़ा आशीर्वाद न दे, तो अभिवादन अधूरा माना गया है। यही बात इसे केवल "औपचारिकता" से अलग करती है — यह एक-तरफ़ा सम्मान नहीं, दो-तरफ़ा लेन-देन है।

शास्त्र क्या कहते हैं? — वह श्लोक जो सबसे ज़्यादा उद्धृत होता है

व्यास-पीठ पर खुला संस्कृत ग्रंथ, पास में जलता पीतल का दीपक और रुद्राक्ष माला — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)

चरण स्पर्श से जुड़ा सबसे प्रसिद्ध श्लोक मनुस्मृति के दूसरे अध्याय से आता है —

अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्धर्मो यशो बलम्॥

— मनुस्मृति 2.121

अर्थ: जो व्यक्ति सदा अभिवादन करने के स्वभाव वाला है और बड़ों की सेवा करता है, उसकी चार चीज़ें बढ़ती हैं — आयु, धर्म, यश और बल।

एक ईमानदार बात, जो ज़्यादातर लेख नहीं बताते
हिंदी इंटरनेट पर यह श्लोक अक्सर "आयुर्विद्या यशो बलम्" लिखा मिलता है, यानी आयु, विद्या, यश और बल। पर संस्कृत के मानक संस्करणों और आलोचनात्मक संपादनों में पाठ "आयुर्धर्मो यशो बलम्" है — यानी विद्या नहीं, धर्म। दोनों पाठ सदियों से चले आ रहे हैं और अर्थ में कोई विरोध नहीं है, पर अगर कोई आपसे पूछे तो सही यह है कि मूल पाठ में "धर्म" आता है। हम यहाँ बात बढ़ाकर नहीं कह रहे — जो है, वही लिख रहे हैं।

पर इससे भी ज़्यादा दिलचस्प वह श्लोक है जो तरीका बताता है। मनुस्मृति 2.71 और 2.72 में गुरु के चरण छूने की विधि दी गई है —

व्यत्यस्तपाणिना कार्यमुपसङ्ग्रहणं गुरोः।
सव्येन सव्यः स्प्रष्टव्यो दक्षिणेन च दक्षिणः॥

— मनुस्मृति 2.72

अर्थ: गुरु के चरणों का ग्रहण हाथ आड़े करके करना चाहिए — बायाँ चरण बाएँ हाथ से और दायाँ चरण दाएँ हाथ से छूना चाहिए।

यही वह नियम है जिसे आज लगभग सब भूल चुके हैं। ज़रा सोचिए — जब आप किसी के सामने खड़े होकर झुकती हैं, तो उनका दायाँ पैर आपके बाईं ओर पड़ता है। दाएँ हाथ से उसे छूने के लिए आपको हाथ आड़े करने ही पड़ेंगे। शास्त्र ने यह कोई रहस्यमय विधि नहीं बताई — उसने बस एक बात कही है कि झुकते समय भी ध्यान बना रहे, हड़बड़ी न हो।

इसी विधि की गूँज दूसरे ग्रंथों में भी मिलती है। गौतम धर्मसूत्र में कहा गया है कि विद्यार्थी अध्ययन के आरंभ और अंत में गुरु के चरण ग्रहण करे। आपस्तम्ब धर्मसूत्र और विष्णुस्मृति में भी यही निर्देश दोहराया गया है। यानी यह परंपरा किसी एक ग्रंथ की उपज नहीं — यह शिक्षा-परंपरा का हिस्सा थी, धार्मिक कर्मकांड का नहीं।

पैर छूने का सही तरीका — छह चरणों में

चरण स्पर्श का सही तरीका — हाथ आड़े करके दाएँ हाथ से दायाँ और बाएँ हाथ से बायाँ चरण छूते हुए — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)

अब व्यावहारिक बात। अगली बार जब आप किसी बुज़ुर्ग के सामने हों, यह क्रम याद रखिए —

१. पहले रुकिए। चलते-चलते झुक जाना अभिवादन नहीं है। एक पल ठहरिए, सामने वाले की ओर मुड़िए।

२. कमर से झुकिए, पीठ सीधी रखिए। घुटनों के बल तभी बैठें जब बुज़ुर्ग नीचे ज़मीन पर या पलंग पर बैठे हों। जबरन घुटने टेकना ज़रूरी नहीं।

३. दोनों हाथ आड़े कीजिए। दायाँ हाथ उनके दाएँ चरण पर, बायाँ हाथ बाएँ चरण पर — यही शास्त्रोक्त विधि है।

४. चरणों को हल्के से छुइए, दबाइए नहीं। स्पर्श कोमल हो, नाटकीय नहीं।

५. सीधे खड़े होकर हाथ जोड़िए और चाहें तो अपने हाथ को माथे से लगाइए। यह क्रिया को पूरा करता है।

६. आशीर्वाद के लिए एक पल रुकिए। बड़े को सिर पर हाथ रखने का अवसर दीजिए — यही सबसे ज़रूरी हिस्सा है, और यही सबसे ज़्यादा छूट जाता है।

अगर बुज़ुर्ग बहुत बड़े हैं, बीमार हैं या खड़े नहीं हो सकते, तो उनके घुटनों को छूना भी उतना ही स्वीकार्य है — कई परिवारों में यही चलन है। और अगर आप दूर हैं या फ़ोन पर हैं, तो सिर्फ़ शब्दों से "चरण स्पर्श" कह देना भी परंपरा में मान्य है। लोग सचमुच फ़ोन पर यही कहते आए हैं।

प्रणाम के प्रकार — चरण स्पर्श अकेला नहीं है

मंदिर में साष्टांग दंडवत प्रणाम करता श्रद्धालु, पत्थर के खंभों के बीच दीपक की रोशनी — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)

भारतीय परंपरा में झुकने के कई स्तर हैं, और हर स्तर की अपनी जगह है।

उरसा शिरसा दृष्ट्या मनसा वचसा तथा।
पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यां प्रणामोऽष्टाङ्ग उच्यते॥

अर्थ: हृदय, मस्तक, दृष्टि, मन, वाणी, चरण, हाथ और घुटने — इन आठ अंगों से किया गया प्रणाम अष्टांग प्रणाम कहलाता है।

यहाँ एक बात स्पष्ट कर देना ज़रूरी है। पारंपरिक रूप से यह माना जाता रहा है कि स्त्रियों को साष्टांग दंडवत नहीं, पंचांग प्रणाम करना चाहिए — इसका कारण शारीरिक मुद्रा से जोड़ा जाता है। यह एक परंपरागत मान्यता है, कोई सार्वभौमिक शास्त्रीय आदेश नहीं, और आज बहुत से परिवार और मंदिर इसका पालन नहीं करते। हम इसे बता रहे हैं ताकि आपको पूरी जानकारी हो — निर्णय आपका है।

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किसके पैर छूने चाहिए और किसके नहीं?

यह वह सवाल है जिसका जवाब गूगल पर सबसे ज़्यादा खोजा जाता है, और सबसे कम स्पष्टता से मिलता है। परंपरा में जो नियम माने गए हैं, वे ये हैं —

जिनके चरण स्पर्श की परंपरा है: माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी, सास-ससुर, बड़े भाई-बहन, चाचा-ताऊ-मामा-बुआ-मौसी, गुरु और शिक्षक, तथा साधु-संत।

जिनके पैर छूने की परंपरा नहीं है:

जहाँ यह परंपरा गलत दिशा में मुड़ जाती है
चरण स्पर्श का मूल भाव विनम्रता है — अधीनता नहीं। जब किसी बच्चे को डाँटकर, शर्मिंदा करके या मेहमानों के सामने दिखावे के लिए झुकाया जाता है, तो जो चीज़ बचती है वह डर है, सम्मान नहीं। और जब कोई व्यक्ति अपने पद, पैसे या रुतबे के दम पर दूसरों से पैर छुआता है, तो वह परंपरा नहीं, उसका दुरुपयोग है। शास्त्रों में जिसकी बात है, वह अनुभव और आयु का सम्मान है — हैसियत का नहीं।

"पैर छूने से क्या होता है?" — विज्ञान का सच

अब उस दावे पर आते हैं जो हर दूसरे लेख में मिलता है — कि पैर छूने से "ऊर्जा का चक्र पूरा होता है", "नसों के सिरे जुड़ते हैं", "बायोइलेक्ट्रिक करंट प्रवाहित होता है"।

सीधी बात यह है कि इनमें से किसी भी दावे का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। ऐसा कोई अध्ययन नहीं है जो दिखाता हो कि किसी बुज़ुर्ग के पैर छूने से आपके शरीर में कोई ऊर्जा-हस्तांतरण होता है। जो लेख इसे "सिद्ध विज्ञान" कहकर पेश करते हैं, वे बात बढ़ा रहे होते हैं।

पर इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं कि इस क्रिया का कोई वास्तविक असर नहीं। जो असर सचमुच होता है, वह यह है —

परंपरा को टिकने के लिए विज्ञान के प्रमाणपत्र की ज़रूरत नहीं है। उसका अपना मूल्य है — और उस मूल्य को झूठे वैज्ञानिक दावों से सजाने की कोशिश असल में उसे कमज़ोर ही करती है।

गुरु और शिक्षक के चरण स्पर्श

गुरु पूर्णिमा पर शिक्षिका के चरण स्पर्श करती छात्रा, शिक्षिका आशीर्वाद देती हुईं — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)

दिलचस्प बात यह है कि शास्त्रों में चरण स्पर्श का सबसे विस्तृत विवरण माता-पिता के नहीं, गुरु के संदर्भ में आता है। मनुस्मृति का जो श्लोक ऊपर दिया गया, वह गुरु के बारे में है। गौतम धर्मसूत्र भी विद्यार्थी को यही निर्देश देता है।

इसका कारण समझने लायक है। प्राचीन शिक्षा-पद्धति में विद्यार्थी गुरु के घर रहकर पढ़ता था। पाठ के आरंभ और अंत में चरण ग्रहण एक औपचारिक संकेत था — "अब मैं सीखने के लिए तैयार हूँ, मेरा अहंकार दरवाज़े पर है।" आज भी गुरु पूर्णिमा पर, परीक्षा से पहले, या नौकरी लगने पर पुराने शिक्षक के पास जाकर यही किया जाता है।

और यहीं एक बात ध्यान देने की है — भारत के बाहर के स्कूलों में यह उलझन पैदा कर सकता है। कई देशों में शिक्षक-छात्र के बीच शारीरिक स्पर्श को लेकर स्पष्ट नियम हैं। ऐसे में बच्चे को यह समझाना ज़रूरी है कि स्कूल में हाथ जोड़कर "नमस्ते" कहना पर्याप्त है, और चरण स्पर्श घर आए गुरुजनों या भारत यात्रा के दौरान किया जा सकता है।

बेटियाँ पैर छुएँ या नहीं?

कुछ समुदायों में यह मान्यता है कि बेटियों को, ख़ासकर विवाह के बाद, माता-पिता के पैर नहीं छूने चाहिए — क्योंकि उन्हें लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है और यह माना जाता है कि उनका झुकना माँ-बाप के लिए उचित नहीं।

यहाँ हमें साफ़ बात कहनी है। किसी शास्त्र में ऐसा निषेध नहीं मिलता। मनुस्मृति का श्लोक "अभिवादनशील" व्यक्ति की बात करता है — उसमें कहीं लिंग का उल्लेख नहीं है। यह एक क्षेत्रीय लोक-परंपरा है, जो कहीं मानी जाती है और कहीं नहीं। महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के अनेक परिवारों में बेटियाँ नियमित रूप से माता-पिता के चरण स्पर्श करती हैं और किसी को कोई आपत्ति नहीं होती।

अगर आपके ससुराल या मायके की रीत अलग-अलग है, तो घबराइए नहीं — यह विरोध नहीं, विविधता है। जहाँ जो चलन है, उसे निभाइए; और अपनी बेटी को बताइए कि यह क्षेत्र का फ़र्क़ है, किसी शास्त्र का आदेश नहीं। जिन बेटियों को सोलह शृंगार या सिंदूर जैसी रीतियों के कारण भी बताए जाते हैं, उनके लिए यही सिद्धांत लागू होता है — कारण जानकर निभाई गई परंपरा ज़्यादा देर टिकती है।

पैर छूने पर क्या आशीर्वाद देना चाहिए?

विदाई के समय नवविवाहित जोड़ा माता-पिता के चरण स्पर्श करते हुए, माँ आशीर्वाद देती हुईं — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)

यह सवाल आजकल बहुत पूछा जाता है, ख़ासकर उन लोगों द्वारा जो अब ख़ुद बड़े हो गए हैं और नहीं जानते कि क्या कहें। परंपरागत आशीर्वचन ये रहे —

एक बात सोचने लायक
"सौभाग्यवती भव" का शाब्दिक अर्थ पति के दीर्घ जीवन से जोड़ा जाता है। इसीलिए आज बहुत से परिवार बेटियों और बहुओं को "आयुष्मती भव", "यशस्विनी भव" या सीधे-सीधे "ख़ुश रहो, आगे बढ़ो" कहना पसंद करते हैं — ताकि आशीर्वाद उसके अपने जीवन का हो, किसी और के जीवन से बँधा हुआ नहीं। यह किसी परंपरा का विरोध नहीं, बस एक सजग चुनाव है।

और अगर संस्कृत याद न आए, तो घबराने की कोई बात नहीं। सिर पर हाथ रखकर कहा गया एक साधारण "ख़ुश रहो बेटा" उतना ही पूरा आशीर्वाद है।

अगर आप भारत से बाहर रहते हैं — बच्चों को यह संस्कार कैसे दें

भारत से बाहर पले भारतीय बच्चे का घर आए दादाजी के पैर छूना, दादाजी आशीर्वाद देते हुए — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)

यह इस लेख का सबसे ज़रूरी हिस्सा है, और सबसे कठिन भी। अगर आपका परिवार अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर या खाड़ी देशों में बसा है, तो आप जानती हैं कि दिक़्क़त क्या है — बच्चा वह भाषा नहीं बोलता जिसमें यह परंपरा समझाई जाती थी, और वह समाज नहीं देखता जिसमें यह रोज़ घटती थी।

पाँच बातें जो सचमुच काम करती हैं —

१. "यह हमारी परंपरा है" मत कहिए — कारण बताइए। बच्चे तर्क से चलते हैं, आदेश से नहीं। कहिए — "जब हम झुकते हैं, तो हम कह रहे होते हैं कि आपने मुझसे ज़्यादा जीवन देखा है, मैं आपसे सीखना चाहता हूँ।" यह बात सात साल का बच्चा भी समझ लेता है।

२. जबरदस्ती कभी नहीं। मेहमानों के सामने "पैर छुओ" कहकर बच्चे को शर्मिंदा करना उल्टा असर करता है। जब वह ख़ुद करे, तब सराहिए। जब न करे, बाद में अकेले में बात कीजिए।

३. वीडियो कॉल को गिनती में लीजिए। भारत में बैठे दादा-दादी से बात हो, तो बच्चे से कहिए कि स्क्रीन के सामने हाथ जोड़कर "चरण स्पर्श दादाजी" कह दे। परंपरा में यह पूरी तरह मान्य है, और दादा-दादी के लिए इसका मूल्य अपार है।

४. स्कूल और घर का फ़र्क़ साफ़ रखिए। बच्चे को समझाइए कि स्कूल में शिक्षकों के लिए हाथ जोड़कर अभिवादन ही सही है। इससे वह असमंजस में नहीं पड़ेगा और घर की परंपरा भी नहीं टूटेगी।

५. उसे जवाब देना सिखाइए। उसके दोस्त पूछेंगे — "Why did you touch his feet?" उसके पास एक वाक्य तैयार होना चाहिए: "It's how we greet elders — like a very respectful bow." जिस बच्चे के पास जवाब होता है, उसे शर्म नहीं आती।

भारत आना हो तो एक और बात ध्यान रखिए। वहाँ रिश्तेदारों की संख्या बहुत होती है और बच्चा घबरा सकता है। जाने से पहले उसे बता दीजिए कि किन-किन लोगों से मिलना है — तैयारी से बच्चे का डर आधा हो जाता है। और अगर वह किसी दिन झुकने से मना कर दे, तो उसे बदतमीज़ मत कहिए। बच्चों के मूड और ज़िद के पीछे अक्सर कोई और कारण होता है, जिस पर हमने यहाँ विस्तार से लिखा है

और सबसे बड़ी बात, जो कोई गाइड नहीं बता सकती — बच्चा वही करेगा जो वह आपको करते देखेगा। अगर आप अपनी माँ के पैर छूती हैं, तो एक दिन बिना कहे वह भी झुकेगा। संस्कार सिखाए नहीं जाते, दिखाए जाते हैं।

चरण स्पर्श को English में क्या कहते हैं?

इसका कोई एक सटीक अंग्रेज़ी शब्द नहीं है, और यही इसकी ख़ासियत है। सबसे प्रचलित अनुवाद है — "touching the feet of elders" या "seeking blessings by touching feet"। कई जगह इसे obeisance कहा जाता है, जो निकट है पर पूरा नहीं। अंतरराष्ट्रीय लेखन में अब मूल शब्द charan sparsh ही ज्यों का त्यों प्रयोग किया जाने लगा है, ठीक वैसे ही जैसे namaste या yoga

भारत के भीतर भी नाम बदलते हैं — पंजाब में "पैरी पैना", बंगाल में "प्रोणाम", महाराष्ट्र में "नमस्कार", और दक्षिण भारत में "नमस्कारम्"। क्रिया एक ही है, बस शब्द अलग हैं।

आख़िर में

🙏

झुकिए, पर समझकर

चरण स्पर्श भारतीय परिवार की सबसे सरल और सबसे गहरी रस्म है — इसमें न कोई सामग्री लगती है, न मुहूर्त, न पंडित। बस दो लोग, और दो सेकंड। इसकी ताक़त इसमें नहीं कि इससे कोई चमत्कार होता है; इसकी ताक़त इसमें है कि यह हर दिन दो पीढ़ियों को एक-दूसरे के सामने ठहरा देती है। आज की दुनिया में, जहाँ परिवार के लोग एक ही घर में रहकर भी स्क्रीन में खोए रहते हैं, यह छोटा-सा ठहराव कम कीमती नहीं। इसे निभाइए — डरकर नहीं, जानकर।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल — FAQs

चरण स्पर्श का मतलब क्या होता है?
चरण यानी पैर और स्पर्श यानी छूना — चरण स्पर्श का अर्थ है बड़ों के पैर छूकर सम्मान और आशीर्वाद लेना। संस्कृत ग्रंथों में इसे अभिवादन और पादग्रहण भी कहा गया है। यह एक दो-तरफ़ा क्रिया है — छोटा झुककर सम्मान देता है और बड़ा सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देता है। बिना आशीर्वाद के अभिवादन अधूरा माना जाता है।
पैर छूने का सही तरीका क्या है?
कमर से झुकिए और पीठ सीधी रखिए। दोनों हाथ आड़े करके दाएँ हाथ से बड़े का दायाँ चरण और बाएँ हाथ से बायाँ चरण हल्के से छुइए — मनुस्मृति 2.72 में यही विधि दी गई है। फिर सीधे खड़े होकर हाथ जोड़िए और एक पल रुककर आशीर्वाद लीजिए। यदि बुज़ुर्ग नीचे बैठे हों तो घुटनों के बल बैठा जा सकता है, और यदि वे बीमार या अशक्त हों तो घुटनों को छूना भी उतना ही स्वीकार्य है।
पैर छूने का वैज्ञानिक कारण क्या है?
कोई सिद्ध वैज्ञानिक कारण नहीं है — और यह जानना ज़रूरी है। "ऊर्जा का चक्र पूरा होता है" या "नसों से करंट प्रवाहित होता है" जैसे दावों का कोई शोध-आधार नहीं है। जो असर सचमुच होता है वह तीन तरह का है — शारीरिक (झुकने से पीठ व जाँघों का हल्का खिंचाव), मनोवैज्ञानिक (मुद्रा मनोभाव को प्रभावित करती है, अहंकार एक क्षण के लिए रुकता है) और सामाजिक (दो पीढ़ियों के बीच रोज़ दोहराया जाने वाला संपर्क का क्षण)। परंपरा का अपना मूल्य है; उसे झूठे वैज्ञानिक दावों की ज़रूरत नहीं।
किसके पैर नहीं छूने चाहिए?
परंपरा के अनुसार — अपने से छोटी आयु वाले का (चाहे वे पद में बड़े हों), समान आयु वाले का (जब तक वे गुरु न हों), और ऐसे व्यक्ति का जो स्वयं असहज हो। लोक-परंपरा में सोते हुए व्यक्ति के पैर छूना भी उचित नहीं माना जाता, क्योंकि तब वे आशीर्वाद नहीं दे सकते। मूल भाव यह है कि सम्मान वहीं सार्थक है जहाँ दोनों पक्ष सहज हों।
क्या बेटियों को माता-पिता के पैर छूने चाहिए?
हाँ, इसमें कोई शास्त्रीय निषेध नहीं है। कुछ समुदायों में यह मान्यता ज़रूर है कि विवाहित बेटी को माता-पिता के पैर नहीं छूने चाहिए क्योंकि उसे लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है — पर यह एक क्षेत्रीय लोक-परंपरा है, कोई शास्त्रीय आदेश नहीं। मनुस्मृति का श्लोक "अभिवादनशील" व्यक्ति की बात करता है, उसमें लिंग का कोई उल्लेख नहीं। महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के अनेक परिवारों में बेटियाँ नियमित चरण स्पर्श करती हैं।
पैर छूने पर क्या आशीर्वाद देना चाहिए?
पारंपरिक आशीर्वचन हैं — आयुष्मान भव (दीर्घायु हो), यशस्वी भव (यशस्वी हो), विद्यावान भव (विद्यार्थियों के लिए), चिरंजीव या सीधे-सीधे "जीते रहो"। विवाहित स्त्रियों के लिए परंपरागत रूप से "सौभाग्यवती भव" कहा जाता है, हालाँकि आज कई परिवार "आयुष्मती भव" या "यशस्विनी भव" कहना पसंद करते हैं ताकि आशीर्वाद उसके अपने जीवन का हो। संस्कृत याद न आए तो सिर पर हाथ रखकर कहा गया "ख़ुश रहो" भी पूरा आशीर्वाद है।
चरण स्पर्श को English में क्या कहते हैं?
इसका कोई एक सटीक अंग्रेज़ी शब्द नहीं है। सबसे प्रचलित अनुवाद है "touching the feet of elders" या "seeking blessings by touching feet"। कहीं-कहीं obeisance शब्द भी प्रयोग होता है, जो निकट है पर पूरा अर्थ नहीं देता। आजकल अंतरराष्ट्रीय लेखन में मूल शब्द charan sparsh ही ज्यों का त्यों लिखा जाने लगा है, जैसे namaste या yoga।
क्या फ़ोन या वीडियो कॉल पर चरण स्पर्श कहना सही है?
बिल्कुल सही है, और यह चलन नया भी नहीं है। भारत में लोग दशकों से फ़ोन पर बड़ों से बात शुरू करते ही "चरण स्पर्श" कहते आए हैं। जो परिवार भारत से बाहर रहते हैं, उनके लिए यह और भी उपयोगी है — बच्चे से कहिए कि वीडियो कॉल पर स्क्रीन के सामने हाथ जोड़कर "चरण स्पर्श दादाजी" कह दे। परंपरा में भाव को क्रिया जितना ही महत्व दिया गया है।
मनुस्मृति में चरण स्पर्श के बारे में क्या लिखा है?
मनुस्मृति में दो जगह इसका उल्लेख है। 2.121 में कहा गया है — अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः, चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्धर्मो यशो बलम् — यानी जो नियमित अभिवादन करता है और बड़ों की सेवा करता है, उसकी आयु, धर्म, यश और बल बढ़ते हैं। 2.71–72 में विधि दी गई है कि गुरु के चरण हाथ आड़े करके छूने चाहिए। ध्यान रहे, हिंदी इंटरनेट पर 2.121 अक्सर "आयुर्विद्या" के साथ मिलता है, पर मानक संस्कृत संस्करणों में पाठ "आयुर्धर्मो" है।
क्या पति-पत्नी को एक-दूसरे के पैर छूने चाहिए?
परंपरा में पति-पत्नी को समान माना गया है — दोनों एक-दूसरे के "अर्धांगिनी" और "अर्धांग" हैं। इसीलिए आपसी चरण स्पर्श की कोई सामान्य परंपरा नहीं रही। कुछ क्षेत्रों में विवाह के बाद पत्नी द्वारा पति के चरण स्पर्श की रीत है, तो कुछ परिवारों में विशेष अवसरों पर दोनों साथ मिलकर बड़ों के पैर छूते हैं — जैसे सप्तपदी के बाद और विदाई के समय। यह पूरी तरह क्षेत्रीय व पारिवारिक रीत का विषय है, इसमें कोई शास्त्रीय बाध्यता नहीं।

📷 AI-generated images. For illustration only.
🙏 यह लेख सामान्य सांस्कृतिक जानकारी के लिए है। शास्त्रीय संदर्भ मनुस्मृति, गौतम धर्मसूत्र व आपस्तम्ब धर्मसूत्र के प्रचलित संस्करणों से लिए गए हैं। क्षेत्र और परिवार के अनुसार रीतियाँ भिन्न हो सकती हैं।