13 या 14 सितंबर — यह उलझन क्यों है?
आपने शायद दोनों तारीख़ें सुनी होंगी, और यही सबसे ज़्यादा भ्रम पैदा करता है। कारण सीधा है।
तृतीया तिथि 13 सितंबर की सुबह शुरू होती है, पर हिंदू परंपरा में व्रत की गणना उदया तिथि से होती है — यानी सूर्योदय के समय जो तिथि चल रही हो, व्रत उसी दिन माना जाता है। 14 सितंबर की सुबह सूर्योदय के वक़्त तृतीया चल रही होगी (वह 7:06 पर समाप्त होती है), इसलिए व्रत 14 सितंबर का है।
फिर भी उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ परिवार परंपरागत रूप से इसे 13 सितंबर को रखते हैं। अगर आपके घर में पीढ़ियों से एक ही दिन चला आ रहा है, तो उसे मत बदलिए। व्रत में तिथि से बड़ी चीज़ निरंतरता होती है। नई शुरुआत कर रही हैं तो 14 सितंबर लीजिए।
नाम में ही पूरी कथा छिपी है
यह शायद इस व्रत की सबसे सुंदर बात है, और ज़्यादातर लोग इससे अनजान रहते हैं।
"हरतालिका" दो शब्दों से बना है — "हरत्" यानी हरण, और "आलिका" यानी सखी। अर्थात् "सखी द्वारा हरण"।
अब सोचिए — किसी व्रत का नाम "अपहरण" पर क्यों रखा जाएगा? इसका जवाब कथा में है, और वो कथा जितनी पुरानी है, उतनी ही आज भी प्रासंगिक।
हरतालिका तीज की व्रत कथा
यह कथा भविष्योत्तर पुराण में मिलती है — भविष्य पुराण का वही उत्तरपर्व, जो पूरी तरह व्रतों, त्योहारों, दान और तीर्थों को समर्पित है। जम्मू के रघुनाथ मंदिर स्थित धर्मार्थ ट्रस्ट के संग्रह में "हरितालिका व्रत कथा — भविष्योत्तर पुराण" नाम से इसकी हस्तलिखित प्रति आज भी सुरक्षित है।
कथा इस प्रकार है —
एक बार भगवान शिव ने माता पार्वती को उनके पूर्व जीवन की स्मृति दिलाने के लिए यह कथा सुनाई। पार्वती हिमालय की पुत्री थीं और बचपन से ही शिव को पति रूप में पाने का संकल्प कर चुकी थीं। इसी हेतु उन्होंने वर्षों घोर तप किया — कभी केवल पत्ते खाकर, कभी वो भी त्यागकर।
पिता हिमालय अपनी पुत्री की यह दशा देखकर व्यथित थे। नारद जी के सुझाव पर उन्होंने पार्वती का विवाह भगवान विष्णु से तय कर दिया — बिना पार्वती से पूछे।
जब पार्वती को यह पता चला, वे टूट गईं। तब उनकी सखियाँ उन्हें घर से दूर एक घने वन में ले गईं — छिपा दिया, ताकि विवाह न हो सके। यही "हरण" है, और यही नाम का मूल।
उस वन में एक गुफा के भीतर पार्वती ने भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन बालू से शिवलिंग बनाया और निर्जल रहकर रात भर पूजा व जागरण किया। उनकी उस तपस्या से प्रसन्न होकर शिव प्रकट हुए और उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार करने का वचन दिया।
कथा में ध्यान देने लायक़ बात
यह व्रत केवल "पति की लंबी आयु" का नहीं है। इसकी जड़ में एक स्त्री का अपना निर्णय है — पार्वती ने वही चुना जो उन्होंने ख़ुद तय किया था, तब भी जब पिता का फ़ैसला उसके विरुद्ध था। और उस निर्णय में उनका साथ किसी पुरुष ने नहीं, उनकी सखियों ने दिया। इसीलिए यह व्रत आज भी औरतें मिलकर रखती हैं, अकेले नहीं।
एक भूल जो कई जगह दोहराई जाती है — कुछ लेखों में लिखा मिलता है कि पार्वती पूर्वजन्म में "दक्ष प्रजापति की पुत्री" थीं। यह सती की कथा से घालमेल है, जो अलग प्रसंग है। हरतालिका की कथा में पार्वती हिमालय की पुत्री हैं, और विवाह विष्णु से तय हुआ था।
हरतालिका तीज व्रत की पूजा विधि
पूजा दो समय होती है — प्रातःकाल और प्रदोष काल (संध्या का वह समय जब दिन और रात मिलते हैं)। मुख्य पूजा प्रदोष काल की मानी जाती है।
१. प्रतिमाएँ बनाइए — गीली काली मिट्टी या बालू रेत से अपने हाथों से शिव, पार्वती और गणेश की प्रतिमाएँ बनाएँ। साथ में एक छोटा शिवलिंग भी। इन्हें फूलों से सजाकर सूखने दें। जो स्वयं न बना पाएँ, वे बाज़ार से बनी-बनाई मिट्टी की प्रतिमाएँ ला सकती हैं।
२. चौकी सजाइए — लकड़ी की चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर तीनों प्रतिमाएँ स्थापित करें।
३. कलश स्थापना — चौकी की दाईं ओर चावल से अष्टकमल बनाकर उस पर जल से भरा कलश रखें। कलश पर स्वस्तिक बनाएँ और उसमें सुपारी, सिक्का व हल्दी डालें।
४. अभिषेक व पूजन — प्रतिमाओं का पंचामृत से अभिषेक करें, फिर रोली, अक्षत, चंदन, बेलपत्र, शमी पत्र और दूर्वा अर्पित करें।
५. सुहाग सामग्री अर्पण — सुहाग की पिटारी में सारी सामग्री सजाकर माता पार्वती को अर्पित करें। शिवजी को धोती और अंगोछा चढ़ाएँ।
६. कथा व आरती — व्रत कथा पढ़ें या सुनें, फिर आरती करके भोग लगाएँ।
७. रात्रि जागरण — रात भर भजन-कीर्तन करते हुए जागरण करें। यही व्रत का सबसे कठिन और सबसे सुंदर हिस्सा है।
८. अगली सुबह — पार्वती जी को चढ़ाया सिंदूर अपनी माँग में लगाएँ, फिर व्रत का पारण करें।
हरतालिका तीज व्रत में क्या-क्या सामान लगता है?
यह वो हिस्सा है जिसमें सबसे ज़्यादा भागदौड़ होती है — इसलिए एक दिन पहले सूची बनाकर सब जुटा लीजिए।
प्रतिमा के लिए — गीली काली मिट्टी या बालू रेत, सजाने के लिए फूल।
सुहाग सामग्री (माता पार्वती के लिए) — लाल चुनरी, सिंदूर, कुमकुम, मेहँदी, बिंदी, चूड़ियाँ, बिछिया, पायल, काजल, कंघी, आलता, अबीर, चंदन, महावर और अन्य शृंगार वस्तुएँ।
शिवजी के लिए — धोती और अंगोछा।
पूजन सामग्री — रोली, अक्षत, हल्दी, चंदन, घी का दीपक, रुई की बत्ती, अगरबत्ती, कपूर, माचिस, मौली।
कलश व अभिषेक — कलश, उस पर रखने के लिए नारियल, आम के पत्ते, दूर्वा घास, बेलपत्र, शमी पत्र, तुलसी दल, जल व गंगाजल।
पंचामृत के लिए — दूध, दही, घी, शहद और शक्कर।
प्रसाद — मौसमी फल, मिठाई, खीर, हलवा, भिगोए हुए चने, केला, सेब।
सुहाग सामग्री का क्या करें?
पूजा के अगले दिन चढ़ाई गई सुहाग सामग्री किसी सुहागिन ब्राह्मणी को और धोती-अंगोछा ब्राह्मण को दान कर दिया जाता है। इसे घर में रखकर स्वयं इस्तेमाल करने की परंपरा नहीं है। कई घरों में सास इसी दिन बहू को सिंधारा यानी सुहाग की पिटारी भेंट करती हैं।
हरतालिका तीज में पानी पी सकते हैं या नहीं?
यह सबसे ज़्यादा पूछा जाने वाला सवाल है, और इसका जवाब उतना सीधा नहीं जितना लोग बताते हैं।
परंपरागत नियम: यह निर्जला व्रत है — सूर्योदय से अगली सुबह पारण तक न अन्न, न जल। यही कारण है कि इसे करवा चौथ से भी कठिन माना जाता है।
व्यवहार में: बहुत से घरों और क्षेत्रों में महिलाएँ संध्या की पूजा पूरी होने के बाद जल ग्रहण कर लेती हैं। यह छूट पीढ़ियों से चली आ रही है और इसे व्रत भंग नहीं माना जाता।
सेहत की बात — इसे हल्के में मत लीजिए
निर्जला व्रत हर किसी के लिए नहीं है। गर्भवती महिलाएँ, स्तनपान कराने वाली माताएँ, मधुमेह या रक्तचाप की रोगी, और बीमार या कमज़ोर महिलाएँ निर्जला व्रत न रखें। परंपरा में भी इनके लिए छूट है — फलाहार लेकर या जल ग्रहण करके व्रत रखा जा सकता है।
अगर व्रत के दौरान चक्कर आए, आँखों के आगे अँधेरा छाए, बहुत ज़्यादा कमज़ोरी लगे या धड़कन तेज़ हो — तुरंत जल या नींबू-पानी लीजिए और ज़रूरत हो तो डॉक्टर से संपर्क कीजिए। कोई भी व्रत आपकी सेहत से बड़ा नहीं है, और कोई शास्त्र यह नहीं कहता कि शरीर को हानि पहुँचाकर पूजा की जाए।
हरतालिका तीज में कौन से रंग की साड़ी पहननी चाहिए?
हरा रंग सबसे शुभ माना जाता है — और इसके पीछे कारण है। हरा प्रकृति, नवजीवन और समृद्धि का रंग है, और तीज स्वयं वर्षा ऋतु के बाद धरती के हरे हो जाने का उत्सव है। हरी साड़ी, हरी चूड़ियाँ और मेहँदी — तीनों मिलकर तीज का पहनावा पूरा करते हैं।
लाल भी शुभ है, विशेषकर विवाहित महिलाओं के लिए, क्योंकि यह सौभाग्य से जुड़ा माना जाता है। हरे और लाल का मेल तीज का सबसे पारंपरिक रूप है।
पीला भी चलता है — यह शिव-पूजा से जुड़ा रंग है और चौकी पर पीला वस्त्र बिछाने की परंपरा इसी से है।
काला और सफ़ेद इस दिन आमतौर पर टाले जाते हैं। यह शास्त्रीय आदेश नहीं, सामाजिक रीत है।
शृंगार की पूरी सूची और हर अंग का अर्थ जानने के लिए हमारी सोलह शृंगार गाइड देखिए, और बिंदी माथे पर ही क्यों लगती है — यह भी इसी परंपरा का हिस्सा है।
तीन तीज होती हैं — और ज़्यादातर लोग गड़बड़ा जाते हैं
अगर आपने कभी सोचा है कि "तीज तो पिछले महीने भी थी", तो आप ग़लत नहीं थीं। साल में तीन तीज आती हैं।
१. हरियाली तीज — श्रावण शुक्ल तृतीया। 2026 में 15 अगस्त। यह वर्षा और हरियाली का उत्सव है, और शिव-पार्वती के पुनर्मिलन की स्मृति। इस दिन झूला झूलने, मेहँदी लगाने और लोकगीत गाने की परंपरा है। व्रत अपेक्षाकृत सरल होता है।
२. कजरी तीज — भाद्रपद कृष्ण तृतीया, जिसे बड़ी तीज भी कहते हैं। 2026 में 31 अगस्त। यह हरियाली तीज के लगभग पंद्रह दिन बाद आती है और उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश में विशेष रूप से मनाई जाती है।
३. हरतालिका तीज — भाद्रपद शुक्ल तृतीया। 2026 में 14 सितंबर। हरियाली तीज से ठीक एक चंद्रमास बाद। यही तीनों में सबसे कठिन है, क्योंकि यही निर्जला है।
सबसे बड़ा फ़र्क़: हरियाली तीज उत्सव है — झूला, गीत, मिठाई। हरतालिका तीज तप है — निर्जल उपवास और रात्रि जागरण। दोनों में शिव-पार्वती की पूजा होती है, पर भाव अलग है।
अविवाहित लड़कियाँ यह व्रत क्यों रखती हैं?
क्योंकि कथा ही एक अविवाहित लड़की की है।
पार्वती जब यह व्रत कर रही थीं, तब वे विवाहित नहीं थीं — वे मनचाहे वर की कामना से तप कर रही थीं। इसलिए परंपरा में कहा गया है कि जो कुँआरी कन्या यह व्रत करती है, उसे मनोवांछित वर प्राप्त होता है, और सुहागिन स्त्री को अखंड सौभाग्य।
विधवा महिलाएँ भी यह व्रत रख सकती हैं — कई परंपराओं में इसका उल्लेख मिलता है। इसे केवल विवाहित स्त्रियों तक सीमित मानना एक सामाजिक धारणा है, शास्त्रीय नियम नहीं।
तीज के दिन बाल धोने चाहिए या नहीं?
यहाँ मैं ईमानदारी से बात रखूँगी, क्योंकि इस पर बहुत भ्रम है।
किसी शास्त्र या पुराण में यह नियम नहीं मिलता कि तीज के दिन बाल नहीं धोने चाहिए। यह एक क्षेत्रीय लोक-मान्यता है, जो कुछ इलाक़ों में मानी जाती है और कुछ में बिल्कुल नहीं।
जो बात ज़रूर कही गई है वो यह है कि पूजा से पहले स्नान करके शुद्ध और उज्ज्वल वस्त्र धारण करने चाहिए। यानी शुद्धता का आग्रह है, बाल न धोने का नहीं।
व्यावहारिक सलाह यह है — बाल सुबह जल्दी धो लीजिए ताकि प्रदोष काल की पूजा तक सूख जाएँ। निर्जला व्रत में गीले बालों के साथ लंबे समय बैठना कमज़ोरी बढ़ा सकता है। और अगर आपके घर में यह रीत मानी जाती है, तो एक दिन पहले धो लीजिए — बात वहीं ख़त्म।
व्रत का पारण कैसे करें?
पारण अगली सुबह किया जाता है, यानी 15 सितंबर की सुबह।
सबसे पहले प्रातःकाल की पूजा पूरी कीजिए, माता पार्वती को चढ़ाया सिंदूर अपनी माँग में लगाइए, और मिट्टी की प्रतिमाओं को जल में विसर्जित कीजिए।
फिर व्रत खोलिए — पर सीधे भारी भोजन से नहीं। पहले जल, फिर कुछ मीठा या फल, उसके बाद हल्का भोजन। रात भर निर्जल रहने के बाद पेट को धीरे-धीरे लौटाना चाहिए, वरना उल्टी, सिरदर्द या पेट की तकलीफ़ हो सकती है।
विदेश में रहने वाली महिलाओं के लिए — आपके शहर में तीज किस दिन?
अगर आप सिडनी, न्यू जर्सी या लंदन से यह पढ़ रही हैं, तो सबसे पहले एक बात जान लीजिए — जो शायद ही कोई बताता हो।
⚠️ भारत के बाहर हरतालिका तीज हमेशा 14 सितंबर को नहीं पड़ती।
तृतीया तिथि भारतीय समय से 13 सितंबर सुबह 7:08 से 14 सितंबर सुबह 7:06 तक रहती है। आपकी घड़ी में यही अवधि दूसरी तारीख़ पर आ जाती है। न्यूयॉर्क में यह 12 सितंबर रात 9:38 से शुरू होकर 13 सितंबर शाम 9:36 पर समाप्त हो जाती है — यानी उसमें जो सूर्योदय आता है, वो 13 सितंबर का है, 14 का नहीं।
उदया तिथि के नियम से — यानी सूर्योदय के समय जो तिथि चल रही हो — अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और खाड़ी देशों में तीज भारत से एक दिन पहले पड़ती है।
| शहर | तीज किस दिन | सूर्योदय | सूर्यास्त (प्रदोष आरंभ) |
|---|---|---|---|
| सिडनी, ऑस्ट्रेलिया | सोम, 14 सितंबर | 5:56 | 17:45 |
| मेलबर्न, ऑस्ट्रेलिया | सोम, 14 सितंबर | 6:22 | 18:09 |
| ऑकलैंड, न्यूज़ीलैंड | सोम, 14 सितंबर | 6:23 | 18:10 |
| सिंगापुर | सोम, 14 सितंबर | 6:57 | 19:03 |
| दुबई, यूएई | रवि, 13 सितंबर | 6:04 | 18:25 |
| दोहा, क़तर | रवि, 13 सितंबर | 5:19 | 17:40 |
| लंदन, ब्रिटेन | रवि, 13 सितंबर | 6:32 | 19:19 |
| टोरंटो, कनाडा | रवि, 13 सितंबर | 6:54 | 19:31 |
| न्यूयॉर्क / न्यू जर्सी, अमेरिका | रवि, 13 सितंबर | 6:35 | 19:08 |
| शिकागो, अमेरिका | रवि, 13 सितंबर | 6:28 | 19:03 |
| ह्यूस्टन / डलास, अमेरिका | रवि, 13 सितंबर | 7:05 | 19:28 |
| सैन फ़्रांसिस्को, अमेरिका | रवि, 13 सितंबर | 6:48 | 19:17 |
| भारत (नई दिल्ली) | सोम, 14 सितंबर | 6:05 | 18:27 |
सूर्योदय-सूर्यास्त हर शहर के अपने अक्षांश-देशांतर से खगोलीय गणना द्वारा निकाले गए हैं। तिथि उदया तिथि के नियम से तय की गई है (तृतीया: 13 सित 7:08 – 14 सित 7:06 IST)। बड़े शहर में जगह-जगह कुछ मिनट का अंतर रहता है। यदि आपका परिवार किसी विशेष पंचांग को मानता है, तो उसी का अनुसरण कीजिए।
🕐 इस तालिका को कैसे पढ़ें
व्रत आपके शहर के सूर्योदय से शुरू होगा, उसी तारीख़ को जो ऊपर लिखी है।
प्रदोष काल — मुख्य पूजा का समय — आपके शहर के सूर्यास्त से शुरू होकर लगभग डेढ़ घंटे तक रहता है।
रात्रि जागरण उसके बाद, और अगली सुबह पारण।
आप भारत से "पीछे" या "आगे" नहीं हैं। आपका सूर्योदय ही आपका सूर्योदय है। यह परंपरा हमेशा आपके ऊपर के आकाश से गिनी गई है, किसी और देश की घड़ी से नहीं।
विदेश में पूजा सामग्री कहाँ से मिले?
यही वो बात है जो सबसे ज़्यादा चिंता देती है — यह डर कि सही सामान न हो तो व्रत अधूरा रह जाएगा। नहीं रहेगा। पर जितना पास पहुँच सकें, वो तरीक़ा यह है।
मिट्टी — बग़ीचे की साफ़ मिट्टी चलेगी, और विदेश में ज़्यादातर परिवार यही इस्तेमाल करते हैं। बग़ीचा न हो तो किसी भी क्राफ़्ट या खिलौने की दुकान से मिलने वाली air-dry modelling clay पूरी तरह स्वीकार्य है — कई माँएँ बच्चों के साथ मिलकर उसी से सुंदर छोटी प्रतिमाएँ बनाती हैं। आटा भी चलता है। आप मूर्ति नहीं गढ़ रहीं, एक भाव गढ़ रही हैं।
बेलपत्र और शमी पत्र — विदेश में सचमुच मुश्किल हैं। जहाँ भारतीय समुदाय बड़ा है — न्यू जर्सी का एडिसन, लंदन का साउथॉल, सिडनी का हैरिस पार्क, टोरंटो की जेरार्ड स्ट्रीट — वहाँ की भारतीय दुकानों में त्योहार से पहले ताज़े मिल जाते हैं। न मिलें तो तुलसी या कोई भी साफ़, बिना दाग़ का हरा पत्ता भाव सहित अर्पित करना हर परंपरा में स्वीकार्य माना गया है।
सुहाग सामग्री — सिंदूर, चूड़ियाँ, लाल चुनरी, काजल, कंघी — ये भारतीय किराना दुकानों में साल भर मिलती हैं, और अब लगभग हर शहर में ऑनलाइन भारतीय स्टोर हैं जो कुछ दिनों में पहुँचा देते हैं। अपने शहर की तारीख़ से कम से कम एक हफ़्ता पहले मँगा लीजिए।
कलश और दीपक — कोई भी छोटा पीतल या ताँबे का पात्र चल जाएगा। बहुत से परिवार अपनी पहले से रखी स्टील की पूजा थाली इस्तेमाल करते हैं। घी का दीपक न मिले तो टीलाइट भी चलेगी।
मेलबर्न की एक दादी ने एक बार कहा था, जो दोहराने लायक़ है — "चालीस साल से यह व्रत रख रही हूँ। तीस राजस्थान में, दस यहाँ। मिट्टी अलग थी। आसमान अलग था। और कुछ अलग नहीं था।"
काम वाले दिन व्रत कैसे निभाएँ?
भारत में तीज एक ऐसी लय में आती है जिसे पूरा मोहल्ला साथ जीता है। विदेश में वो एक साधारण रविवार या सोमवार बनकर आती है — मीटिंग, बच्चों का स्कूल, और आसपास कोई नहीं जिसे पता हो कि आज क्या दिन है। असली कठिनाई यही है, भूख नहीं।
व्रत लगभग बारह से तेरह घंटे का रहेगा — सिडनी में 11 घंटे 48 मिनट, न्यूयॉर्क में 12 घंटे 32 मिनट, लंदन में 12 घंटे 47 मिनट। इसी हिसाब से दिन बाँधिए।
सुबह की पूजा घर के जागने से पहले कर लीजिए। बीस शांत मिनट, दिन शुरू होने से पहले — बहुत सी महिलाओं के लिए यही दिन का सबसे अच्छा हिस्सा बन जाता है।
दफ़्तर में किसी एक को बता दीजिए। अनुमति के लिए नहीं, बस इसलिए कि कोई जानता हो। लंबी मीटिंग तब आसान लगती है।
मुख्य पूजा सूर्यास्त के बाद है, जो इन शहरों में काम के घंटों के बाद ही पड़ती है — न्यूयॉर्क में 7:08, लंदन में 7:19, सिडनी में 5:45। समय मिल जाएगा।
रात्रि जागरण संभव न हो तो अपराध-बोध मत पालिए। जितना जाग सकें जागिए, जो याद हो वो गाइए, और सो जाइए। परंपरा में सामर्थ्य के अनुसार करने की छूट हमेशा रही है — वो छूट ठीक ऐसी ही ज़िंदगियों के लिए है।
और सेहत की बात, जो विदेश में और ज़्यादा मायने रखती है — वहाँ आसपास परिवार नहीं होता जो आपकी तबीयत भाँप ले। गर्भवती महिलाएँ, स्तनपान कराने वाली माताएँ, मधुमेह या रक्तचाप की रोगी और बीमार महिलाएँ निर्जला व्रत न रखें। फलाहार या जल लेकर व्रत रखिए — यह पूरी तरह उचित है। चक्कर या कमज़ोरी लगे तो तुरंत जल लीजिए। कोई व्रत आपकी सेहत से बड़ा नहीं।
अपने बच्चों को यह दिन कैसे समझाएँ
विदेश में तीज पर आप जो सबसे क़ीमती काम कर सकती हैं, शायद यही है।
सिडनी या शिकागो में पल रही बेटी इसे वैसे नहीं सीखेगी जैसे आपने सीखा था — दादी से, पड़ोस से, पूरी गली की एक साथ तैयारी की गंध से। अगर यह उस तक पहुँचनी है, तो आपसे ही पहुँचेगी — और कहानी बनकर पहुँचेगी, आदेश बनकर नहीं।
तो उसे असली कहानी सुनाइए। पार्वती शिव से विवाह करना चाहती थीं। पिता ने बिना पूछे कहीं और तय कर दिया। और तब उनकी सखियाँ — कोई देवता नहीं, कोई सेना नहीं, उनकी सहेलियाँ — उन्हें वन में ले जाकर छिपा आईं, ताकि वो अपना चुनाव बचा सकें। इसीलिए इस व्रत का नाम हरतालिका है: हरत् यानी हरण, और आलिका यानी सखी।
उसे अपने हाथों से एक छोटी मिट्टी की मूर्ति बनाने दीजिए। थोड़ी मिट्टी गिरने दीजिए। पूछने दीजिए कि मिट्टी गीली क्यों करनी है। उसे तिथि का समय याद नहीं रहेगा। उसे यह याद रहेगा कि एक रविवार उसकी माँ ने मिट्टी से कुछ बनाया था और एक ऐसी लड़की की कहानी सुनाई थी जो झुकी नहीं।
और अगर आप इस बार अकेली हैं, आसपास कोई तीज नहीं मना रहा — तो याद रखिए कि इस व्रत की जड़ में भी एक अकेली लड़की थी, जो घर से दूर एक गुफा में बैठकर पूजा कर रही थी। उसके पास भी कोई मंदिर नहीं था, कोई पंडित नहीं था। बस मिट्टी, संकल्प और सखियों का साथ था। आपके पास भी वही तीनों हैं — बस सखियाँ अब वीडियो कॉल पर हैं।
आख़िर में
यह व्रत केवल त्याग का नहीं, चुनाव का है
हरतालिका तीज को अक्सर "पति की लंबी उम्र का व्रत" कहकर सीमित कर दिया जाता है। पर कथा कुछ और कहती है। इसकी नायिका वो लड़की है जिसने पिता का तय किया रिश्ता ठुकराकर अपना चुनाव किया, और जिसकी सखियाँ उसे बचाने के लिए वन तक ले गईं। यह व्रत संकल्प का उत्सव है — और उस बहनापे का, जो हर औरत की सबसे बड़ी ताक़त रहा है। 14 सितंबर को जब आप निर्जल बैठें, तो यह याद रखिए कि आप क्या मना रही हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल — FAQs
2026 में हरतालिका तीज कब है?
हरतालिका तीज व्रत में पानी पी सकते हैं?
हरतालिका तीज में कौन से रंग की साड़ी पहननी चाहिए?
हरतालिका तीज व्रत में क्या-क्या सामान लगता है?
हरतालिका तीज और हरियाली तीज में क्या अंतर है?
अविवाहित लड़कियाँ हरतालिका तीज का व्रत क्यों रखती हैं?
हरतालिका तीज के दिन बाल धोने चाहिए या नहीं?
हरतालिका तीज का नाम "हरतालिका" क्यों पड़ा?
व्रत का पारण कैसे और कब करें?
विदेश में रहते हुए मुहूर्त कैसे तय करें?
📷 AI-generated images. For illustration only.
🙏 तिथि व मुहूर्त पंचांग पर आधारित हैं और क्षेत्र के अनुसार कुछ भिन्न हो सकते हैं। व्रत से जुड़ी स्वास्थ्य संबंधी किसी भी शंका के लिए अपने चिकित्सक से परामर्श लीजिए।