बुधवार की कथा उन थोड़ी-सी व्रत-कथाओं में है जिनमें डर लगता है।

बाक़ी वारों की कथाओं में कोई ग़रीब होता है, कोई बीमार, कोई संतानहीन — और अंत में सब ठीक हो जाता है। बुधवार की कथा में एक आदमी के साथ वह होता है जो सबसे अजीब है: वह रास्ते में अपने ही जैसा दूसरा आदमी देख लेता है, और उसकी अपनी पत्नी बता नहीं पाती कि असली कौन है।

पहले पूरी कथा। उसके बाद वह बात, जो कथा के तीन अलग रूपों को साथ रखकर देखने पर निकलती है — और जो शायद इस कथा की सबसे दिलचस्प बात है।

बुधवार व्रत कथा

समतापुर में मधुसूदन नाम का एक व्यक्ति रहता था। उसकी पत्नी संगीता अपने मायके बलरामपुर गई हुई थी। कई दिन बीत गए, तो मधुसूदन उसे लेने ससुराल पहुँचा।

अगली सुबह जब वह चलने को तैयार हुआ, तो घर के लोगों ने रोका —

"आज बुधवार है। बुधवार को किसी भी शुभ कार्य के लिए यात्रा नहीं करते। एक दिन और रुक जाओ, कल चले जाना।"

मधुसूदन नहीं माना। उसने कहा कि उसे ज़रूरी काम है, आज ही निकलना है। और वह संगीता को बैलगाड़ी में बिठाकर चल पड़ा।

पुराने घर के आँगन में एक बुज़ुर्ग दंपती दरवाज़े पर खड़े हैं, बुज़ुर्ग हाथ उठाकर मना कर रहे हैं, सामने कुरते में युवक और एक ओर लाल साड़ी में युवती व बँधा हुआ सामान — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
कथा की पहली गाँठ यही है — मना करना, और न मानना।

रास्ते में दोपहर चढ़ आई। संगीता को प्यास लगी। पास ही एक तालाब दिखा, तो मधुसूदन लोटा लेकर पानी लेने उतर गया।

लौटकर उसने जो देखा, उस पर उसे अपनी आँखों पर भरोसा नहीं हुआ।

गाड़ी में संगीता के पास बिलकुल उसी की शक्ल का एक और आदमी बैठा था। वही कद, वही कपड़े, वही आवाज़।

मधुसूदन ने ललकारा — "तू कौन है? मेरी पत्नी के पास क्यों बैठा है?"

दूसरे ने उतनी ही शांति से कहा — "मैं इसका पति हूँ। इसे अपने ससुराल से लेकर आ रहा हूँ। तू कौन है?"

संगीता दोनों को बारी-बारी देखती रह गई। उसके पास कोई जवाब नहीं था।

धूल भरी गाँव की सड़क पर बग़ल से दिखती बैलगाड़ी, जुए में जुता सफ़ेद बैल, छप्पर के नीचे बैठी लाल साड़ी में स्त्री और साथ चलता सफ़ेद कुरते में पुरुष — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
कथा के एक रूप में यह यात्रा दो किलोमीटर भी पूरी नहीं होती — गाड़ी का पहिया टूट जाता है।
गाँव के तालाब की पत्थर की सीढ़ियों पर बैठकर पीठ किए एक पुरुष पीतल के लोटे में पानी भर रहा है, पास कमल के पत्ते और बरगद का पेड़ — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
कथा का पूरा मोड़ इसी एक पल पर टिका है — जब वह गाड़ी से उतरकर दूर जाता है।

दोनों में झगड़ा बढ़ा। आवाज़ सुनकर राह चलते लोग रुक गए, भीड़ जमा हो गई। बात राजा के सिपाहियों तक पहुँची।

सिपाही दोनों को राजदरबार ले गए। राजा ने संगीता से पूछा — "बताओ, इनमें तुम्हारा पति कौन है?"

संगीता रोती रही। वह कुछ नहीं बता सकी।

राजा ने कोई फ़ैसला न कर पाने पर दोनों को क़ैद में डाल दिया।

सूर्यास्त की धूल भरी सड़क पर बैलगाड़ी के पीछे एक ही कद-काठी के दो पुरुष, दोनों एक जैसे सफ़ेद कुरते-धोती में, पीठ की ओर से दिखते हुए, गाड़ी में बैठी लाल साड़ी में स्त्री — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
कथा का असली डर यही है — दो में से किसी एक को चुनना, और न चुन पाना।
गाँव की सड़क पर जुटी भीड़ के बीच दो सिपाही लंबी लाठियाँ लिए खड़े हैं, एक हाथ उठाकर शांत रहने का इशारा कर रहा है, बाईं ओर बग़ल से खड़ी बैलगाड़ी में बैठी स्त्री — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
भीड़ भी नहीं बता पाई। कथा में यही सबसे बड़ी बेबसी है।

तब आकाश से वाणी हुई —

"मधुसूदन! तूने संगीता के माता-पिता की बात नहीं मानी और बुधवार के दिन अपनी ससुराल से प्रस्थान किया। यह सब भगवान बुधदेव के प्रकोप से हो रहा है।"

मधुसूदन ने हाथ जोड़ लिए। उसने अपनी भूल मानी, और वचन दिया कि आगे से वह बुधवार को यात्रा नहीं करेगा और बुधदेव का व्रत रखेगा।

इतना कहते ही दूसरा रूप वहीं अंतर्धान हो गया। राजा ने दोनों को छोड़ दिया। बाहर निकले तो बैलगाड़ी भी सही-सलामत खड़ी मिली।

दोनों सकुशल घर लौटे। तब से वे हर बुधवार व्रत रखने लगे, और उनका कोई काम नहीं बिगड़ा।

खुले खेतों के ऊपर विशाल संध्या-आकाश, बादलों के बीच से उतरती सुनहरी किरणें और नीचे बहुत दूर सड़क पर बैलगाड़ी की छोटी-सी परछाईं — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
आकाशवाणी ने दंड नहीं सुनाया — सिर्फ़ बताया कि यह हो क्यों रहा है।

कथा यहाँ ख़त्म होती है। पर असली बात अब शुरू होती है — क्योंकि यह कथा सिर्फ़ इसी रूप में नहीं चलती।

कथा के तीन रूप — और जो चौंकाने वाली बात निकली

मैंने यह कथा जहाँ-जहाँ मिली, वहाँ-वहाँ पढ़ी। तीन साफ़ अलग रूप मिले। और तीनों में घटनाएँ लगभग एक जैसी हैं, पर कथा को ख़त्म करने वाला देवता अलग-अलग है।

रूपकौन-कौनसंकट कहाँ शुरू होता हैकिसने ख़त्म किया
बुधवार व्रत कथामधुसूदन और संगीता, नाम सहिततालाब पर पानी लेने जानाबुधदेव — आकाशवाणी से
बुध प्रदोष कथानवविवाहित दंपती, कोई नाम नहींवही — पानी लेने जानाशिव जी — पति की मन ही मन प्रार्थना से
गणेश-भक्त वाला रूपएक व्यापारी और उसका सालागाड़ी का पहिया टूटनागणेश जी — सीख देकर, फिर क्षमा देकर

ध्यान दीजिए कि यह कोई गड़बड़ी नहीं है। जो परंपरा कथा सुना रही होती है, उसी का देवता कथा को ख़त्म करने आता है। वार का व्रत बुधदेव को लाता है। प्रदोष का व्रत शिव को लाता है। गणेश-भक्ति वाला संग्रह गणेश जी को लाता है।

कथा वही रहती है; सिर्फ़ दरवाज़ा बदल जाता है।

और जो तीनों में एक जैसा रहता है, वही कथा की असली रीढ़ है — मना करना, न मानना, रास्ते में अपने ही जैसा दूसरा, और अंत में क्षमा। न पात्रों के नाम ज़रूरी हैं, न नगर, न यह कि पानी लेने गया या पहिया टूटा।

एक छोटी बात और, जो गौर करने लायक़ है। गाड़ी का पहिया टूटने वाला हिस्सा दो अलग रूपों में मिलता है — गणेश-भक्त वाले में, और बुधवार कथा के एक रूप में भी, जहाँ यात्रा दो किलोमीटर भी पूरी नहीं होती। पानी वाला मोड़ सिर्फ़ एक धारा में है। यानी जो हिस्सा सबसे ज़्यादा जाना-पहचाना लगता है, ज़रूरी नहीं कि वही सबसे पुराना हो।

यह कथा किस ग्रंथ में है — सीधा जवाब

यह सवाल पूछा जाना चाहिए, इसलिए सीधा जवाब देता हूँ।

मुझे यह कथा किसी पुराण के पाठ में नहीं मिली। जहाँ-जहाँ खोजा, यह व्रत-कथा संग्रहों, पोथियों और उन्हीं से बने पन्नों में मिली। एक जगह तो शीर्षक ही "पौराणिक बुधवार व्रत कथा" था — पर उसी पन्ने पर किसी पुराण का नाम और अध्याय नहीं दिया गया।

यह दावा नहीं कि पूरे संस्कृत साहित्य में यह कहीं नहीं है। यह सिर्फ़ मेरी खोज का ईमानदार नतीजा है।

पर बुध का शास्त्रीय परिचय ज़रूर मिलता है, और वह इस कथा से जुड़ भी जाता है। भागवत पुराण के नवम स्कंध, अध्याय 14 के अनुसार बुध का जन्म चंद्रमा और तारा से हुआ — और तारा बृहस्पति की पत्नी थीं, जिन्हें चंद्रमा अपने घर ले गए थे। वही कथा विष्णु पुराण 4.6, मत्स्य पुराण 23-24 और ब्रह्मांड पुराण में भी है।

यानी जिस ग्रह का यह दिन है, उसका जन्म ही उस घटना से हुआ जिसमें एक स्त्री एक घर से दूसरे घर गई थीं। कथा शास्त्र में नहीं मिली — पर उसका ताना-बाना शास्त्र से मेल खाता है। बुधवार व्रत की पूरी विधि और शास्त्रीय हिसाब अलग लेख में है।

एक और छोटी बात, जो बताती है कि इन संग्रहों को कितने भरोसे से पढ़ना चाहिए। जिन पन्नों पर मैंने कथा के साथ पूजा-विधि भी देखी, उनमें एक पन्ना गणेश जी की पूजा में बेलपत्र और सफ़ेद फूल गिना रहा था — जबकि बेलपत्र शिव जी को चढ़ता है। कथा-संग्रहों में सामग्री आपस में इसी तरह मिल जाती है। इसलिए कथा पढ़िए, पर विधि किसी एक भरोसेमंद जगह से लीजिए।

कथा कहना क्या चाहती है

ऊपर से देखने पर यह डराने वाली कथा लगती है — नियम तोड़ोगे तो यह होगा। पर ध्यान से पढ़िए तो कथा में दंड कहीं है ही नहीं।

मधुसूदन को न कोई सज़ा मिलती है, न कोई हानि होती है। कुछ खोता नहीं — न पत्नी, न गाड़ी, न घर। आकाशवाणी भी दंड नहीं सुनाती; वह सिर्फ़ बताती है कि यह हो क्यों रहा है। और जैसे ही वह भूल मान लेता है, सब पहले जैसा हो जाता है। गाड़ी तक सही-सलामत मिल जाती है।

यानी कथा का विषय सज़ा नहीं, पहचान है। जो आदमी घर के बड़ों की बात नहीं सुनता, उसकी अपनी पत्नी उसे पहचान नहीं पाती। यह संयोग नहीं — यही कथा का पूरा रूपक है।

और बुध बुद्धि और वाणी के ग्रह हैं। उनके दिन की कथा का बिगड़ना ठीक वहीं से शुरू होता है जहाँ एक आदमी सुनना बंद कर देता है।

यह लेख का अपना पाठ है, कथा में लिखी बात नहीं। पर कथा के तीनों रूप इसी एक ढाँचे पर खड़े हैं, इसलिए कहने लायक़ लगा।

कथा कब और कैसे पढ़ें

नियम भारी नहीं हैं। जो चलन सबसे ज़्यादा मिलता है, वह यह:

गणेश जी की आरती — विधि

दो हाथों में थामी पीतल की आरती की थाली, जिसमें पाँच जलती बातियाँ, कुमकुम, अक्षत, लाल गुड़हल और दूर्वा का गुच्छा; पीछे हरे वस्त्र पर गणेश प्रतिमा और मोदक — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
आरती की थाली में दूर्वा भी रखी जाती है — बुधवार की पूजा में वह हर जगह लौटती है।

आरती कथा के तुरंत बाद होती है। क्रम यह है:

  1. थाली में पाँच बातियाँ जलाइए — घी या तेल की। साथ में कुमकुम, अक्षत, एक फूल और दूर्वा रखिए।
  2. थाली दोनों हाथों से पकड़कर घड़ी की दिशा में घुमाइए।
  3. परंपरा में क्रम यह बताया गया है — पहले चार बार चरणों की ओर, फिर दो बार नाभि तक, फिर एक बार मुख की ओर, और अंत में सात बार पूरे विग्रह पर।
  4. आरती के बाद थाली सबके पास ले जाइए; हर कोई आरती की गर्मी माथे से लगाता है।
  5. फिर जल छिड़ककर प्रसाद बाँटिए — मोदक, लड्डू या गुड़।

आरती के पद इस लेख में नहीं छापे गए हैं, और इसकी वजह बता देनी चाहिए। पद छापने का मतलब होता है किसी एक पाठ को सही ठहराना, और उसके लिए एक प्रामाणिक मुद्रित स्रोत चाहिए — जो मैं जाँच न सका। स्रोत पर शक नहीं है; यह मेरी अपनी सीमा है। इसलिए विधि दी है, पद नहीं। आरती का पाठ अपने घर की पोथी से या किसी भरोसेमंद प्रकाशन से लीजिए।

भारत से बाहर — बच्चे को यह कथा कैसे सुनाएँ

आधुनिक बैठक में क़ालीन पर बैठी दादी और उनके पास आठ साल का पोता, गोद में खुली पुस्तक, पास पीतल की गणेश प्रतिमा, दूर्वा और जलता दीया; खिड़की के बाहर बर्फ़ीली शाम — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
जिस बच्चे ने बैलगाड़ी नहीं देखी, उसके लिए कथा का पुल अलग बनाना पड़ता है।

अमेरिका, कनाडा, इंग्लैंड या ऑस्ट्रेलिया में पले बच्चे के सामने यह कथा रखिए तो पहला सवाल यही आएगा — "पर ऐसा सचमुच हुआ था क्या?" और यहीं ज़्यादातर माता-पिता अटक जाते हैं।

तीन बातें काम आती हैं।

पहली — सवाल टालिए मत। साफ़ कह दीजिए कि यह कथा है, इतिहास नहीं; और यह भी कि यह किसी पुराण में नहीं, व्रत-कथाओं की पोथियों में मिलती है। बच्चे को सच बताने से कथा छोटी नहीं होती। जो कथा सच के नाम पर टिकाई जाती है, वह पहली बार पकड़े जाने पर गिर जाती है — जो अपने अर्थ पर टिकी हो, वह टिकी रहती है।

दूसरी — तीनों रूप बता दीजिए। बड़े बच्चों को यह सबसे ज़्यादा दिलचस्प लगता है — एक ही कहानी तीन जगह अलग-अलग देवता के साथ चलती है। इससे उन्हें यह समझ आता है कि परंपरा जड़ नहीं है, वह चलती-फिरती चीज़ है जो हर घर में थोड़ी बदल जाती है। यह समझ आगे बहुत काम आती है।

तीसरी — पुल घटना से मत बनाइए, भाव से बनाइए। बैलगाड़ी और राजदरबार उसकी दुनिया में नहीं हैं। पर "किसी बड़े ने रोका और मैंने नहीं सुना" — यह हर उम्र में होता है। और "मुझे कोई पहचान नहीं रहा" वाला डर तो बच्चों में और ज़्यादा गहरा होता है।

एक व्यावहारिक बात — भारत से बाहर घर पर पूजा करते समय कथा को अंग्रेज़ी में सुनाने से मत हिचकिए। परंपरा में कथा सुनने पर ज़ोर है, किसी ख़ास भाषा पर नहीं। जो बच्चा हिंदी में सुनकर कुछ न समझे, उससे बेहतर वह है जो अंग्रेज़ी में सुनकर पूरी कथा पकड़ ले।

निचोड़। बुधवार की कथा डराने के लिए नहीं है। उसमें कोई सज़ा नहीं मिलती, कुछ खोता नहीं, और क्षमा माँगते ही सब लौट आता है — गाड़ी तक।

वह एक ही बात कहती है, और तीनों रूपों में वही कहती है: जो सुनना बंद कर देता है, उसे अपने लोग पहचानना बंद कर देते हैं। यह बात बुधवार से भी पुरानी है, और उस दिन से बड़ी भी।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

बुधवार व्रत कथा क्या है — पूरी कथा संक्षेप में?
समतापुर के मधुसूदन अपनी पत्नी संगीता को उसके मायके बलरामपुर से लेने जाते हैं। चलते समय ससुराल वाले रोकते हैं — "आज बुधवार है, बुधवार को किसी शुभ कार्य के लिए यात्रा नहीं करते।" मधुसूदन नहीं मानता और पत्नी को बैलगाड़ी में बिठाकर निकल पड़ता है। रास्ते में पत्नी को प्यास लगती है; वह तालाब से पानी लेने उतरता है, और लौटकर देखता है कि गाड़ी में उसी की शक्ल का एक और आदमी बैठा है — वही कपड़े, वही आवाज़ — जो कहता है कि असली पति वही है। संगीता पहचान नहीं पाती। भीड़ जुटती है, राजा के सिपाही दोनों को दरबार ले जाते हैं, और राजा फ़ैसला न कर पाने पर दोनों को क़ैद कर देता है। तब आकाशवाणी होती है कि यह सब बुधदेव के प्रकोप से हो रहा है। मधुसूदन भूल मानकर व्रत का वचन देता है, दूसरा रूप अंतर्धान हो जाता है, और दोनों सकुशल घर लौटते हैं।
क्या बुधवार व्रत कथा किसी पुराण में है?
मुझे यह कथा किसी पुराण के पाठ में नहीं मिली। जहाँ-जहाँ खोजा, यह व्रत-कथा संग्रहों और पोथियों में मिली; एक पन्ने का शीर्षक तो "पौराणिक बुधवार व्रत कथा" था, पर उसी पन्ने पर किसी पुराण का नाम और अध्याय नहीं दिया गया। यह दावा नहीं कि पूरे संस्कृत साहित्य में यह कहीं नहीं है — यह मेरी खोज का ईमानदार नतीजा है। पर बुध का शास्त्रीय परिचय ज़रूर मिलता है, और वह कथा से मेल खाता है: भागवत पुराण 9.14 के अनुसार बुध का जन्म चंद्रमा और तारा से हुआ, और तारा बृहस्पति की पत्नी थीं जिन्हें चंद्रमा अपने घर ले गए थे। वही वृत्तांत विष्णु पुराण 4.6, मत्स्य पुराण 23-24 और ब्रह्मांड पुराण में भी है। यानी जिस ग्रह का यह दिन है, उसका जन्म ही उस घटना से हुआ जिसमें एक स्त्री एक घर से दूसरे घर गई थीं।
क्या बुध प्रदोष की कथा भी यही कथा है?
हाँ, घटनाएँ वही हैं — पर उसे ख़त्म करने वाले देवता अलग हैं। बुध प्रदोष की कथा में भी एक व्यक्ति ससुराल वालों के मना करने पर भी बुधवार को पत्नी को लेकर निकलता है, रास्ते में पानी लेने जाता है, लौटकर अपना हमशक्ल पाता है, और पत्नी पहचान नहीं पाती। पर वहाँ न पात्रों के नाम दिए जाते हैं, और निवारण शिव जी से होता है — पति मन ही मन शिव से प्रार्थना करता है और अपनी भूल मानता है, और प्रार्थना पूरी होते ही दूसरा रूप विलीन हो जाता है। तीसरा रूप भी मिलता है, जिसमें पात्र एक गणेश-भक्त व्यापारी और उसका साला हैं, गाड़ी का पहिया टूट जाता है, और सीख गणेश जी देते हैं। यानी एक ही कथा को वही देवता ख़त्म करता है जिसकी परंपरा उसे सुना रही हो।
बुधवार व्रत कथा कब और कैसे पढ़नी चाहिए?
कथा बुधवार की पूजा के बाद और आरती से ठीक पहले पढ़ी जाती है; बहुत से घरों में शाम को, जब सब इकट्ठे हों। घर का कोई भी सदस्य पढ़ सकता है, स्त्री या पुरुष — कथा पर किसी का अधिकार नहीं बँटा। परंपरा में सुनने वाले हाथ में अक्षत यानी कुछ साबुत चावल लेकर बैठते हैं, जिन्हें कथा पूरी होने पर गणेश जी को अर्पित कर दिया जाता है। जितने बुधवार का संकल्प लिया हो, उतने बुधवार कथा दोहराई जाती है — सात और इक्कीस सबसे प्रचलित हैं। कथा के बाद आरती, फिर प्रसाद — मोदक, लड्डू या गुड़।
गणेश जी की आरती कैसे उतारी जाती है?
थाली में पाँच बातियाँ जलाइए — घी या तेल की — और साथ में कुमकुम, अक्षत, एक फूल तथा दूर्वा रखिए। थाली दोनों हाथों से पकड़कर घड़ी की दिशा में घुमाइए। परंपरा में क्रम यह बताया गया है: पहले चार बार चरणों की ओर, फिर दो बार नाभि तक, फिर एक बार मुख की ओर, और अंत में सात बार पूरे विग्रह पर। आरती के बाद थाली सबके पास ले जाइए; हर कोई आरती की गर्मी माथे से लगाता है। फिर जल छिड़ककर प्रसाद बाँटिए। आरती के पद इस लेख में नहीं छापे गए — पद छापने का अर्थ किसी एक पाठ को सही ठहराना है, और उसके लिए प्रामाणिक मुद्रित स्रोत चाहिए जो हम जाँच न सके; इसलिए विधि दी है, पद नहीं।
इस कथा का असली अर्थ क्या है?
ऊपर से यह डराने वाली कथा लगती है, पर ध्यान से पढ़िए तो इसमें दंड कहीं है ही नहीं। मधुसूदन को न सज़ा मिलती है, न कोई हानि होती है — न पत्नी खोती है, न गाड़ी, न घर। आकाशवाणी भी दंड नहीं सुनाती; वह सिर्फ़ बताती है कि यह हो क्यों रहा है। और भूल मानते ही सब लौट आता है, गाड़ी तक। इसलिए कथा का विषय सज़ा नहीं, पहचान है: जो आदमी घर के बड़ों की बात सुनना बंद कर देता है, उसकी अपनी पत्नी उसे पहचान नहीं पाती। और यह बात बुध के स्वभाव से भी मेल खाती है — बुध बुद्धि और वाणी के ग्रह हैं, और उनके दिन की कथा का बिगड़ना ठीक वहीं से शुरू होता है जहाँ एक आदमी सुनना बंद करता है।
भारत से बाहर पले बच्चे को यह कथा कैसे सुनाएँ?
तीन बातें काम आती हैं। पहली — "क्या यह सचमुच हुआ था?" वाला सवाल टालिए मत। साफ़ कह दीजिए कि यह कथा है, इतिहास नहीं, और यह पुराण में नहीं बल्कि व्रत-कथाओं की पोथियों में मिलती है; जो कथा सच के नाम पर टिकाई जाती है वह पहली बार पकड़े जाने पर गिर जाती है, जो अपने अर्थ पर टिकी हो वह टिकी रहती है। दूसरी — तीनों रूप बता दीजिए; बड़े बच्चों को यह सबसे दिलचस्प लगता है कि एक ही कहानी तीन जगह तीन अलग देवता के साथ चलती है, और इससे समझ आता है कि परंपरा जड़ नहीं, चलती-फिरती चीज़ है। तीसरी — पुल घटना से नहीं, भाव से बनाइए: बैलगाड़ी और राजदरबार उसकी दुनिया में नहीं हैं, पर "किसी बड़े ने रोका और मैंने नहीं सुना" हर उम्र में होता है। और कथा अंग्रेज़ी में सुनाने से मत हिचकिए — परंपरा में ज़ोर कथा सुनने पर है, किसी ख़ास भाषा पर नहीं।
बुधवार व्रत कथा के साथ क्या भोग और प्रसाद रखा जाता है?
सबसे प्रचलित है मोदक या बूँदी के लड्डू, और गुड़। कुछ घरों में मूँग की दाल का भोग भी रखा जाता है, क्योंकि बुधवार से जुड़ी लगभग हर चीज़ हरी है। चढ़ावे में दूर्वा सबसे ज़रूरी है — फूल से भी ज़्यादा; इक्कीस या ग्यारह तिनकों का गुच्छा, जोड़े में बाँधकर। एक सावधानी बता देना ठीक होगा: व्रत-कथा संग्रहों में सामग्री आपस में मिल जाती है। जिन पन्नों पर मैंने कथा के साथ विधि देखी, उनमें एक पन्ना गणेश जी की पूजा में बेलपत्र गिना रहा था, जबकि बेलपत्र शिव जी को चढ़ता है। इसलिए कथा जहाँ से भी पढ़िए, विधि किसी एक भरोसेमंद जगह से लीजिए और उसी पर टिके रहिए।

स्रोत और सावधानी: कथा के तीनों रूप अलग-अलग खोलकर मिलाए गए — बुधवार व्रत कथा (मधुसूदन और संगीता, समतापुर और बलरामपुर; आकाशवाणी में बुधदेव का नाम), बुध प्रदोष की कथा (वही घटनाएँ, पात्रों के नाम नहीं, और निवारण शिव जी से) तथा गणेश-भक्त व्यापारी वाला रूप (गाड़ी का पहिया टूटना, और सीख गणेश जी से)। चार बातें साफ़ कह देना ज़रूरी है। पहली — यह कथा हमें किसी पुराण के पाठ में नहीं मिली; जहाँ-जहाँ खोजा, यह व्रत-कथा संग्रहों और पोथियों में मिली, और जिस पन्ने का शीर्षक "पौराणिक बुधवार व्रत कथा" था उसने भी किसी पुराण का नाम और अध्याय नहीं दिया। दूसरी — बुध का शास्त्रीय परिचय ज़रूर मिलता है: भागवत पुराण 9.14 में उनका जन्म चंद्रमा और तारा से बताया गया है, और वही वृत्तांत विष्णु पुराण 4.6, मत्स्य पुराण 23-24 तथा ब्रह्मांड पुराण में भी है। तीसरी — आरती के पद इस लेख में नहीं छापे गए; पद छापने का अर्थ किसी एक पाठ को सही ठहराना है, और उसके लिए प्रामाणिक मुद्रित स्रोत चाहिए जो हम जाँच न सके। विधि दी है, पद नहीं। चौथी — "नहीं मिला" का अर्थ "नहीं है" नहीं; यह हमारी खोज का ईमानदार नतीजा है, अंतिम निर्णय नहीं। यह लेख किसी को व्रत रखने के लिए नहीं कहता; उपवास से जुड़ा कोई भी फ़ैसला अपने डॉक्टर से पूछकर कीजिए।