आँगन में पीतल की बड़ी परात आई, और बच्चों की भीड़ उस पर टूट पड़ी — दोनों हाथ ऊपर, एक ही पुकार: "ओ ताऊ, पहले मुझे! ओ काका, पहले मुझे!" परात में हल्के पीले रंग की देसी शक्कर थी — बुरादा और छोटी-छोटी डलियाँ मिली हुई। कोई बच्चा मुट्ठी भर शक्कर लेकर बाहर भागता, फटाफट जेब में भरता और फिर लाइन में आ खड़ा होता। बड़ों को इससे मतलब था कि टीका कितना बड़ा चढ़ा; बच्चों को इससे कि किसने कितनी बार शक्कर झपटी।

यह दृश्य लगभग पचास साल पहले राजस्थान-हरियाणा के एक गाँव के तिलक समारोह का है — जिसे वहाँ "टीका" कहा जाता था। उस दिन मैं ग्यारह साल का था, और उन्हीं बच्चों में से एक।

आज वही टीका बैंक्वेट हॉल के मंच पर पाँच मिनट की रस्म बन गया है, और कई समुदायों में तो गोद भराई और अंगूठी की रस्म ने उसकी जगह ले ली है। यह बदलाव क्यों आया — उसकी वजह आपको शायद चौंका दे। वह आगे है।

तिलक की रस्म क्या होती है — सीधा जवाब

तिलक (टीका) वह रस्म है जिसमें वधू पक्ष के लोग वर के घर जाकर उसके माथे पर रोली-अक्षत का तिलक लगाते हैं, नारियल और भेंट देकर रिश्ता पक्का करते हैं। यह सगाई की ओर से वधू पक्ष की स्वीकृति है — लड़की वालों की ओर से "यह लड़का हमारा दामाद होगा" का सार्वजनिक ऐलान। इसके बदले वर पक्ष वधू के घर जाकर गोद भराई करता है। Wikipedia के Hindu wedding पन्ने पर उत्तर भारत की रस्मों में "Tilak (engagement)" लिखा मिलता है — यानी कई इलाक़ों में तिलक ही सगाई है।

एक नज़र में:

  1. कौन करता है: वधू पक्ष — अक्सर होने वाले ससुर, उनके बड़े भाई या लड़की का भाई।
  2. कहाँ: परंपरा से वर के घर; आज अक्सर बैंक्वेट हॉल में।
  3. मुख्य सामान: रोली, अक्षत, मौली बँधा नारियल, वर के कपड़े, रंगीन तौलिया, मिठाई-पताशे और शगुन की रक़म।
  4. तिलक और सगाई: उत्तर भारत के कई हिस्सों में तिलक ही सगाई है; अंगूठी की रस्म बाद में जुड़ी।
  5. आज का क्रम: पहले तिलक, फिर गोद भराई, फिर अंगूठी बदलना।

50 साल पहले गाँव का टीका कैसा होता था

राजस्थान और हरियाणा के परिवारों में प्रचलित परंपरा के अनुभव के अनुसार — और यह मेरा अपना देखा हुआ है — उस समय सगाई पक्की होने के बाद तिलक सबसे बड़ा कार्यक्रम होता था। अंगूठी की कोई रस्म नहीं होती थी। पूरा मान टीके का था।

  1. कौन आता था: वधू पक्ष के 5, 7 या 11 पुरुष वर के घर आते थे — स्त्रियाँ नहीं। साथ में वर के कपड़े, तौलिया और मिठाई में पताशे।
  2. न्योता: गाँव के एक विशेष समुदाय का व्यक्ति घर-घर जाकर बुलावा देता था — "फलां के घर आज टीका है, आपका बुलावा है।" फिर पूरा गाँव — स्त्री, पुरुष, बच्चे — उस घर में इकट्ठा होता।
  3. दिन में: यह रस्म दिन के उजाले में होती थी।
  4. बैठक: आँगन के बीच लकड़ी के पाटे या चौकी पर दरी या गद्दा बिछाकर वर को बिठाया जाता। पंडित मंत्र पढ़ते।
  5. तिलक कौन करता: वधू पक्ष का एक व्यक्ति — ज़्यादातर होने वाले ससुर या उनके बड़े भाई। वे वर के माथे पर तिलक करते और उसके सिर पर रंगीन धारीदार तौलिया या चादर रखते।
  6. नारियल और रक़म: मौली से बँधा नारियल नोटों के साथ वर के हाथ में दिया जाता, और थाली में एक तय रक़म रखी जाती।
  7. "बड़ा टीका": जिस टीके में जितनी ज़्यादा रक़म, वह गाँव में उतना ही "बड़ा टीका" माना जाता। बरसों तक मिसाल दी जाती — "फलां के घर से बड़ा टीका आज तक नहीं हुआ।"
  8. शक्कर बँटना: टीके के बाद दो-तीन लोग पीतल की परात में देसी शक्कर (बूरा) भरकर मुट्ठी-मुट्ठी बाँटते — और फिर वही बच्चों की भीड़।
गाँव के आँगन में सफ़ेद साफ़े और धोती-कुर्ते में बुज़ुर्ग पीतल की परात से हल्की पीली देसी शक्कर मुट्ठी भरकर बाँटते हुए, हाथ ऊपर उठाए हँसते बच्चों की भीड़ और एक ओर जेब में शक्कर भरता बच्चा — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
टीके के बाद परात से बँटती देसी शक्कर — और "ओ ताऊ, पहले मुझे!"

वह शक्कर आज की सफ़ेद चीनी जैसी नहीं थी — हल्के पीले रंग की, गुड़ जैसी, जिसमें बारीक बुरादा और छोटी-छोटी साबुत डलियाँ मिली रहती थीं। वाक़ई वह सादगी का, न भूल पाने वाला समय था।

तिलक में क्या-क्या दिया जाता है? (लड़के के तिलक का सामान)

यह इस विषय पर सबसे ज़्यादा खोजा जाने वाला सवाल है। सामान हर समाज में थोड़ा अलग होता है; नीचे वह सूची है जो राजस्थान-हरियाणा के परिवारों में आम है, और साथ में यह कि हर चीज़ का भाव क्या माना जाता है।

सामानकिसलिए
रोली (कुमकुम) और अक्षतमाथे पर तिलक — शुभ आरंभ का चिह्न
मौली बँधा नारियलरिश्ते की पक्की गाँठ; नोटों के साथ वर के हाथ में
रंगीन तौलिया या चादरवर के सिर पर रखा जाता है
वर के कपड़ेकुर्ता-पायजामा या आज के समय में शेरवानी/सूट का कपड़ा
पताशे और मिठाईमुँह मीठा करना; बाद में बाँटी जाती है
फल, पान और सुपारीपूजा और शगुन की थाली
दीपकतिलक के समय थाली में जलता है
शगुन (नक़द)थाली में या लिफ़ाफ़े में — अपनी सामर्थ्य भर
वर पक्ष के बड़ों के लिए साफ़े/पगड़ीकई परिवारों में पिता, भाई और करीबी पुरुषों का मान
लाल कपड़े पर पीतल की बड़ी थाली में रोली, अक्षत, मौली बँधा नारियल, जलता दीपक, पान-सुपारी, केले, सेब और पताशे, बग़ल में लाल-हरा-पीला धारीदार तौलिया, क्रीम रंग का कुर्ता और लाल लिफ़ाफ़ा — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
तिलक की थाली — रोली, अक्षत, नारियल, पताशे, रंगीन तौलिया और वर के कपड़े।

तिलक चढ़ाने की सही विधि क्या है? तिलक लगाते समय क्या बोलें?

  1. वर पूर्व की ओर मुख करके चौकी या पाटे पर बैठे; सिर पर रंगीन तौलिया या साफ़ा।
  2. पुरोहित गणेश-पूजन और संकल्प कराते हैं — मंत्र अपनी परंपरा के अनुसार।
  3. वधू पक्ष के बड़े (ससुर, उनके बड़े भाई या लड़की का भाई) अनामिका या अँगूठे से रोली का तिलक और उस पर अक्षत लगाते हैं।
  4. मौली बँधा नारियल, कपड़े, मिठाई और शगुन वर को दिए जाते हैं।
  5. वर बड़ों के पैर छूता है — चरण स्पर्श इसी रस्म का हिस्सा है।
  6. अंत में मुँह मीठा, और मिठाई या शक्कर सबमें बाँटी जाती है।

क्या बोलें? मैंने गृह्यसूत्र के जिस अंश से मिलान किया (नीचे), उसमें वर को तिलक लगाने का कोई अलग मंत्र नहीं मिला। पुरोहित हों तो वे अपनी परंपरा के मंत्र पढ़ते हैं। बिना पुरोहित के घर में करें, तो मन से आशीर्वाद के शब्द ही काफ़ी हैं — "आप दोनों का जीवन सुखी रहे।" कोई "सही" मंत्र न बोल पाने से रस्म अधूरी नहीं होती।

ग्रंथों में सगाई: फूल, फल, जौ और सोने का "कलश"

सगाई का शास्त्रीय नाम वाग्दान है — यानी "वचन से दान", कन्या के विवाह का वचन (wisdomlib पर Vagdana की परिभाषा देखें)। मैंने शांखायन गृह्यसूत्र के अंग्रेज़ी अनुवाद (अध्याय 1, खंड 6, अनुवाद: Hermann Oldenberg, साभार: sacred-texts.com) से मिलान किया। वहाँ विधि यह है:

  1. वर विवाह करना चाहे तो अपने लोगों (वरक) को कन्या के पिता के घर भेजता है।
  2. वे फूल, फल, जौ और जल का पात्र लेकर जाते हैं।
  3. गोत्र बोलकर कन्या माँगते हैं — घरवाले पूर्व की ओर, आने वाले पश्चिम की ओर मुख करके।
  4. दोनों पक्ष राज़ी हों तो सब मिलकर एक भरे कलश को छूते हैं — जिसमें फूल, खील, फल, जौ और सोना होता है।
  5. फिर कन्या-पक्ष का आचार्य वह कलश कन्या के सिर पर रखता है और संतान, पशु-धन और तेज की कामना करता है।

ध्यान दीजिए — फूल, फल, जौ, सोना। सदियों बाद भी गोद भराई और तिलक की थालियों में लगभग यही चीज़ें जाती हैं: फल, मिठाई, नारियल और गहना या शगुन। जिन पन्नों पर मैंने खोजा, उनमें आज की थाली और इस सूत्र का यह जुड़ाव मुझे नहीं मिला।

पर यह भी साफ़ कह दूँ: इस सूत्र में अंगूठी बदलने की रस्म नहीं है, और "तिलक" शब्द भी नहीं। तिलक, टीका, रोका, अंगूठी — ये सब बाद की, क्षेत्रीय परंपराएँ हैं।

रोका, सगाई, तिलक और गोद भराई में क्या अंतर है?

रस्मकौन करता हैकहाँमतलब
रोकादोनों परिवारकिसी एक घर मेंरिश्ता "रोक दिया" — अब और कहीं बात नहीं; पंजाबी परंपरा का शब्द
तिलक / टीकावधू पक्षवर के घरलड़की वालों की ओर से वर को स्वीकारना
गोद भराई (शादी से पहले)वर पक्ष की स्त्रियाँवधू के घरलड़के वालों की ओर से वधू को स्वीकारना
सगाई / अंगूठीवर और वधूआज अक्सर एक मंच परएक-दूसरे को अंगूठी पहनाना — नई रस्म

Wikipedia के Punjabi wedding traditions पन्ने के अनुसार "रोका" का अर्थ है "रोकना" — यानी अब यह रिश्ता तय है। "रोका और सगाई एक ही है क्या?" — कई परिवारों में रोका छोटा, घरेलू कार्यक्रम होता है और सगाई बड़ा समारोह; कुछ में दोनों एक ही दिन हो जाते हैं।

आज का क्रम: एक ही दिन तिलक, गोद भराई और सगाई

राजस्थान और हरियाणा के परिवारों में प्रचलित परंपरा के अनुभव के अनुसार, पहले वर पक्ष वधू के घर गोद भराई करता था और वधू पक्ष अलग दिन वर के घर तिलक। अब दोनों परिवार अक्सर एक ही बैंक्वेट हॉल में इकट्ठा होते हैं, और क्रम यह रहता है:

  1. पहले तिलक — वधू पक्ष वर को तिलक करता है।
  2. फिर गोद भराई — वर पक्ष की स्त्रियाँ वधू को चुनरी ओढ़ाकर उसकी गोद भरती हैं।
  3. अंत में अंगूठी — वर-वधू एक-दूसरे को अंगूठी पहनाते हैं, और सगाई की सारी रस्में पूरी होती हैं।
फूलों से सजे बैंक्वेट हॉल के मंच पर क्रीम शेरवानी और केसरिया साफ़े में बैठे वर को लड़की का भाई तिलक लगाते हुए, बग़ल में नारियल और दीपक वाली थाली लिए पिता, सामने कुर्सियों पर मुस्कुराते परिवार — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
आज का तिलक — बैंक्वेट हॉल के मंच पर, कुछ ही मिनटों में।
सजे मंच पर गुलाबी लहंगे और लाल गोटेदार चुनरी में बैठी वधू की गोद में वर पक्ष की स्त्रियाँ नारियल, केले, सेब और मिठाई भरती हुईं, बग़ल में तिलक लगाए वर और चारों ओर खड़े दोनों परिवार — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
एक ही मंच पर — वर के माथे पर तिलक, वधू की गोद भराई, और फिर अंगूठी।

सगाई में अंगूठी किस हाथ में पहनाते हैं?

गृह्यसूत्र के जिस अंश से मैंने मिलान किया, उसमें अंगूठी की रस्म ही नहीं है, इसलिए हाथ का कोई शास्त्रीय नियम मुझे नहीं मिला। आज ज़्यादातर परिवारों में अंगूठी अनामिका (रिंग फ़िंगर) में पहनाई जाती है — लड़की के अक्सर बाएँ हाथ में और लड़के के अक्सर दाएँ हाथ में; पर बहुत से परिवार दोनों को एक ही हाथ में पहनाते हैं। पहले अंगूठी कौन पहनाए — इस पर भी कोई एक नियम नहीं; कई जगह लड़का पहले पहनाता है। यह रिवाज़ है, नियम नहीं — अपने परिवार की रीत मानें।

सगाई में क्रीम शेरवानी पहने युवक मेहंदी लगे हाथ वाली गुलाबी लहंगे की युवती की अनामिका में सोने की अंगूठी पहनाते हुए, युवती के माथे पर लाल बिंदी और सिर पर हल्की चुनरी — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
अंगूठी की रस्म — अनामिका में, पर हाथ हर परिवार की रीत से।

क्या तिलक में दी गई रक़म दहेज मानी जाती है?

"बड़ा टीका" वाली होड़ ने कई परिवारों पर बोझ डाला, इसलिए यह सवाल ज़रूरी है। दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 की एक क़ानूनी व्याख्या (विधि-ब्लॉग iPleaders) के अनुसार, विवाह से पहले, विवाह के समय या बाद में विवाह के सिलसिले में दी गई या देने को कही गई संपत्ति दहेज मानी जाती है। जो उपहार बिना माँगे, प्रथा के अनुसार और देने वाले की सामर्थ्य के भीतर दिए जाएँ और जिनकी सूची रखी जाए, वे दहेज नहीं माने जाते। Wikipedia का Dowry Prohibition Act, 1961 पन्ना भी यही कहता है कि स्वेच्छा से दिए उपहार दहेज नहीं हैं।

सीधी बात: तिलक का शगुन जब तक माँगा न जाए, शर्त न बने और सामर्थ्य के भीतर हो, वह प्रेम की भेंट है। माँगकर लिया गया "बड़ा टीका" क़ानून की नज़र में दहेज हो सकता है। हरियाणा में भी 52 पाल महापंचायत ने गोद भराई के लेन-देन पर सीमा तय की थी (हरियाणा सरकार की प्रेस विज्ञप्ति)।

टीका की जगह गोद भराई और अंगूठी क्यों आ गई?

राजस्थान और हरियाणा के परिवारों में प्रचलित परंपरा के अनुभव के अनुसार, यह बदलाव धीरे-धीरे आया, और इसकी सबसे बड़ी वजह थी बिगड़ता लिंगानुपात। जब लड़कियों की संख्या लड़कों से कम होने लगी, तो रिश्ते में "माँगने" वाला पलड़ा बदल गया। लड़की वालों का वर के घर जाकर बड़ी रक़म चढ़ाने वाला टीका धीरे-धीरे कम हो गया; अब कई समुदायों में मुख्य रस्म गोद भराई है — जिसमें लड़के वाले लड़की के घर जाकर उसकी गोद भरते हैं — और उसके बाद अंगूठी की रस्म। कुछ समुदायों में टीका आज भी पूरे मान से होता है।

यानी एक रस्म का बदलना सिर्फ़ फ़ैशन का बदलना नहीं था — वह समाज के भीतर एक बड़े बदलाव का आईना था।

भारत से बाहर तिलक और सगाई कैसे करें?

  1. घर पर छोटी रस्म: लाल कपड़े पर थाली — रोली, अक्षत, दीपक, मौली बँधा नारियल और कलश। तिलक कोई भी बड़ा कर सकता है; पुरोहित न हों तो भी रस्म पूरी है।
  2. भारत के बड़ों को जोड़ें: वीडियो कॉल पर दादा-दादी, नाना-नानी को शामिल करें — आशीर्वाद उन्हीं से।
  3. दीपक और नियम: किराए के घर में धुएँ के अलार्म का ध्यान रखें; दीपक की जगह LED दीया भी चलेगा।
  4. सामग्री: नारियल, रोली और मौली भारतीय किराना दुकानों पर मिल जाते हैं; न मिलें तो अपने घर के मंदिर की सामग्री से काम चलाएँ।
भारत से बाहर एक उजले घर के बैठक में लाल कपड़े की मेज़ पर कलश, दीपक और थाली के सामने बैठे युवक को गुलाबी साड़ी में बुज़ुर्ग स्त्री तिलक लगाते हुए, बग़ल में मुस्कुराती युवती, परिवार और लैपटॉप पर वीडियो कॉल से जुड़े रिश्तेदार — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
भारत से बाहर घर पर सगाई — रिश्तेदार वीडियो कॉल से शामिल।

भारत से बाहर पूजा-पाठ के बारे में और जानने के लिए बिना मंदिर के घर पर पूजा कैसे करें पढ़ें। शादी की आगे की रस्मों के लिए मेहंदी और सात फेरे वाले लेख देखें।

क्या मिला, क्या नहीं मिला

बातनतीजा
सगाई (वाग्दान) की ग्रंथ-विधिमिली — शांखायन गृह्यसूत्र 1.6: फूल, खील, फल, जौ, सोने का कलश
"Tilak (engagement)"मिला — Wikipedia, Hindu wedding
वर को तिलक लगाने का अलग मंत्रइस अंश में नहीं मिला
अंगूठी बदलने की रस्म / हाथ का नियमग्रंथ के इस अंश में नहीं मिला — आज का रिवाज़
रोका = "रोकना"मिला — Wikipedia, Punjabi wedding traditions
बिना माँगे उपहार दहेज नहींमिला — दहेज प्रतिषेध अधिनियम की व्याख्या
गाँव का टीका, शक्कर, "बड़ा टीका"लेखक का अपना अनुभव (राजस्थान-हरियाणा)

निचोड़: तिलक लड़की वालों की ओर से वर को अपनाने की रस्म है और गोद भराई लड़के वालों की ओर से वधू को — दोनों मिलकर सगाई पूरी करते हैं। ग्रंथ में सगाई फूल, फल, जौ और सोने के कलश से होती थी; अंगूठी बहुत बाद में आई। शगुन प्रेम से, सामर्थ्य भर और बिना माँगे दें — यही उसकी असली शोभा है। और मौक़ा मिले तो बच्चों में शक्कर ज़रूर बँटवाइए।

अस्वीकरण: यह लेख शैक्षणिक उद्देश्य से दी गई सामान्य जानकारी के लिए है। इसमें दिए संदर्भ प्रामाणिक अनुवादों और भरोसेमंद स्रोतों से मिलाए गए हैं, और परंपराएँ परिवार व क्षेत्र के अनुसार अलग हो सकती हैं — अपने घर के बड़ों या पुरोहित की रीत को प्राथमिकता दें। लेख के सभी चित्र केवल उदाहरण और विषय समझाने के लिए AI से बनाए गए हैं; ये किसी असली व्यक्ति, स्थान या घटना की तस्वीर नहीं हैं। यह किसी तरह की चिकित्सा, क़ानूनी या ज्योतिषीय सलाह नहीं है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

तिलक की रस्म क्या होती है और कौन करता है?
तिलक (टीका) वह रस्म है जिसमें वधू पक्ष के लोग वर के घर जाकर उसके माथे पर रोली-अक्षत का तिलक लगाते हैं और नारियल, कपड़े, मिठाई व शगुन देकर रिश्ता पक्का करते हैं। तिलक अक्सर होने वाले ससुर, उनके बड़े भाई या लड़की का भाई लगाता है। राजस्थान और हरियाणा के परिवारों में प्रचलित परंपरा के अनुसार पहले वधू पक्ष के 5, 7 या 11 पुरुष वर के घर आते थे, आँगन में पाटे पर बिठाकर पंडित के मंत्रोच्चार के बीच तिलक होता था, और सिर पर रंगीन तौलिया रखा जाता था। उत्तर भारत के कई हिस्सों में तिलक को ही सगाई माना जाता है — Wikipedia के Hindu wedding पन्ने पर भी "Tilak (engagement)" लिखा है।
लड़के के तिलक में क्या-क्या दिया जाता है?
लड़के के तिलक में आम तौर पर दिया जाता है: रोली और अक्षत (तिलक के लिए), मौली बँधा नारियल (नोटों के साथ), रंगीन तौलिया या चादर (सिर पर रखने के लिए), वर के कपड़े, पताशे और मिठाई, फल, पान-सुपारी, जलता दीपक और शगुन की नक़द रक़म थाली या लिफ़ाफ़े में। कई परिवारों में वर पक्ष के पिता, भाई और करीबी पुरुषों के लिए साफ़े या पगड़ी भी दी जाती है। सामान हर समाज में अलग है। ध्यान रहे — शगुन बिना माँगे और अपनी सामर्थ्य भर दें; माँगकर ली गई बड़ी रक़म दहेज क़ानून के दायरे में आ सकती है।
तिलक चढ़ाने की सही विधि क्या है, और तिलक लगाते समय क्या बोलें?
विधि सरल है: वर पूर्व की ओर मुख करके चौकी पर बैठे, सिर पर तौलिया या साफ़ा हो; पुरोहित गणेश-पूजन और संकल्प कराएँ; वधू पक्ष के बड़े रोली का तिलक और उस पर अक्षत लगाएँ; फिर मौली बँधा नारियल, कपड़े, मिठाई और शगुन दें; वर बड़ों के पैर छुए; और अंत में सबका मुँह मीठा हो। क्या बोलें — शांखायन गृह्यसूत्र के सगाई वाले अंश (1.6) में वर को तिलक लगाने का अलग मंत्र नहीं मिला। पुरोहित अपनी परंपरा के मंत्र पढ़ते हैं; बिना पुरोहित के मन से आशीर्वाद के शब्द काफ़ी हैं। मंत्र न बोल पाने से रस्म अधूरी नहीं होती।
तिलक और सगाई में क्या अंतर है? रोका इनसे अलग कैसे है?
तिलक में वधू पक्ष वर के घर जाकर वर को तिलक लगाता है — यह लड़की वालों की ओर से स्वीकृति है। गोद भराई में वर पक्ष की स्त्रियाँ वधू के घर जाकर उसकी गोद भरती हैं — लड़के वालों की ओर से स्वीकृति। सगाई आज अक्सर अंगूठी बदलने की रस्म को कहते हैं, जो दोनों पक्षों के बीच होती है। रोका पंजाबी परंपरा का शब्द है, जिसका अर्थ Wikipedia के अनुसार "रोकना" है — यानी रिश्ता तय, अब और कहीं बात नहीं। कई परिवारों में रोका छोटा घरेलू कार्यक्रम होता है और सगाई बड़ा समारोह; कुछ में सब एक ही दिन होते हैं। उत्तर भारत के कई इलाक़ों में तिलक ही सगाई है।
सगाई में अंगूठी किस हाथ में पहनाते हैं, और पहले कौन पहनाता है?
शांखायन गृह्यसूत्र के सगाई (वाग्दान) वाले अंश में अंगूठी की रस्म ही नहीं है, इसलिए हाथ का कोई शास्त्रीय नियम नहीं मिला — यह आज का रिवाज़ है। ज़्यादातर परिवारों में अंगूठी अनामिका (रिंग फ़िंगर) में पहनाई जाती है — लड़की के अक्सर बाएँ हाथ में और लड़के के अक्सर दाएँ हाथ में, पर बहुत से परिवार दोनों को एक ही हाथ में पहनाते हैं। पहले कौन पहनाए, इस पर भी कोई एक नियम नहीं; कई जगह लड़का पहले लड़की को पहनाता है, फिर लड़की लड़के को। एक ही मंच पर तिलक, गोद भराई और अंगूठी हों तो अंगूठी सबसे अंत में होती है। अपने परिवार की रीत को प्राथमिकता दें।
एक ही दिन तिलक, गोद भराई और सगाई हो तो क्रम क्या रहे?
राजस्थान और हरियाणा के परिवारों में प्रचलित परंपरा के अनुभव के अनुसार, आज जब दोनों परिवार एक ही बैंक्वेट हॉल में इकट्ठा होते हैं, तो क्रम यह रहता है: पहले तिलक — वधू पक्ष वर को तिलक लगाकर नारियल, कपड़े और शगुन देता है; फिर गोद भराई — वर पक्ष की स्त्रियाँ वधू को चुनरी ओढ़ाकर उसकी गोद में नारियल, फल, मिठाई और शगुन भरती हैं; अंत में अंगूठी — वर-वधू एक-दूसरे को अंगूठी पहनाते हैं। पहले ये रस्में अलग-अलग दिन और अलग-अलग घरों में होती थीं — तिलक वर के घर, गोद भराई वधू के घर। कुछ परिवार आज भी ऐसा ही करते हैं।
क्या तिलक में दी गई रक़म दहेज मानी जाती है?
यह इस पर निर्भर है कि रक़म कैसे दी गई। दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 की एक क़ानूनी व्याख्या (iPleaders) के अनुसार, विवाह से पहले, विवाह के समय या बाद में विवाह के सिलसिले में दी गई या देने को कही गई संपत्ति दहेज है। पर जो उपहार बिना माँगे, प्रथा के अनुसार और देने वाले की सामर्थ्य के भीतर दिए जाएँ और जिनकी सूची रखी जाए, वे दहेज नहीं माने जाते। यानी प्रेम से दिया गया शगुन ठीक है; माँगकर या शर्त बनाकर लिया गया "बड़ा टीका" दहेज हो सकता है। यह शैक्षणिक उद्देश्य से दी गई सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं — किसी विशेष स्थिति में वकील से पूछें।
भारत से बाहर तिलक और सगाई कैसे करें?
भारत से बाहर तिलक और सगाई घर पर भी पूरे मान से हो सकती है। लाल कपड़े पर थाली सजाएँ — रोली, अक्षत, दीपक, मौली बँधा नारियल और आम के पत्तों वाला कलश। वधू पक्ष का कोई भी बड़ा वर को तिलक लगा सकता है; पुरोहित न हों तो मन से आशीर्वाद के शब्द काफ़ी हैं। फिर गोद भराई और अंगूठी की रस्म करें। भारत में बैठे दादा-दादी और नाना-नानी को वीडियो कॉल से जोड़ें, ताकि आशीर्वाद उन्हीं से मिले। किराए के घर में धुएँ के अलार्म का ध्यान रखें; ज़रूरत हो तो LED दीया रखें। रोली, मौली और नारियल ज़्यादातर भारतीय किराना दुकानों पर मिल जाते हैं।

संदर्भ के लिए उपयोग किए गए स्रोत — शांखायन गृह्यसूत्र 1.6 (The Grihya Sutras, Part 1, SBE 29, अनुवाद: Hermann Oldenberg, साभार: sacred-texts.com); wisdomlib.org (Vagdana); Wikipedia (Hindu wedding; Punjabi wedding traditions; Dowry Prohibition Act, 1961); हरियाणा सरकार की प्रेस विज्ञप्ति (52 पाल महापंचायत); दहेज क़ानून की व्याख्या विधि-ब्लॉग iPleaders से, केवल शब्दों में। गाँव का टीका, न्योता, शक्कर बँटना, आज का क्रम और लिंगानुपात वाला बदलाव — राजस्थान और हरियाणा के परिवारों में प्रचलित परंपरा के अनुभव के अनुसार, लेखक का अपना देखा हुआ। तीन बातें साफ़ कह देना ज़रूरी है। पहली — वर को तिलक लगाने का अलग मंत्र और अंगूठी के हाथ का शास्त्रीय नियम इस खोज में नहीं मिले; यह खोज का नतीजा है, अंतिम निर्णय नहीं। दूसरी — हर समाज और परिवार की रीत अलग है। तीसरी — क़ानूनी जानकारी शैक्षणिक उद्देश्य से दी गई सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। किसी ब्रांड या दुकान की सिफ़ारिश नहीं।