दिन में न जाने कितनी बार आपका हाथ अपने-आप गले तक चला जाता है। बात करते हुए, सोचते हुए, किसी की राह देखते हुए। उँगलियाँ काले मोतियों पर फिरती हैं और लौट आती हैं। यह इतनी बार होता है कि अब दिखाई भी नहीं देता।
भारत के घरों में शायद यही वह चीज़ है जिसे सबसे ज़्यादा बार छुआ जाता है। और शायद यही वह चीज़ है जिसके बारे में सबसे कम जाना जाता है।
यह लेख मैंने इस भरोसे के साथ शुरू किया था कि ग्रंथों में इसका उल्लेख आसानी से मिल जाएगा। जो मिला, वह उससे कहीं ज़्यादा दिलचस्प निकला — और शुरुआत में थोड़ा निराश करने वाला भी।
पहले वह बात जो चौंकाती है — वैदिक विवाह में मंगलसूत्र नहीं है
आश्वलायन गृह्यसूत्र वैदिक गृहस्थ-संस्कारों की सबसे प्रामाणिक पुस्तिकाओं में है। उसके पहले अध्याय की सातवीं कंडिका में पूरा विवाह-क्रम, चरण दर चरण, लिखा हुआ है।
वर वधू का हाथ पकड़ता है और कहता है — “मैं सुख के लिए तुम्हारा हाथ ग्रहण करता हूँ।” फिर अग्नि और जलकुंभ की तीन परिक्रमाएँ। हर परिक्रमा के बाद वधू शिला पर पैर रखती है। फिर उसकी अंजुलि में लावा डाला जाता है, जो अग्नि में गिरता है। फिर उसके बालों में बँधे ऊन के दो गुच्छे खोले जाते हैं। फिर सप्तपदी — सात कदम, उत्तर-पूर्व की ओर। और अंत में ध्रुव तारे का दर्शन।
पूरे क्रम में गले में कुछ बाँधने का एक भी सूत्र नहीं है।
न कोई हार, न कोई डोरी, न कोई पेंडेंट। उस पूरे विवाह में जो एक चीज़ बाँधी हुई होती है — बालों में ऊन के वे दो गुच्छे — वह विवाह के दौरान खोल दी जाती है।
यह मेरी राय नहीं है। कोई भी आश्वलायन गृह्यसूत्र 1.7 खोलकर ख़ुद देख सकता है।
पहली बार पढ़ने पर यह बात खटकती है। जिस चीज़ को हम सबसे पुरानी परंपरा मानते आए, वह वेदों के विवाह में है ही नहीं?
पर यहीं रुक जाना सबसे बड़ी ग़लती होगी। क्योंकि कहानी यहाँ ख़त्म नहीं होती। यहाँ से शुरू होती है।
पर रुकिए — धागा वैदिक है
ऋग्वेद का दसवाँ मंडल, 85वाँ सूक्त। इसे सूर्या-विवाह सूक्त कहते हैं और यही वह सूक्त है जिससे आज भी विवाह के मंत्र लिए जाते हैं। उसी सूक्त का 28वाँ मंत्र:
नीललोहितं भवति कृत्यासक्तिर्व्यज्यते।
एधन्ते अस्या ज्ञातयः पतिर्बन्धेषु बध्यते॥
ऋग्वेद · 10/85/28
ग्रिफ़िथ का अनुवाद है — “उसका रंग नीला और लाल है; जो बुरी शक्ति चिपकी हुई थी वह दूर कर दी गई। इस वधू के कुटुंबी फलें-फूलें, और पति बंधनों में बँध जाए।”
ध्यान उस आख़िरी पंक्ति पर दीजिए, क्योंकि उसे आमतौर पर छोड़ दिया जाता है। पतिर्बन्धेषु बध्यते — बँधता पति है।
और यह जो नील-लोहित, नीला-लाल रंग है — यह विवाह के उस रक्षा-धागे का है जिसे संस्कृत ग्रंथ कौतुक और प्रतिसर कहते हैं। अथर्ववेद की दूसरी कांड, सूक्त 11 में प्रतिसर का वर्णन है। यह धागा वर और वधू दोनों को बाँधा जाता था, और घर की चीज़ों को भी।
तो सच्चाई यह है, और यह दोनों तरफ़ ईमानदार है:
धागा वैदिक है। गले का हार बाद का है। जिसे हम मंगलसूत्र कहते हैं, वह उसी प्राचीन विवाह-धागे का बहुत बाद का रूप है — सोने और मोतियों में ढला हुआ। “सूत्र” शब्द अब भी उसी धागे की याद दिलाता है, चाहे आज उसमें धागा बचा हो या नहीं।
यह जानकर मंगलसूत्र छोटा नहीं पड़ता। मुझे लगा, वह और बड़ा हो जाता है — क्योंकि वह तीन हज़ार साल पुरानी एक आदत का जीवित रूप है, न कि किसी एक ग्रंथ का आदेश।
“माङ्गल्यं तन्तुनानेन” — यह मंत्र कहाँ से आया
हर विवाह में यह मंत्र पढ़ा जाता है, और सुनने वाले की आँखें अक्सर भर आती हैं:
माङ्गल्यं तन्तुनानेन मम जीवन हेतुना।
कण्ठे बध्नामि सुभगे त्वं जीव शरदः शतम्॥
मांगल्य धारणम् का प्रचलित मंत्र
अर्थ — “इस मांगलिक सूत्र को, जो मेरे जीवन का आधार है, मैं तुम्हारे कंठ में बाँधता हूँ। हे सौभाग्यवती, तुम सौ शरद जियो।”
यह वाक्य सुंदर है। पर यह किसी वेद में नहीं मिला, किसी गृह्यसूत्र में नहीं मिला।
वैदिक विवाह पर विस्तार से लिखने वाली परंपरा-निष्ठ विदुषी जयश्री सारनाथन का निष्कर्ष है कि श्रुति-सम्मत विवाह के पाँच अंग हैं — वर-कन्या-अन्वेषण, पाणिग्रहण, प्रधान होम, सप्तपदी और लाजा होम। और उनके अनुसार कन्यादान तथा मांगल्य-धारणम् इन पाँच में नहीं आते; ये बाद में जुड़े। मंत्र का स्रोत वे वायु पुराण बताती हैं, और प्रथा को लगभग एक हज़ार साल पुरानी।
ध्यान दीजिए कि यह बात किसी आधुनिक आलोचक ने नहीं कही। यह उस परंपरा के भीतर से आई है जो स्वयं इन ग्रंथों को प्रमाण मानती है।
इसलिए एक छोटा-सा सुझाव, जो पूरे लेख पर लागू होता है: जो कोई कहे कि यह वेद में लिखा है, उससे मंडल, सूक्त और मंत्र संख्या पूछिए। जो वाक़ई ग्रंथ पढ़े हैं, वे संख्या बता देंगे। बाक़ी बात बदल देंगे।
तो मंगलसूत्र आया कहाँ से — और वह सोने का नहीं था
निशान दक्षिण की ओर जाते हैं।
संगम काल के तमिल ग्रंथ पुरनानूरु में आय देश की स्त्रियों के गले में विवाह-ताली का उल्लेख मिलता है। ललिता सहस्रनाम में मांगल्य सूत्र शब्द आता है — यद्यपि उसकी तिथि पर विद्वानों में मतभेद है, इसलिए उसे निर्णायक प्रमाण मानना ठीक नहीं होगा। और छठी शताब्दी ईस्वी के एक संदर्भ में इसका वर्णन इस तरह है जो सबसे ज़्यादा बताता है:
वह एक पीला धागा था। हल्दी में रँगा हुआ। बस। न सोना, न काले मोती, न दो वाटी, न कोई पेंडेंट — एक साधारण सूत का धागा, जो वधू के गले में बाँधा जाता था।
इस एक बात पर थोड़ा ठहरिए, क्योंकि इसमें बहुत कुछ है।
अगर मूल मंगलसूत्र हल्दी में रँगा धागा था, तो इसका अर्थ है कि यह चिह्न कभी किसी की हैसियत पर निर्भर नहीं था। सबसे ग़रीब घर की वधू के पास भी वह उतना ही पूरा था जितना सबसे धनी घर की वधू के पास। हल्दी हर रसोई में थी। धागा हर घर में था।
सोना बहुत बाद में आया। और सोने के साथ वह चीज़ भी आई जो आज सबसे ज़्यादा तकलीफ़ देती है — यह तुलना कि किसका मंगलसूत्र कितने तोले का है।
दक्षिण भारत में आज भी इस पुराने रूप की छाया बची है। तमिलनाडु में थाली अक्सर सोने की चेन में नहीं, हल्दी-रँगी डोरी में पिरोई जाती है — और कई परिवारों में वह डोरी हर साल बदली जाती है, पर पेंडेंट वही रहता है।
उत्तर भारत में यह कब पहुँचा — और उससे पहले क्या था
अब वह बात जो बहुत से पाठकों को हैरान करेगी, ख़ासकर उत्तर भारत में।
मंगलसूत्र पूरे भारत की परंपरा कभी नहीं थी। यह दक्षिण भारत और महाराष्ट्र की परंपरा थी। उत्तर और पूर्व के बड़े हिस्सों में विवाहित स्त्री की पहचान बिल्कुल दूसरी चीज़ों से होती थी।
बंगाल में शाखा और पोला — शंख की सफ़ेद और मूँगे की लाल चूड़ी — और सिंदूर। पंजाब में चूड़ा और कलीरे। उत्तर भारत में सिंदूर और बिछिया। चूड़ियों की अपनी अलग और उतनी ही पुरानी परंपरा है, जिसका मंगलसूत्र से कोई संबंध नहीं।
तो उत्तर भारत में मंगलसूत्र कब आया? इसका कोई एक दिन नहीं बताया जा सकता, पर Open पत्रिका की रिपोर्ट में इसका फैलाव बीसवीं सदी के उत्तरार्ध से जोड़ा गया है, और उसमें एक बड़ी भूमिका टीवी धारावाहिकों की मानी गई है। उसी रिपोर्ट में 2013 के एक संदर्भ का हवाला है कि भारत और पाकिस्तान की कुछ मुस्लिम महिलाएँ भी इसे पहनने लगी थीं।
यह कहना कि परंपरा नई है, उसे कमज़ोर करना नहीं है। हर जीवित परंपरा किसी न किसी दिन नई थी। पर यह जानना ज़रूरी है — ख़ासकर तब, जब किसी बहू से कहा जाए कि “हमारे यहाँ तो हमेशा से ऐसा ही होता आया है।”
एक देश, कई रूप
एक ही विचार, और उसके इतने रूप — यही भारत का स्वभाव है।
| क्षेत्र | नाम | रूप |
|---|---|---|
| तमिलनाडु | थाली · तिरुमांगल्यम् | हल्दी-रँगे धागे में सोने का पेंडेंट |
| कर्नाटक | मांगल्य सूत्र · ताली | आम तौर पर एक वाटी |
| आंध्र और तेलंगाना | मांगल्यमु · पुस्तेलु | दो सोने की डिस्क |
| महाराष्ट्र | मंगळसूत्र | दो वाटी, काले मोतियों की दो लड़ें |
| केरल | मिन्नु · एला ताली | पत्ते के आकार का पेंडेंट |
| बंगाल | — | मंगलसूत्र नहीं — शाखा, पोला, लोहा और सिंदूर |
| पंजाब | — | मंगलसूत्र नहीं — चूड़ा और कलीरे |
महाराष्ट्र की दो वाटियों के बारे में एक बात बहुत कही जाती है — कि वे शिव और शक्ति हैं, या मायके और ससुराल हैं। यह व्याख्या सुंदर है और घर-घर में मानी जाती है, पर मुझे इसका कोई शास्त्रीय स्रोत नहीं मिला। यह लोक-परंपरा की व्याख्या है — और लोक-परंपरा होना उसे झूठा नहीं बनाता, बस उसे ग्रंथ नहीं बनाता।
मिन्नु — जो धर्म की सीमा पार कर गया
अब वह बात जो मुझे इस पूरी खोज में सबसे ज़्यादा छू गई।
केरल के सीरियन ईसाई विवाह में भी ताली बाँधी जाती है। उसे मिन्नु कहते हैं। वह दिल के आकार का छोटा सोने का पेंडेंट होता है जिस पर दानों से क्रॉस बना होता है।
पर असली बात उस डोरी में है जिसमें वह पिरोया जाता है।
वह डोरी मंत्रकोडी — यानी विवाह की उसी साड़ी — से निकाले गए इक्कीस धागों से बनती है। इन इक्कीस को तीन-तीन के सात समूहों में बटा जाता है। वे सात समूह हैं — वर, वधू, वर के माता-पिता, वधू के माता-पिता, और चर्च।
तीन दिन तक वही धागे की डोरी पहनी जाती है। उसके बाद उसे सोने की चेन में बदल दिया जाता है।
यानी केरल के ईसाई घर में भी, विवाह के तीसरे दिन तक, वही चीज़ गले में होती है जो छठी शताब्दी के हिंदू विवाह में थी — एक धागा। धर्म बदल गया, भाषा बदल गई, प्रार्थना बदल गई। धागा नहीं बदला।
इससे एक बात साफ़ होती है जो आज के माहौल में कहने लायक़ है: ताली दक्षिण भारत की सांस्कृतिक परंपरा है, किसी एक धर्म की निजी संपत्ति नहीं।
काले मोती — शास्त्र में कुछ नहीं मिला
अब उस सवाल पर, जो शायद आपको यहाँ तक खींच लाया है।
इंटरनेट पर हर पेज एक ही बात लिखता है: काले मोती बुरी नज़र से बचाते हैं, नकारात्मक ऊर्जा रोकते हैं, विवाह की रक्षा करते हैं।
मैंने इसका शास्त्रीय आधार ढूँढा। नहीं मिला।
न वेदों में, न गृह्यसूत्रों में, न स्मृतियों में काले मोतियों का ऐसा कोई विधान मिला। जिन पन्नों पर यह दावा सबसे ज़ोर से लिखा है, उनमें से लगभग हर एक किसी न किसी ज्वेलरी की दुकान का है।
इसका मतलब यह नहीं कि मान्यता झूठी है। नज़र-रक्षा भारत की सबसे जीवित लोक-परंपराओं में है — बच्चे की कनपटी पर काजल का टीका, दुकान पर लटका नींबू-मिर्च, नई गाड़ी पर बँधा काला धागा। यह विश्वास सच्चा है, पुराना है और लाखों घरों का अपना है।
पर उसे शास्त्र कहना ग़लत है। लोक-परंपरा को लोक-परंपरा कहने में कोई अपमान नहीं — अपमान उसे किसी और चीज़ का भेस पहनाने में है।
काला रंग अशुभ माना जाता है, फिर सबसे शुभ चिह्न में काला क्यों
और यहाँ एक पेचीदा बात है जिसे मैंने कहीं उठा हुआ नहीं देखा।
हिंदू कर्मकांड में काला रंग मांगलिक कार्यों में वर्जित माना जाता है। विवाह में, पूजा में, किसी भी शुभ अवसर पर काले वस्त्र पहनने से बचा जाता है। यह नियम इतना आम है कि हर घर में मालूम है।
फिर सबसे मांगलिक चिह्न के बीचों-बीच काले मोती क्यों?
इसका कोई शास्त्रीय उत्तर नहीं मिलता। पर लोक-परंपरा का अपना तर्क है, और वह बड़ा सुंदर है — अशुभ को रोकने के लिए अशुभ का ही प्रयोग।
वही तर्क जो सबसे सुंदर बच्चे के गाल पर काला टीका लगवाता है। सुंदरता पर नज़र लगती है, इसलिए सुंदरता में जान-बूझकर एक दाग़ छोड़ दो। काले मोती उसी सोच की लड़ी हैं — सोने की चमक के बीच रखा हुआ जान-बूझकर का अँधेरा।
यह ग्रंथ नहीं है। यह उससे शायद ज़्यादा पुरानी चीज़ है — वह डर जिससे माँएँ अपने बच्चों को बचाती आई हैं।
सोना क्यों — और यह सोना है किसका
अब लेख का वह हिस्सा जिसे मैं सबसे ज़रूरी मानता हूँ, और जिसे हर पति, हर सास और हर बेटी को पढ़ना चाहिए।
मनुस्मृति, नवाँ अध्याय, श्लोक 194:
अध्यग्न्यध्यावाहनिकं दत्तं च प्रीतिकर्मणि।
भ्रातृमातृपितृप्राप्तं षड्विधं स्त्रीधनं स्मृतम्॥
मनुस्मृति · 9/194
छह प्रकार का स्त्रीधन — (1) जो अग्नि के समक्ष दिया गया, (2) जो विदाई के समय दिया गया, (3) जो प्रेम से दिया गया, और जो (4) भाई, (5) माता और (6) पिता से मिला।
और इस पर धर्मशास्त्र की टीका बिल्कुल दो-टूक है: न पति, न पुत्र, न देवर, न पति के कुटुंबी — किसी का स्त्रीधन पर कोई अधिकार नहीं।
अब जोड़िए। मंगलसूत्र अग्नि के समक्ष पहनाया जाता है।
यानी मंगलसूत्र परिभाषा से ही स्त्रीधन है। वह उस स्त्री की अपनी संपत्ति है — ससुराल की नहीं, पति की नहीं, परिवार की नहीं। और यह केवल शास्त्र की बात नहीं; स्त्रीधन की यही अवधारणा आज भी भारतीय क़ानून में चलती है।
यह बात हज़ारों घरों में काम की है। जिस स्त्री से कहा जाता है कि “यह तो घर का सोना है”, उसके पास हज़ारों साल पुराना उत्तर मौजूद है — और वह उत्तर उन्हीं ग्रंथों से आता है जिनका हवाला देकर उसे चुप कराया जाता है।
सोना क्यों, इसका व्यावहारिक उत्तर भी इसी से जुड़ा है। सोना ख़राब नहीं होता, हर जगह चलता है, और मुश्किल वक़्त में तुरंत काम आता है। वह गहना भी था और बीमा भी। उस समाज में जहाँ स्त्री के नाम ज़मीन नहीं होती थी, गले का यह वज़न उसकी अकेली चल संपत्ति थी।
उतार सकते हैं? टूट जाए तो?
यह वह सवाल है जो लोग रात को, अकेले में, घबराकर खोजते हैं। इसलिए सीधा उत्तर।
टूटना अपशकुन है? धागा या चेन टूटना अपशकुन है, ऐसा कोई शास्त्रीय विधान नहीं मिला। जिस चीज़ को कोई बीस-तीस साल रोज़ पहने, वह घिसेगी और किसी दिन टूटेगी — यह भौतिकी है, भविष्यवाणी नहीं।
परंपरा में इसका जो उपाय चलता है वह व्यावहारिक है: मोतियों को सँभाल लीजिए, किसी शुभ दिन नई डोरी में पिरो लीजिए, और चाहें तो पिरोने से पहले पूजा में रख दीजिए। दक्षिण भारत के कई घरों में तो डोरी हर साल जान-बूझकर बदली जाती है। वहाँ धागे का बदलना सामान्य बात है, डर की नहीं।
रात में उतार सकते हैं? इसका कोई शास्त्रीय निषेध नहीं मिला। नौकरी, मशीन के पास काम, सोते समय गले में उलझने का डर, त्वचा पर रगड़ — ये सब वास्तविक कारण हैं। यह हर स्त्री का अपना निर्णय है, और यह लेख उस निर्णय में कोई राय नहीं देता।
एक छोटी व्यावहारिक बात ज़रूर: सोने के गहने को इत्र, हेयर स्प्रे और सफ़ाई के रसायनों से बचाइए, क्योंकि वे उसकी चमक ख़राब करते हैं।
अदालत ने क्या कहा — और दोनों तरफ़ कहा है
यह विषय अब केवल परंपरा का नहीं रहा; अदालतों तक पहुँच चुका है। और फ़ैसले एक ही दिशा में नहीं गए हैं।
एक तरफ़: मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने 2026 में — V बनाम C, C.M.S.A(MD) No. 44 of 2021, न्यायमूर्ति पी. वडमलै — यह माना कि थाली उतारना मानसिक क्रूरता दर्शाता है, और तलाक़ की डिक्री बरक़रार रखी। इससे पहले उसी न्यायालय की खंडपीठ भी कह चुकी थी कि पति के जीवनकाल में थाली उतारना “उच्चतम कोटि की मानसिक क्रूरता” है।
दूसरी तरफ़: अन्य मामलों में अदालतों ने यह माना है कि मंगलसूत्र न पहनना अपने आप में तलाक़ का आधार नहीं बनता।
दोनों बातें एक साथ सच हैं, क्योंकि हर फ़ैसला अपने मुक़दमे के तथ्यों पर होता है। इसलिए इससे कोई सामान्य नियम मत निकालिए — यह जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं, और अपनी स्थिति के लिए वकील से ही पूछिए।
पर एक बात इन फ़ैसलों से साफ़ दिखती है: यह धागा हमारे समाज में कितना भारी है, इसका अंदाज़ा उसके वज़न से नहीं लगता।
पुरुष क्यों नहीं पहनते
यह सवाल अब खुलकर पूछा जा रहा है, और इससे बचना बेईमानी होगी।
तथ्य यह है कि वैवाहिक चिह्नों की यह पूरी व्यवस्था लगभग पूरी तरह एकतरफ़ा है। सिंदूर, मंगलसूत्र, बिछिया, चूड़ा, शाखा-पोला — सब स्त्री पर। पुरुष के लिए ऐसा कोई अनिवार्य चिह्न किसी क्षेत्र में परंपरागत रूप से नहीं रहा।
और यहाँ उस ऋग्वेद की पंक्ति पर लौटना दिलचस्प है जिससे हमने शुरुआत की थी — पतिर्बन्धेषु बध्यते, “पति बंधनों में बँधता है।” सबसे पुराने विवाह सूक्त में बँधने वाला पुरुष है। दिखाई देने वाला चिह्न बाद में स्त्री पर आ गया।
कुछ परिवारों में अब दोनों अँगूठी पहनते हैं, कुछ में पुरुष भी कोई चिह्न रखने लगे हैं। यह ठीक है या नहीं, यह हर घर तय करेगा। इस लेख का काम इतना है कि सवाल को ईमानदारी से रख दे।
और शायद असली बात यही है। मंगलसूत्र का मोल उसके तोलों में नहीं, न उस पर लगी मुहर में। वह मोल उस धागे में है जिससे यह शुरू हुआ था — हल्दी में रँगा, हर घर में उपलब्ध, और किसी की हैसियत का मोहताज नहीं।
अगली बार जब आपकी उँगलियाँ बिना सोचे गले तक जाएँ, तो याद रखिए कि आप जिसे छू रही हैं वह तीन हज़ार साल पुरानी एक आदत है — और सोलह श्रृंगार की तरह यह भी उतना ही आपका है जितना आप उसे बनने देंगी।
यह लेख शैक्षिक उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें दी गई जानकारी शास्त्रीय ग्रंथों, प्रकाशित शोध, समाचार रिपोर्टों और न्यायालयों के निर्णयों सहित विभिन्न स्रोतों से ली गई है, जिनका अध्ययन करके यह सामग्री संकलित की गई है। सभी स्रोत लेख के अंत में सूचीबद्ध हैं। जहाँ किसी प्रचलित मान्यता का शास्त्रीय आधार नहीं मिला, वहाँ यह स्पष्ट रूप से लिखा गया है, उसे छिपाया नहीं गया। यह धार्मिक, क़ानूनी या वित्तीय सलाह नहीं है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या मंगलसूत्र वेदों में लिखा है?
मंगलसूत्र सबसे पहले कब और कहाँ शुरू हुआ?
मंगलसूत्र में काले मोती क्यों होते हैं?
काला रंग तो अशुभ माना जाता है, फिर मंगलसूत्र में काले मोती क्यों?
मंगलसूत्र किसकी संपत्ति होता है?
क्या मंगलसूत्र पूरे भारत की परंपरा है?
मंगलसूत्र टूट जाए तो क्या करें? क्या यह अपशकुन है?
क्या रात में मंगलसूत्र उतारा जा सकता है?
क्या मंगलसूत्र न पहनना तलाक़ का आधार है?
पुरुष मंगलसूत्र जैसा कोई चिह्न क्यों नहीं पहनते?
स्रोत
- आश्वलायन गृह्यसूत्र 1/7 — पूरा विवाह-क्रम: पाणिग्रहण, परिक्रमा, शिलारोहण, लाजा होम, सप्तपदी, ध्रुव-दर्शन
- आश्वलायन गृह्यसूत्र 1/6 — विवाह के आठ प्रकार
- ऋग्वेद 10/85/28 — मूल संस्कृत और विल्सन का अनुवाद
- ऋग्वेद 10/85 — ग्रिफ़िथ का अनुवाद, सूर्या-विवाह सूक्त
- मनुस्मृति 9/194 — षड्विध स्त्रीधन, टीका सहित
- Mangalasutra — Purananuru, Lalita Sahasranama and the sixth-century turmeric thread; regional names and forms
- Kautuka — the ritual protection thread, citing Rigveda 10.85.28 and Atharvaveda 2.11
- Jayasree Saranathan, Maangalya dhaaraNam — श्रुति-सम्मत विवाह के पाँच अंग, और मांगल्य-धारणम् का वायु पुराण से संबंध
- LiveLaw — V v. C, 2026 LiveLaw (Mad) 228, C.M.S.A(MD) No. 44 of 2021, Justice P Vadamalai
- Bar and Bench — मद्रास उच्च न्यायालय की खंडपीठ का पूर्व निर्णय
- Open magazine — The Mangalsutra: Chained to Tradition — उत्तर भारत में प्रसार और टीवी धारावाहिकों की भूमिका
- Nasrani Syrian Christians of Kerala — मिन्नु, मंत्रकोडी और इक्कीस धागों की डोरी
यह लेख परंपरा और ग्रंथों की जानकारी देने के लिए है। यह किसी को यह नहीं बताता कि क्या पहनना चाहिए और क्या नहीं — वह निर्णय हर स्त्री और हर परिवार का अपना है। न्यायालयों के जो निर्णय यहाँ बताए गए हैं वे समाचार रिपोर्टों पर आधारित हैं और क़ानूनी सलाह नहीं हैं। इस लेख में कोई ब्रांड, दुकान या उत्पाद नहीं सुझाया गया है और न कोई एफ़िलिएट लिंक है।