सोमवार किसका दिन है — शिव का या चंद्रमा का?

यह सवाल इसलिए उठता है क्योंकि दोनों जवाब आपको अलग-अलग जगहों पर मिलेंगे। सच यह है कि दोनों एक ही बात हैं।

“सोम” संस्कृत में चंद्रमा का नाम है। शिव अपनी जटा में चंद्रकला धारण करते हैं, इसलिए उनके हज़ार नामों में एक नाम सोमेश्वर है — यानी सोम के स्वामी। सोमवार सोम का दिन है, और सोम जिसके माथे पर विराजते हैं, वह शिव का दिन है। इसीलिए इस दिन पूजा शिव की होती है और रात में चंद्रदर्शन का विधान भी है।

पर असली बात इससे आगे है। वेद में चंद्रमा सिर्फ़ आकाश का एक पिंड नहीं है। पुरुष सूक्त की एक पंक्ति है —

चन्द्रमा मनसो जातः चक्षोः सूर्यो अजायत।
— पुरुष सूक्त, ऋग्वेद 10.90.13 (यजुर्वेद 31 में भी)

अर्थात् विराट पुरुष के मन से चंद्रमा उत्पन्न हुआ, और नेत्रों से सूर्य। इसीलिए ज्योतिष में चंद्रमा को मन का कारक कहा गया है।

यह एक पंक्ति पूरे व्रत का अर्थ बदल देती है। अगर चंद्रमा मन से जन्मा है, और सोमवार चंद्रमा का दिन है, तो सोमवार का व्रत असल में मन का व्रत है — क्रोध, बेचैनी, अनिद्रा, भटकाव, ईर्ष्या से लड़ने का व्रत। जो लोग कहते हैं कि सोमवार का व्रत रखने से “मन शांत रहता है”, वे लोकोक्ति नहीं दोहरा रहे — वे वेद की बात दोहरा रहे हैं, चाहे उन्हें पता हो या न हो।

और यहीं एक ऐसी बात है जो शायद आपको चौंका दे।

🌙 तीन सभ्यताएँ, एक ही चाँद

अंग्रेज़ी का Monday पुरानी अंग्रेज़ी के mōnandæg से बना है — यानी “चाँद का दिन”। वह लैटिन के dies Lūnae का शब्दानुवाद है, और लैटिन वाला ग्रीक hēmérā Selḗnēs का। जर्मन में Montag, फ़्रेंच में lundi, स्पेनी में lunes, इतालवी में lunedì — सबका अर्थ यही है।

सप्ताह के सात नामों में सोमवार अकेला ऐसा दिन है जिसमें किसी देवता की अदला-बदली नहीं करनी पड़ी। मंगल के लिए जर्मनों को अपना Tīw लाना पड़ा, बुध के लिए Wōden, गुरु के लिए Þunor — पर चाँद के लिए किसी की ज़रूरत नहीं पड़ी। चाँद तो सबके सिर पर एक ही था।

और सबसे दिलचस्प बात — अंग्रेज़ी का शब्द lunatic भी luna यानी चाँद से ही बना है, इस पुरानी धारणा से कि चाँद मन पर असर डालता है। यानी जिस बात को हमारे यहाँ “चन्द्रमा मनसो जातः” कहा गया, उसी को यूरोप ने अपने ढंग से पकड़ा। दो अलग सभ्यताएँ, अलग रास्ते, एक ही निष्कर्ष — चाँद और मन का रिश्ता है।

वारों का यह क्रम भी मनमाना नहीं है। सूर्य सिद्धांत के भूगोलाध्याय (12.78–79) में इसका गणित दिया है — शनि से नीचे की ओर गिनते हुए हर चौथा ग्रह अगले दिन का स्वामी होता है, क्योंकि दिन की पहली होरा का स्वामी ही उस पूरे दिन का स्वामी माना जाता है। इसी होरा-चक्र से रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि का क्रम निकलता है — वही क्रम जो आज पूरी दुनिया मानती है।

तो सोमवार चाँद का दिन है, चाँद मन का कारक है, और मन का स्वामी शिव है। पर सवाल यह है — चंद्रमा को शिव की शरण में जाना ही क्यों पड़ा?

वह कथा जिससे सोमनाथ बना — और सोमवार का व्रत शुरू हुआ

इसका जवाब स्कंद पुराण के प्रभास खंड में है, और यह हिंदी में शायद ही कहीं पूरा मिलता है।

कथा यह है कि चंद्रमा ने दक्ष प्रजापति की सत्ताईस कन्याओं से विवाह किया था, पर उनका सारा स्नेह केवल रोहिणी पर था। बाक़ी छब्बीस उपेक्षित रहीं। दक्ष ने बार-बार समझाया, चंद्रमा नहीं माने। तब क्रोध में आकर दक्ष ने शाप दे दिया — क्षय रोग। चंद्रमा घटने लगे। उनकी कलाएँ मिटने लगीं, तेज बुझने लगा, और सृष्टि में अंधकार बढ़ने लगा।

टूटे हुए चंद्रमा समुद्र के किनारे उस स्थान पर पहुँचे जिसे आज प्रभास क्षेत्र कहते हैं। वहाँ उन्होंने ब्रह्मा से एक शिवलिंग की स्थापना करवाई और हज़ार वर्ष तपस्या की। शिव प्रकट हुए। चंद्रमा ने दो वर माँगे — पहला, कि शाप का प्रभाव कम हो जाए; और दूसरा, कि शिव उमा सहित सदा उसी लिंग में विराजें।

शिव ने कहा — दक्ष का शाप मिट नहीं सकता, पर उसे बाँटा जा सकता है। इसलिए कृष्ण पक्ष के पंद्रह दिन तुम्हारी कलाएँ घटेंगी और शुक्ल पक्ष के पंद्रह दिन बढ़ेंगी। और चूँकि यह लिंग सोम ने स्थापित किया है, इसलिए —

“मेरा नाम यहाँ सोमनाथ होगा। और इस क्षेत्र का नाम प्रभास रहेगा, क्योंकि मेरी कृपा से यहीं तुम्हें फिर से प्रभा मिली।”

समुद्र किनारे शिवलिंग के सामने नतमस्तक चंद्रमा और पृष्ठभूमि में प्राचीन मंदिर का शिखर — सोमनाथ की उत्पत्ति कथा — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)

इस कथा में तीन बातें एक साथ बैठ जाती हैं, और यही सोमवार व्रत की जड़ है:

और यहीं से वह बात निकलती है जो आज लगभग कोई नहीं बताता।

📜 पुराण में सोमवार व्रत सोलह का नहीं, आठ का है

स्कंद पुराण, प्रभास खंड के अध्याय 25 में सोमवार व्रत की जो विधि दी गई है, वह आठ सोमवार की है — और हर सोमवार अलग है। पहले सोमवार सफ़ेद पुष्पों से पूजा, दूसरे सोमवार करंज की दातुन और कमल, तीसरे सोमवार अपामार्ग की दातुन और अनार, चौथे सोमवार गूलर की दातुन और नारियल, पाँचवें पीपल की दातुन और कुंद के फूल — इसी तरह आठवें सोमवार तक। और नवें सोमवार को उद्यापन।

आज जो सोलह सोमवार की परंपरा घर-घर चलती है, वह बाद की और अलग परंपरा है। दोनों में कोई टकराव नहीं है — पर यह जानना अच्छा है कि आपकी दादी जो व्रत रखती थीं, उसकी जड़ें कितनी पुरानी हैं। सोलह सोमवार की पूरी विधि, कथा और उद्यापन पर हम अलग से विस्तार से लिखेंगे।

संकल्प — व्रत का पहला और सबसे ज़रूरी क़दम

व्रत भूखे रहने से शुरू नहीं होता, संकल्प से शुरू होता है। बिना संकल्प के उपवास सिर्फ़ भूख है।

तैयारी रविवार शाम से हो जाती है। सूर्यास्त से पहले एक बार सात्त्विक भोजन कर लें — प्याज़, लहसुन, तला-भुना और भारी अन्न छोड़ दें। जल्दी सो जाएँ।

सोमवार को ब्रह्म मुहूर्त में, यानी सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटे पहले उठें। ठंडे जल से स्नान करें; परंपरा में स्नान के जल में थोड़ा गंगाजल मिलाया जाता है। साफ़ वस्त्र पहनें — सोमवार को सफ़ेद सबसे उत्तम माना गया है। पूजा स्थान को गंगाजल छिड़ककर शुद्ध कर लें।

घर के मंदिर में हाथ जोड़कर चावल, फूल और जल के साथ सोमवार व्रत का संकल्प लेते हुए — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)

अब हाथ में थोड़े अक्षत (साबुत चावल), एक फूल और थोड़ा जल लेकर शिवलिंग या शिव के चित्र के सामने खड़े हों और बोलकर संकल्प लें। संकल्प संस्कृत में ही हो, ऐसा कोई नियम नहीं — अपनी भाषा में, अपने शब्दों में कहिए। बस तीन बातें उसमें ज़रूर आएँ:

फिर हाथ का जल और अक्षत ताम्रपात्र में छोड़ दें। संकल्प हो गया।

एक व्यावहारिक बात — संकल्प उतना ही लें जितना निभा सकें। सोलह का संकल्प लेकर छठे पर छोड़ देने से बेहतर है पाँच का संकल्प लेकर पाँचों पूरे करना।

सोमवार व्रत की पूजा विधि — क़दम दर क़दम

घर पर हो या मंदिर में, क्रम यही रहता है।

  1. स्नान और शुद्धि — सूर्योदय से पहले स्नान, स्वच्छ (सफ़ेद हो तो उत्तम) वस्त्र, पूजा स्थान की सफ़ाई और गंगाजल का छिड़काव।
  2. संकल्प — जल, अक्षत और फूल हाथ में लेकर, ऊपर बताए अनुसार।
  3. जलाभिषेक — तांबे या पीतल के लोटे से शिवलिंग पर जल चढ़ाएँ। धार पतली और अटूट रखें, एक साथ उड़ेलें नहीं। मुख उत्तर या पूर्व की ओर रखें। जल चढ़ाते समय ॐ नमः शिवाय का जाप चलता रहे।
  4. पंचामृत अभिषेक — क्रम से दूध, दही, घी, शहद और शक्कर। हर एक के बाद थोड़ा शुद्ध जल डालें, और अंत में फिर से जल से अभिषेक करें ताकि लिंग पर कुछ चिपका न रहे।
  5. चंदन और भस्म — शिवलिंग पर सफ़ेद या लाल चंदन का लेप करें और भस्म से त्रिपुंड्र लगाएँ।
  6. अर्पण — बेलपत्र (चिकनी सतह नीचे की ओर करके), सफ़ेद पुष्प, धतूरा, आक के फूल, काले तिल, अक्षत। बेलपत्र तीन पत्तों वाला और बिना कटा-फटा हो।
  7. दीप, धूप, नैवेद्य — घी का दीपक और धूप जलाएँ। नैवेद्य में सफ़ेद मिठाई, खीर या मिश्री-दूध चढ़ाएँ।
  8. जाप और पाठ — रुद्राक्ष माला से ॐ नमः शिवाय का 108 बार जाप। इसके बाद शिव चालीसा और सोमवार व्रत कथा।
  9. आरती और प्रसाद — शिव आरती करें, फिर प्रसाद बाँटें। चरणामृत स्वयं भी लें।
  10. संध्या पूजा — सोमवार व्रत में शाम की पूजा उतनी ही ज़रूरी है जितनी सुबह की। सूर्यास्त के आसपास, प्रदोष काल में दोबारा दीप जलाकर शिव का स्मरण करें और कथा सुनें। इसी के बाद व्रत खोला जाता है।

सोमवार व्रत में क्या-क्या सामान लगता है?

पूरी सूची यह रही। घबराइए मत — इसमें से आधी चीज़ें न भी हों तो व्रत होता है। शिव को एक लोटा जल भी स्वीकार है।

सफ़ेद कपड़े पर सजी सोमवार व्रत की पूजा सामग्री — जल, दूध, दही, शहद, घी, बेलपत्र, धतूरा, भस्म, चंदन और रुद्राक्ष माला — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
श्रेणीसामग्री
अभिषेकशुद्ध जल (गंगाजल हो तो उत्तम), कच्चा दूध, दही, घी, शहद, शक्कर — यही पंचामृत है
पत्र व पुष्पबेलपत्र, सफ़ेद पुष्प (कनेर, चमेली, मदार), धतूरा, आक के फूल, शमी पत्र
लेपसफ़ेद या लाल चंदन, भस्म (विभूति)
अन्य अर्पणअक्षत, काले तिल, गन्ने का रस, भाँग (जहाँ परंपरा हो), जनेऊ
पात्रतांबे या पीतल का लोटा, थाली, आचमनी, गड़गड़ी (टपकने वाला पात्र)
दीप-धूपघी का दीपक, रुई की बत्ती, धूप या अगरबत्ती, कपूर
नैवेद्यमिश्री, सफ़ेद मिठाई, खीर, मौसमी फल, नारियल
जापरुद्राक्ष की माला
वस्त्रसफ़ेद वस्त्र (व्रती के लिए), पूजा चौकी पर बिछाने को सफ़ेद कपड़ा

शिवलिंग पर क्या चढ़ाएँ और क्या नहीं?

यह सवाल सबसे ज़्यादा पूछा जाता है, और इसका जवाब सबसे ज़्यादा गड़बड़ मिलता है। दोनों सूचियाँ साफ़-साफ़ यह रहीं।

शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा और सफ़ेद फूल अर्पित करते हुए, ऊपर गड़गड़ी से गिरती दूध की धार — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)

✓ ये चढ़ाएँ

  • जल — सबसे पहले और सबसे ज़रूरी
  • कच्चा दूध, दही, घी, शहद, शक्कर
  • बेलपत्र — तीन पत्तों वाला, साबुत
  • धतूरा और आक (मदार) के फूल
  • सफ़ेद कनेर, चमेली, कमल
  • भस्म और चंदन
  • काले तिल, अक्षत, शमी पत्र
  • गन्ने का रस, नारियल का गोला

✗ ये न चढ़ाएँ

  • केतकी (केवड़े) का फूल
  • तुलसी दल
  • हल्दी और कुमकुम
  • सिंदूर व रोली
  • शंख से जल
  • बासी, कुम्हलाए या ज़मीन पर गिरे फूल
  • कीड़ा लगे या फटे बेलपत्र
  • टूटे हुए चावल

केतकी क्यों नहीं? शिव पुराण की कथा है कि ब्रह्मा और विष्णु में बड़प्पन का विवाद हुआ और तय हुआ कि जो अनंत ज्योतिर्लिंग का छोर पहले खोज लाए, वही बड़ा। किसी को छोर नहीं मिला। विष्णु ने सच कह दिया, पर ब्रह्मा ने केतकी के फूल को झूठा साक्षी बना लिया। शिव ने केतकी को शाप दिया कि उसका फूल कभी उनकी पूजा में स्वीकार न होगा।

शंख से जल क्यों नहीं? मान्यता है कि शंख की उत्पत्ति शंखचूड़ नामक दैत्य से जुड़ी है, जिसका वध शिव ने किया था। इसलिए शिवलिंग पर शंख से जल नहीं चढ़ाया जाता, जबकि विष्णु पूजा में शंख अनिवार्य है।

और एक बात जो लगभग कोई नहीं बताता — पुराण में फूलों की पूरी वरीयता सूची है। स्कंद पुराण कहता है कि एक आक का फूल दस स्वर्णमुद्रा के दान के बराबर है, कनेर हज़ार आक के बराबर, और शमी का एक फूल हज़ार कुश-पुष्पों के बराबर। ध्यान दीजिए — आक और शमी जंगल में मुफ़्त उगते हैं, कमल ख़रीदना पड़ता है। संदेश साफ़ है: जो सहज मिल जाए, वही सबसे ऊपर है।

सोमवार के व्रत में क्या खाना चाहिए?

सोमवार का व्रत निर्जला नहीं होता। यह उन व्रतों में से है जिन्हें आम गृहस्थ जीवन भर निभा सके, इसलिए इसमें छूट भी है और लचीलापन भी। तीन तरह से रखा जाता है:

सोमवार व्रत की फलाहारी थाली — साबूदाना खिचड़ी, सेंधा नमक वाले आलू, दही, फल, सिंघाड़े की पूरी, दूध और मखाना — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)

क्या खा सकते हैं: मौसमी फल, दूध, दही, छाछ, पनीर, साबूदाना, समक के चावल, कुट्टू और सिंघाड़े का आटा, आलू, शकरकंद, लौकी, अरबी, मखाना, मेवे, नारियल, गुड़, मिश्री। मसालों में सेंधा नमक, काली मिर्च और जीरा।

क्या नहीं: अन्न (गेहूँ, चावल, दाल), साधारण नमक, प्याज़-लहसुन, मांस-मछली-अंडा, मदिरा, और तामसिक या बहुत तला-भुना भोजन।

एक बात साफ़ कह दूँ — साबूदाने की तली टिक्की खाकर भारी पेट लेकर बैठ जाना व्रत नहीं है। उपवास का अर्थ ही है उप-वास, यानी ईश्वर के पास बैठना। पेट भारी हो तो मन कहीं नहीं बैठता।

⚠️ स्वास्थ्य — यह हिस्सा ज़रूर पढ़ें

  • गर्भवती व स्तनपान कराने वाली महिलाएँ पूरा उपवास न रखें — फलाहार और दूध पर्याप्त है
  • मधुमेह (डायबिटीज़) है तो लंबा उपवास रक्त शर्करा गिरा सकता है; दवा और भोजन का समय अपने डॉक्टर से पूछकर ही बदलें
  • रक्तचाप, थायरॉइड, किडनी या हृदय रोग में लंबे उपवास से पहले चिकित्सक से बात कर लें
  • बुज़ुर्गों और छोटे बच्चों के लिए निर्जला या पूर्ण उपवास उचित नहीं
  • चक्कर, घबराहट, अत्यधिक कमज़ोरी या ठंडा पसीना महसूस हो तो व्रत तुरंत खोल दें — शास्त्र में भी शरीर की रक्षा पहला धर्म है

दिन भर पानी पीते रहें। सोमवार व्रत में जल का निषेध नहीं है।

सोमवार का व्रत कितने बजे खोलना चाहिए?

यह सवाल इतना पूछा जाता है कि इसका सीधा जवाब पहले दे देते हैं: सबसे प्रचलित नियम यह है कि सोमवार का व्रत उसी दिन शाम को, प्रदोष काल की शिव पूजा और कथा के बाद खोला जाता है — यानी सूर्यास्त के आसपास।

पर परंपराएँ तीन हैं, और तीनों मान्य हैं। इसीलिए लोग उलझते हैं।

परंपराकब पारणकहाँ प्रचलित
प्रदोष काल मेंसूर्यास्त के आसपास, शाम की पूजा व कथा के बादसबसे व्यापक — उत्तर व मध्य भारत
तीसरे पहर तकदोपहर लगभग 3 से 4 बजे के बीचकई पारिवारिक परंपराओं में
अगले सूर्योदय परमंगलवार सुबह स्नान के बाददक्षिण भारत, कार्तिक सोमवार व्रत

“तीसरा पहर” होता क्या है? दिन को चार पहरों में बाँटा जाता है, हर पहर लगभग तीन घंटे का। सूर्योदय छह बजे मानें तो पहला पहर छह से नौ, दूसरा नौ से बारह, तीसरा बारह से तीन। यानी तीसरा पहर दोपहर तीन बजे के आसपास पूरा होता है। इसी को लोग “तीन बजे व्रत खोलना” कहते हैं।

सबसे सही तरीक़ा यह है कि अपने घर की परंपरा देखें। और अगर घर में कोई परंपरा न हो, तो प्रदोष काल वाला नियम अपना लीजिए — वही सबसे व्यापक है।

कितने सोमवार करने चाहिए और कब से शुरू करें?

सामान्य सोमवार व्रत में संख्या का कोई बंधन नहीं है। आप एक सोमवार भी रख सकते हैं और जीवन भर भी। यही इस व्रत की सबसे बड़ी सुविधा है — यह किसी गिनती में नहीं बाँधता।

फिर भी संकल्प के साथ रखना हो तो प्रचलित संख्याएँ हैं 5, 7, 11 या 16। पुराण की मूल विधि, जैसा ऊपर बताया, आठ सोमवार की है और नवें पर उद्यापन।

कब से शुरू करें? स्कंद पुराण कहता है कि यह व्रत किसी भी मास के शुक्ल पक्ष के किसी भी सोमवार से आरंभ किया जा सकता है। यह जानकारी काम की है, क्योंकि आजकल अक्सर कह दिया जाता है कि “सावन से ही शुरू करना चाहिए” — ऐसा कोई अनिवार्य नियम नहीं है।

व्यवहार में इन महीनों को श्रेष्ठ माना जाता है:

सोलह सोमवार व्रत की विधि, कथा और उद्यापन अलग हैं — उस पर हम पूरा लेख लिख रहे हैं।

सोमवार के दिन कौन सा मंत्र बोलना चाहिए?

सोमवार के लिए तीन मंत्र काफ़ी हैं। इससे ज़्यादा की ज़रूरत नहीं।

मंत्रकब और कितना
ॐ नमः शिवाय
पंचाक्षर मंत्र
जलाभिषेक के समय और पूजा के बाद रुद्राक्ष माला से 108 बार। यही सोमवार का मुख्य मंत्र है।
ॐ सों सोमाय नमःचंद्रमा के लिए — रात में चंद्रदर्शन के समय 11 या 21 बार
महामृत्युंजय मंत्र
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे…
रोग, भय या संकट में — 11, 21 या 108 बार

महामृत्युंजय को लोग केवल “मृत्यु टालने वाला मंत्र” समझ लेते हैं। यह वास्तव में ऋग्वेद (7.59.12) की ऋचा है, जिसमें बहुत सुंदर उपमा है — जैसे पकी ककड़ी बेल से बिना खींचे अपने आप छूट जाती है, वैसे ही मैं मृत्यु के बंधन से छूटूँ। यानी यह प्राण बचाने की गुहार नहीं, पक जाने की प्रार्थना है। इस पर हम अलग से लिखेंगे।

सोम प्रदोष — वह सोमवार जो दोगुना हो जाता है

हर मास की दोनों त्रयोदशी तिथियों पर प्रदोष व्रत होता है। जब यह त्रयोदशी सोमवार को पड़ जाए, तो उसे सोम प्रदोष कहते हैं — शिव का दिन और शिव की तिथि एक साथ। इसे साल के सबसे शुभ शिव-दिनों में गिना जाता है।

प्रदोष काल का अर्थ है सूर्यास्त से ठीक पहले और बाद का समय — मोटे तौर पर सूर्यास्त से 45 मिनट पहले से 45 मिनट बाद तक। पूजा इसी खिड़की में होती है, इसलिए सोम प्रदोष का व्रत दिन भर रखकर शाम को इसी काल में खोला जाता है।

सोम प्रदोष हर महीने नहीं आता। साल में दो-तीन ही होते हैं, इसलिए इसका इंतज़ार रहता है।

📅 आने वाले सोम प्रदोष
2027 — सोमवार 19 अप्रैल (चैत्र शुक्ल), सोमवार 30 अगस्त (भाद्रपद कृष्ण), सोमवार 13 सितंबर (भाद्रपद शुक्ल)

तिथियाँ काशी के सूर्योदय के अनुसार हैं। भारत से बाहर या दूर के शहरों में एक दिन का अंतर हो सकता है — अपने शहर का पंचांग देख लें।

सावन और कार्तिक के सोमवार — एक ही व्रत, दो अलग महीने

यह वह बात है जो उत्तर और दक्षिण भारत के लोगों को अक्सर उलझा देती है, और इसका जवाब बहुत सीधा है।

सावन के सोमवार को बारिश में भीगे शिव मंदिर के बाहर लोटा लिए जलाभिषेक के लिए खड़े श्रद्धालु — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)

उत्तर भारत, महाराष्ट्र और गुजरात में श्रावण मास के सोमवार सबसे बड़े हैं — सावन सोमवार। मान्यता है कि समुद्र मंथन इसी मास में हुआ था और शिव ने सृष्टि को बचाने के लिए हलाहल विष पिया था; इसलिए पूरे महीने उनके कंठ को जल से शीतल किया जाता है। इन्हीं दिनों कांवड़ यात्रा चलती है, जब लाखों कांवड़िये हरिद्वार, गंगोत्री और सुल्तानगंज से पैदल गंगाजल लाकर अपने गाँव के शिवालय में चढ़ाते हैं।

कर्नाटक, आंध्र, तेलंगाना और तमिलनाडु में यही महत्व कार्तिक मास के सोमवारों का है — कार्तिक सोमवार व्रत, तमिल में कार्तिगै सोमवारम्। वहाँ यह व्रत सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक चलता है, और कई लोग इसे बारह साल तक या जीवन भर निभाने का संकल्प लेते हैं।

तिथियाँ अलग क्यों? क्योंकि उत्तर भारत पूर्णिमांत पंचांग मानता है, जिसमें मास पूर्णिमा पर ख़त्म होता है, और दक्षिण-पश्चिम अमांत मानता है, जिसमें मास अमावस्या पर ख़त्म होता है। इसी से लगभग पंद्रह दिन का फ़र्क़ आ जाता है।

📅 आने वाले विशेष सोमवार
कार्तिक सोमवार 2026 — 16, 23, 30 नवंबर और 7 दिसंबर
सावन सोमवार 2027 (उत्तर भारत, पूर्णिमांत) — 19 व 26 जुलाई; 2, 9 व 16 अगस्त (कुल पाँच)
सावन सोमवार 2027 (अमांत क्षेत्र) — 9, 16, 23 व 30 अगस्त (कुल चार)

और सिर्फ़ भारत नहीं। नेपाल में श्रावण के चार सोमवार का अपना रंग है — महिलाएँ पूरे महीने हरी, लाल और पीली चूड़ियाँ पहनती हैं, गले में हरा पोते डालती हैं और मेहँदी रचाती हैं। हरा वहाँ श्रावण का रंग है, बरसात में लहलहाते धान के खेतों का रंग। जींस पहनने वाली लड़कियाँ भी उस महीने चूड़ियाँ पहन लेती हैं।

दक्षिण की एक परंपरा और है, जो सबसे सुंदर लगती है। कार्तिक सोमवार को वहाँ किसी शिव-भक्त दंपत्ति को घर बुलाकर भोजन कराया जाता है और उन्हें उमा-महेश्वर मानकर प्रणाम किया जाता है। यानी पूजा सिर्फ़ पत्थर की नहीं होती; जीवित गृहस्थी में भी वही देवता देखे जाते हैं।

सोमवार व्रत का उद्यापन कैसे करें?

अगर आपने संकल्प लेकर व्रत रखे हैं, तो अंतिम सोमवार के बाद उद्यापन करना चाहिए। बिना संकल्प के रखे जा रहे सामान्य सोमवार व्रतों में उद्यापन ज़रूरी नहीं।

  1. सुबह स्नान कर सफ़ेद वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें।
  2. केले के चार खंभों से चौकोर मंडप बनाएँ और आम के पत्तों की बंदनवार व सफ़ेद फूलों से सजाएँ।
  3. बीच में चौकी रखकर उस पर सफ़ेद कोरा वस्त्र बिछाएँ और शिव-पार्वती की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। साथ में एक पात्र में चंद्रमा की भी स्थापना करें।
  4. पूर्व की ओर मुख करके बैठें। संकल्प लेकर विधिवत षोडशोपचार पूजा, अभिषेक और आरती करें।
  5. हवन करें — सामग्री में तिल, जौ, घी और खीर रखें। शिव मंत्र से आहुतियाँ दें।
  6. ब्राह्मणों या ज़रूरतमंदों को खीर-पूरी का भोजन कराएँ और यथाशक्ति वस्त्र व दक्षिणा दें।
  7. अंत में क्षमा-प्रार्थना करें — पूजा में जो भूल-चूक हुई हो, उसके लिए।

स्कंद पुराण में उद्यापन इससे कहीं भव्य है — सोने के कलश, आठ दिशाओं में आठ शक्तियाँ, रातभर जागरण। पर वहीं यह भी कहा है कि जो घर पर अपने सामर्थ्य भर यह व्रत कर ले, उसे तीर्थयात्रा के बराबर फल मिलता है। सामर्थ्य से ज़्यादा का दिखावा शास्त्र ने कभी नहीं माँगा।

सोमवार के दिन क्या नहीं करना चाहिए?

व्रत रखें या न रखें, सोमवार को कुछ बातें परंपरा में टाली जाती हैं। इनके पीछे कहीं शास्त्र है, कहीं व्यावहारिक बुद्धि, और कहीं बस लोक-रीति — मैं तीनों को अलग-अलग रख रहा हूँ ताकि आप ख़ुद तय कर सकें।

बाक़ी काम — नौकरी, यात्रा, ख़रीदारी, पढ़ाई — सब सामान्य रूप से किए जाते हैं। सोमवार को शुभ कार्यों के लिए अच्छा दिन माना गया है, अशुभ नहीं।

विदेश में सोमवार का व्रत कैसे रखें?

सबसे पहले वह सवाल हटा दीजिए जो सबको परेशान करता है — भारत की तारीख़ देखूँ या अपनी? जवाब है: अपनी। सामान्य सोमवार व्रत तिथि पर नहीं, वार पर आधारित है। आपके शहर में जब सोमवार है, तब आपका व्रत है — सूर्योदय आपका, सूर्यास्त आपका, प्रदोष काल आपका।

विदेश के एक फ्लैट में खिड़की के पास छोटा शिव मंदिर — पीतल का शिवलिंग, दीपक, बेलपत्र और बाहर ठंडी शाम का शहर — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)

अपवाद केवल सोम प्रदोष का है, क्योंकि वह त्रयोदशी तिथि से बँधा है। उसके लिए अपने शहर का पंचांग देखें, या परिवार के साथ भारतीय तिथि पर चलें — दोनों चलेगा, बस एक बार तय कर लीजिए।

और एक बात जो कहनी चाहिए। परदेस में सोमवार को जल चढ़ाना कठिन है — समय नहीं, सामान नहीं, सुबह ठंड है, दफ़्तर की मीटिंग है। पर जब आप चढ़ा लेते हैं, तो उस दिन आपको अपने गाँव का वह शिवालय याद आता है जहाँ बचपन में दादी उँगली पकड़कर ले जाती थीं। उस याद की क़ीमत है। और बच्चों को वह याद देने का एक ही तरीक़ा है — उनके सामने यह करना।

अपने बच्चों को यह दिन कैसे समझाएँ

बच्चे “यह क्यों करते हैं” पूछते हैं, और “ऐसा ही होता है” कहकर टाल देने से परंपरा बचती नहीं, बस टलती है। सोमवार के पास इसका बहुत अच्छा जवाब है।

दादी बच्चों को शिवलिंग के पास बैठाकर बेलपत्र चढ़ाना सिखाती हुई — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)

छोटे बच्चों (4–8 साल) के लिए — रात में चाँद दिखाइए और पूछिए कि कल यह ऐसा ही था क्या। फिर बताइए कि चाँद हर दिन थोड़ा घटता है और फिर बढ़ता है, क्योंकि एक बार चाँद से बड़ी ग़लती हो गई थी और भोलेनाथ ने उसे माफ़ करके आधी सज़ा हटा दी थी — इसीलिए चाँद पूरा मिटता नहीं, लौट आता है। इस कहानी में क्षमा का पहला पाठ छुपा है।

बड़े बच्चों (9–14 साल) के लिए — पूछिए कि Monday में Moon क्यों छुपा है। जब वे हैरान हों, तब जर्मन Montag, फ़्रेंच lundi और स्पेनी lunes का उदाहरण दीजिए। यह एक झटके में दिखा देता है कि उनकी परंपरा किसी कोने में पड़ी चीज़ नहीं, दुनिया की सबसे पुरानी साझा समझ का हिस्सा है। विदेश में पढ़ने वाले बच्चों के लिए यह बात ख़ास काम की है।

किशोरों के लिए — उन्हें स्कंद पुराण वाली गंधर्व कन्या की कथा सुनाइए, जो अपने रूप के अहंकार में कह बैठी थी कि तीनों लोकों में कोई उसके बराबर सुंदर नहीं। शिवगण ने जाते-जाते जो कहा — कि जन्म, रूप, विद्या और धन कुछ भी हो, अहंकार आ गया तो मनुष्य नष्ट हो जाता है — वह बात सोशल मीडिया के ज़माने में जितनी सटीक बैठती है, शायद तब भी नहीं बैठती थी। पूरी कथा हमने सोमवार व्रत कथा वाले लेख में दी है।

और सबसे अच्छा तरीक़ा तो यह है — बच्चे को व्रत मत रखवाइए, पूजा में शामिल कर लीजिए। उसके हाथ से एक लोटा जल चढ़वाइए, एक बेलपत्र रखवाइए। पाँच मिनट काफ़ी हैं। जो हाथ ने किया वह याद रहता है, जो सिर्फ़ सुना वह भूल जाता है।

आख़िर में

सोमवार का व्रत भारत के सबसे सरल व्रतों में है। न कठिन तिथि-गणना, न महँगी सामग्री, न कोई सामाजिक बंधन। स्त्री रखे या पुरुष, गाँव में रखे या न्यूयॉर्क के फ्लैट में — विधि वही रहती है और फल भी वही कहा गया है।

और इसका मूल संदेश उसी कथा में है जिससे यह शुरू हुआ। चंद्रमा ने ग़लती की, शाप पाया, घटते-घटते लगभग मिट गया — और फिर शिव की शरण में जाकर लौट आया। शाप मिटा नहीं, पर उसका रूप बदल गया: जो पूर्ण विनाश था, वह घटने-बढ़ने का चक्र बन गया। आज भी हर महीने चाँद घटता है और हर महीने पूरा हो जाता है।

🌙 अगर पूरे लेख से एक बात याद रखनी हो

सोमवार का व्रत मन का व्रत है। इस दिन का सबसे बड़ा अर्पण दूध या बेलपत्र नहीं — दिन भर मन को शांत रखना है। अगर आप उपवास रखकर किसी पर चिल्ला पड़े, तो व्रत हुआ और नहीं भी हुआ। और अगर आप कुछ न खा पाने की स्थिति में हों पर पूरे दिन किसी से कड़वा न बोलें — तो व्रत हो गया।

बाक़ी सब विधि है। यह मूल है।

अस्वीकरण: यह लेख धार्मिक परंपरा, पुराणों और लोकमान्यताओं की जानकारी देने के उद्देश्य से लिखा गया है। विधि, तिथि और नियम क्षेत्र, संप्रदाय और पारिवारिक परंपरा के अनुसार भिन्न हो सकते हैं — अपने घर की परंपरा और स्थानीय पंचांग को प्राथमिकता दें। यहाँ दी गई कोई भी बात चिकित्सकीय सलाह नहीं है। उपवास से पहले, विशेषकर गर्भावस्था, मधुमेह, रक्तचाप, थायरॉइड या किसी दीर्घकालिक रोग की स्थिति में, अपने चिकित्सक से परामर्श अवश्य करें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल — FAQs

सोमवार का व्रत किसके लिए रखा जाता है?
सोमवार का व्रत भगवान शिव के लिए रखा जाता है, और उनके साथ चंद्रदेव (सोम) के लिए भी। शिव मस्तक पर चंद्रकला धारण करने के कारण सोमेश्वर कहलाते हैं, और उन्हीं के नाम पर इस दिन का नाम सोमवार पड़ा। पूजा में माता पार्वती भी साथ पूजी जाती हैं। यह व्रत किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं — स्त्री, पुरुष और बच्चे, सभी रख सकते हैं।
सोमवार का व्रत कितने बजे खोलना चाहिए?
सबसे प्रचलित नियम यह है कि सोमवार का व्रत उसी दिन शाम को प्रदोष काल में, यानी सूर्यास्त के आसपास, शिव पूजा और व्रत कथा के बाद खोला जाता है। कुछ परिवारों में इसे तीसरे पहर तक, यानी दोपहर लगभग तीन बजे खोल लिया जाता है। दक्षिण भारत की कार्तिक सोमवार परंपरा में व्रत अगले सूर्योदय तक चलता है। तीनों मान्य हैं — अपने घर की परंपरा का पालन करें।
सोमवार के व्रत में क्या खाना चाहिए?
सोमवार के व्रत में फल, दूध, दही, छाछ, पनीर, साबूदाना, समक के चावल, कुट्टू और सिंघाड़े का आटा, आलू, शकरकंद, लौकी, मखाना, मेवे, नारियल और मिश्री खाई जा सकती है। मसालों में सेंधा नमक, काली मिर्च और जीरा चलते हैं। अन्न, साधारण नमक, प्याज़-लहसुन, मांस-मछली-अंडा और मदिरा वर्जित हैं। यह व्रत निर्जला नहीं होता, इसलिए दिन भर जल पीते रहना चाहिए।
सोमवार का व्रत कितने सोमवार तक रखना चाहिए?
सामान्य सोमवार व्रत में संख्या का कोई बंधन नहीं है — इसे एक बार भी रखा जा सकता है और जीवन भर भी। संकल्प के साथ रखना हो तो आमतौर पर 5, 7, 11 या 16 सोमवार लिए जाते हैं और अंतिम सोमवार के बाद उद्यापन किया जाता है। स्कंद पुराण में वर्णित मूल विधि आठ सोमवार की है, जिसमें नवें सोमवार को उद्यापन होता है। जितना निभा सकें, उतने का ही संकल्प लें।
सोमवार का व्रत कब से शुरू करना चाहिए?
स्कंद पुराण के अनुसार सोमवार व्रत किसी भी मास के शुक्ल पक्ष के किसी भी सोमवार से आरंभ किया जा सकता है — इसके लिए सावन का इंतज़ार करना अनिवार्य नहीं है। व्यवहार में श्रावण का पहला सोमवार सबसे शुभ माना जाता है, और उसके बाद कार्तिक, वैशाख तथा मार्गशीर्ष के सोमवार। दक्षिण भारत में कार्तिक मास से आरंभ करने की परंपरा अधिक है।
शिवलिंग पर क्या नहीं चढ़ाना चाहिए?
शिवलिंग पर केतकी (केवड़े) का फूल, तुलसी दल, हल्दी, कुमकुम, सिंदूर और रोली नहीं चढ़ाई जाती, और शंख से जल अर्पित करना भी वर्जित माना गया है। इसके अलावा बासी, कुम्हलाए या ज़मीन पर गिरे फूल, कीड़ा लगे या फटे बेलपत्र और टूटे हुए चावल भी नहीं चढ़ाने चाहिए। केतकी की मनाही की कथा शिव पुराण में है, जिसमें केतकी ने ब्रह्मा के पक्ष में झूठी गवाही दी थी।
शिवलिंग पर क्या-क्या चढ़ाना चाहिए?
शिवलिंग पर सबसे पहले शुद्ध जल चढ़ाया जाता है, फिर कच्चा दूध, दही, घी, शहद और शक्कर — यही पंचामृत अभिषेक है। इसके बाद बेलपत्र (चिकनी सतह नीचे की ओर करके), सफ़ेद पुष्प, धतूरा, आक के फूल, भस्म, चंदन, काले तिल, अक्षत और शमी पत्र अर्पित किए जाते हैं। हर अभिषेक के बाद और अंत में शुद्ध जल डालना चाहिए। शास्त्र कहते हैं कि श्रद्धा से चढ़ाया एक लोटा जल भी शिव को प्रसन्न कर देता है।
सोमवार व्रत करने से क्या होता है?
परंपरा में सोमवार व्रत को मन की शांति, रोगमुक्ति, दांपत्य सुख, संतान सुख और मनोवांछित जीवनसाथी की प्राप्ति से जोड़ा जाता है। ज्योतिष में चंद्रमा मन का कारक है, इसलिए इसे चंद्र दोष और मानसिक अस्थिरता का उपाय भी माना जाता है। स्कंद पुराण कहता है कि यह व्रत सब वर्णों के लिए है और सब कामनाएँ पूर्ण करता है। व्यावहारिक स्तर पर यह सप्ताह में एक दिन संयम और हल्के आहार का अभ्यास कराता है।
सोम प्रदोष व्रत क्या है और सामान्य सोमवार व्रत से कैसे अलग है?
जब किसी मास की त्रयोदशी तिथि सोमवार को पड़ जाए, तो उसे सोम प्रदोष कहते हैं — शिव का दिन और शिव की तिथि एक साथ। सामान्य सोमवार व्रत वार पर आधारित है और साल के किसी भी सोमवार को रखा जा सकता है, जबकि सोम प्रदोष तिथि पर आधारित है और साल में केवल दो-तीन बार आता है। इसकी पूजा प्रदोष काल में — सूर्यास्त से लगभग 45 मिनट पहले से 45 मिनट बाद तक — की जाती है।
सावन के सोमवार और कार्तिक के सोमवार में क्या अंतर है?
व्रत एक ही है, केवल महीना अलग है। उत्तर भारत, महाराष्ट्र और गुजरात में श्रावण मास के सोमवार सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं, क्योंकि मान्यता है कि इसी मास में समुद्र मंथन हुआ और शिव ने हलाहल विष पिया था। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु में यही महत्व कार्तिक मास के सोमवारों का है। तिथियों में अंतर इसलिए है क्योंकि उत्तर भारत पूर्णिमांत और दक्षिण-पश्चिम अमांत पंचांग मानता है।
सोमवार के दिन कौन सा मंत्र बोलना चाहिए?
सोमवार का मुख्य मंत्र पंचाक्षर मंत्र "ॐ नमः शिवाय" है, जिसका जाप जलाभिषेक के समय और पूजा के बाद रुद्राक्ष माला से 108 बार किया जाता है। चंद्रदेव के लिए रात में चंद्रदर्शन के समय "ॐ सों सोमाय नमः" का 11 या 21 बार जाप किया जाता है। रोग, भय या संकट की स्थिति में महामृत्युंजय मंत्र (ॐ त्र्यम्बकं यजामहे…) का जाप किया जाता है, जो ऋग्वेद 7.59.12 की ऋचा है।
सोमवार के दिन क्या नहीं करना चाहिए?
सोमवार को क्रोध, कटु वचन और झगड़े से सबसे अधिक बचना चाहिए, क्योंकि चंद्रमा मन का कारक है और यह दिन मन को साधने का है। मांस, मदिरा और तामसिक भोजन से परहेज़ किया जाता है, और व्रती दिन में दूध स्वयं न पीकर शिव को अर्पित करता है। कई परिवारों में इस दिन बाल धोना और नाख़ून काटना भी टाला जाता है — यह लोक-रीति है, शास्त्रीय आदेश नहीं। नौकरी, यात्रा और पढ़ाई जैसे काम सामान्य रूप से किए जाते हैं।
क्या पीरियड्स के दौरान सोमवार का व्रत रखा जा सकता है?
परंपरा में मासिक धर्म के दिनों में पूजा, अभिषेक और शिवलिंग का स्पर्श नहीं किया जाता, पर व्रत का संकल्प टूटता नहीं माना जाता। सामान्य प्रचलन यह है कि उन दिनों व्रत रखा जा सकता है और मन ही मन "ॐ नमः शिवाय" का जाप किया जा सकता है, जबकि पूजा घर की किसी अन्य महिला से करवा ली जाती है। इस विषय पर परिवारों और क्षेत्रों में मत भिन्न हैं — अपने घर की परंपरा का पालन करना ही सबसे उचित है।
सोमवार व्रत का उद्यापन कैसे करते हैं?
उद्यापन अंतिम संकल्पित सोमवार के बाद किया जाता है। सुबह स्नान कर सफ़ेद वस्त्र पहनें, केले के चार खंभों से मंडप बनाकर आम के पत्तों और सफ़ेद फूलों से सजाएँ, बीच में चौकी पर सफ़ेद वस्त्र बिछाकर शिव-पार्वती की प्रतिमा तथा एक पात्र में चंद्रमा की स्थापना करें। फिर विधिवत पूजा, अभिषेक और हवन करें, ज़रूरतमंदों को खीर-पूरी का भोजन कराएँ और यथाशक्ति दक्षिणा दें। बिना संकल्प के रखे सामान्य व्रतों में उद्यापन आवश्यक नहीं है।
विदेश में रहते हुए सोमवार का व्रत कैसे रखें?
सामान्य सोमवार व्रत वार पर आधारित है, तिथि पर नहीं — इसलिए विदेश में अपने स्थानीय सोमवार को ही व्रत रखें, अपने शहर के सूर्योदय से अपने ही सूर्यास्त तक। केवल सोम प्रदोष तिथि पर आधारित है, उसके लिए स्थानीय पंचांग देखें। शिवलिंग न हो तो शिव का चित्र, बेलपत्र न मिले तो भारतीय स्टोर के सूखे बेलपत्र, और धतूरा न मिले तो कोई भी सफ़ेद फूल चलेगा। स्मोक अलार्म की समस्या हो तो इलेक्ट्रिक दीया स्वीकार्य है।
सोमवार का व्रत सोलह सोमवार व्रत से कैसे अलग है?
सामान्य सोमवार व्रत बिना किसी निश्चित संख्या के, साल के किसी भी सोमवार को रखा जा सकता है और उसमें उद्यापन अनिवार्य नहीं है। सोलह सोमवार व्रत एक संकल्पित अनुष्ठान है जिसमें लगातार सोलह सोमवार व्रत रखे जाते हैं और सत्रहवें सोमवार को विधिवत उद्यापन किया जाता है, जिसमें आटे की पंजीरी का विशेष विधान है। सोलह सोमवार मुख्यतः मनचाहे जीवनसाथी और मनोकामना पूर्ति के लिए रखा जाता है। पूजा विधि दोनों की लगभग एक जैसी है।