सुबह-सुबह सास कहती हैं — "आज अमावस है, बाल मत धोना।" पड़ोसन कहती है — "नाखून भी मत काटना, और शाम को देहरी पर दीया ज़रूर जलाना।" फ़ोन पर कोई वीडियो कहता है — "अमावस्या की रात नकारात्मक शक्तियाँ जागती हैं, यह भूलकर भी न करें…" और आप सोचती रह जाती हैं कि इनमें से कौन-सी बात सच में किसी ग्रंथ में लिखी है।

अमावस्या हर महीने आती है, इसलिए ये सवाल भी हर महीने लौटते हैं: अमावस्या के दिन क्या नहीं करना चाहिए, क्या करना चाहिए, बाल धोना और नाखून काटना ठीक है या नहीं, और पितरों का तर्पण कैसे करें।

इस खोज में एक नियम ऐसा मिला जिसकी चर्चा इंटरनेट की सूचियों में मुझे नहीं दिखी — और वह बाल या नाखून के बारे में नहीं, पेड़ के पत्तों के बारे में है। विष्णु पुराण उसका कारण भी बताता है। वह आगे है।

अमावस्या के दिन क्या करें और क्या न करें — सीधा जवाब

ग्रंथों के अनुसार अमावस्या मुख्य रूप से पितरों (पूर्वजों) का दिन है। मनुस्मृति में इसी दिन हर महीने पितरों का श्राद्ध करने का विधान है। बाक़ी ज़्यादातर नियम घरों की परंपरा से आते हैं। एक नज़र में:

करें:

  1. सुबह स्नान, और हो सके तो पितरों के लिए तिल-जल से तर्पण।
  2. पितरों के नाम से भोजन का एक हिस्सा — कौवे, गाय या किसी ज़रूरतमंद को।
  3. अपनी सामर्थ्य से दान — अन्न, तिल, गुड़, वस्त्र।
  4. शाम को घर की देहरी पर या पीपल के नीचे दीपक।
  5. मन शांत रखना, झगड़े और कड़वे बोल से बचना।

न करें:

  1. पेड़ की डाल या पत्ते तोड़ना — यह विष्णु पुराण में मिला।
  2. पति-पत्नी का संबंध — मनुस्मृति 4.128 में अमावस्या पर ब्रह्मचर्य कहा गया है।
  3. मांस, मदिरा और तामसिक भोजन — परंपरा।
  4. बाल धोना, बाल-नाखून काटना — परंपरा; ग्रंथ में इसका आधार मुझे नहीं मिला (नीचे पूरी बात)।
  5. नए बड़े काम की शुरुआत — परंपरा; पंचांग देखकर।
जूट की चटाई पर पीतल की कटोरियों में चावल, काले तिल और गेहूँ, थाली में गुड़ की डली, तह किया सफ़ेद सूती कपड़ा, सलेटी ऊनी कंबल, मिट्टी का जलता दीया और पीतल का लोटा — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
अमावस्या के दान की आम सामग्री — अन्न, काले तिल, गुड़, वस्त्र और कंबल।

अमावस्या क्या है — और यह पितरों का दिन क्यों है?

अमावस्या वह तिथि है जिस दिन चंद्रमा आकाश में दिखाई नहीं देता — सूर्य और चंद्रमा एक ही दिशा में होते हैं। शब्द दो हिस्सों से बना है: अमा (साथ) + वस्या (रहना) — यानी वह दिन जब सूर्य और चंद्रमा "साथ रहते" हैं (साभार: Wikipedia, Amavasya)। हर महीने में एक अमावस्या होती है — कृष्ण पक्ष का आख़िरी दिन।

पितरों से इसका रिश्ता ग्रंथों में साफ़ है। मनुस्मृति के तीसरे अध्याय में गृहस्थ के लिए कहा गया है:

"…हर महीने, अमावस्या के दिन, पितरों के लिए श्राद्ध करे।"
— मनुस्मृति 3.122, अनुवाद: G. Bühler (साभार: sacred-texts.com)

अगले श्लोक (3.123) में इस मासिक श्राद्ध का नाम "अन्वाहार्य" बताया गया है, और 3.127 में इसे "अमावस्या पर पितरों का प्रसिद्ध श्राद्ध" कहा गया है। श्लोक 3.282 तो यहाँ तक कहता है कि अग्निहोत्री ब्राह्मण अमावस्या के अलावा (सामान्य) श्राद्ध न करे।

विष्णु पुराण इसका एक काव्यात्मक कारण देता है — अमावस्या के दिन चंद्रमा की अंतिम कला का अमृत पितर पीते हैं, और उससे पूरे महीने के लिए तृप्त रहते हैं (विष्णु पुराण, अध्याय 12, अनुवाद: H. H. Wilson, साभार: sacred-texts.com)। इसीलिए परंपरा में अमावस्या को पितरों का दिन माना गया।

अमावस्या के दिन क्या नहीं करना चाहिए?

यह सबसे ज़्यादा खोजा जाने वाला सवाल है। मैंने हर प्रचलित नियम को ग्रंथ से मिलाने की कोशिश की — नतीजा इस तालिका में है:

नियमआधारकहाँ
पेड़ की डाल काटना या पत्ता तोड़ना✅ ग्रंथ में मिलाविष्णु पुराण, अध्याय 12
पति-पत्नी का संबंध (ब्रह्मचर्य रखें)✅ ग्रंथ में मिलामनुस्मृति 4.128
वेद-पाठ शुरू करना / पढ़ाना✅ ग्रंथ में मिलामनुस्मृति 4.113–114
मांस, मदिरा, तामसिक भोजनपरंपराघरों में प्रचलित
बाल धोनापरंपरा — ग्रंथ में नहीं मिला—
बाल या नाखून काटना, दाढ़ी बनानापरंपरा — ग्रंथ में नहीं मिला—
नया काम, गृह-प्रवेश, ख़रीदारीपरंपरा / ज्योतिषपंचांग देखकर
रात को सुनसान जगह जाना, श्मशानपरंपरालोक-मान्यता

पेड़-पत्ते न तोड़ने का नियम — और उसका कारण

यह वही नियम है जिसकी बात शुरू में की थी। विष्णु पुराण के अनुसार अमावस्या के दिन चंद्रमा पहले जल में और फिर पेड़-पौधों की डालियों और कोंपलों में वास करता है। और लिखा है कि जो व्यक्ति उस समय, जब चंद्रमा वृक्षों में हो, कोई डाल काटता है या एक पत्ता भी गिराता है, उसे ब्रह्महत्या जैसा दोष लगता है (विष्णु पुराण, अध्याय 12, अनुवाद: H. H. Wilson)।

इसीलिए बहुत से घरों में अमावस्या को तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते, और पूजा के लिए बिल्वपत्र या तुलसी-दल एक दिन पहले ही तोड़कर रख लिए जाते हैं। यह नियम ग्रंथ से सीधा मेल खाता है।

ध्यान दें: मनुस्मृति 4.113–114 का "अमावस्या गुरु का नाश करती है" वाला कथन वेद-अध्ययन के संदर्भ में है — उस दिन वेद-पाठ न करने के बारे में। इसे "अमावस्या पर कुछ भी पढ़ना-पढ़ाना अशुभ" समझना ग़लत होगा।

अमावस्या को बाल धोना चाहिए या नहीं?

दो हिस्सों वाला चित्र — बाईं ओर पत्थर के नल के नीचे लंबे बाल धोती सफ़ेद साड़ी पहने स्त्री, दाईं ओर चटाई पर बैठे धोती पहने बुज़ुर्ग पुरुष नेलकटर से नाखून काटते हुए, सामने पीतल की थाली — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
बाल धोना और नाखून काटना — अमावस्या पर सबसे ज़्यादा पूछे जाने वाले दो सवाल।

सीधा जवाब: अमावस्या पर बाल धोने की मनाही का कोई आधार मुझे मनुस्मृति या विष्णु पुराण के उन अध्यायों में नहीं मिला जिनमें अमावस्या के नियम हैं। मनुस्मृति के चौथे अध्याय में अमावस्या से जुड़े नियम हैं — वेद-पाठ और ब्रह्मचर्य के — पर बाल धोने या तेल लगाने का अमावस्या से कोई संबंध वहाँ नहीं जोड़ा गया।

फिर यह मान्यता कहाँ से आई? घरों में कहा जाता है कि अमावस्या पर बाल धोने से "घर की लक्ष्मी बह जाती है" या "पितर नाराज़ होते हैं"। यह लोक-परंपरा है — इसका सम्मान करना या न करना आपकी पारिवारिक रीत पर है। पर कुछ बातें साफ़ हैं:

अमावस्या के दिन नाखून काटना चाहिए या नहीं?

यह भी परंपरा है, ग्रंथ-वचन नहीं। मनुस्मृति 4.69 में नाखून-बाल के बारे में बात है, पर वह किसी तिथि से बँधी नहीं है। अमावस्या पर बाल-नाख़ून काटने और दाढ़ी बनाने से बचने की रीत ज़्यादातर इस भाव से जुड़ी है कि यह दिन पितरों के श्राद्ध का है — और श्राद्ध-काल में बाल-नाख़ून न काटने की परंपरा पितृपक्ष में भी दिखती है।

व्यावहारिक सलाह: अगर आप यह रीत मानती हैं, तो एक दिन पहले (चतुर्दशी को) नाखून काट लें। अगर नाखून टूट गया है या चोट लग सकती है, तो काट लेना ही समझदारी है — इस पर किसी पाप या दंड की बात मुझे किसी ग्रंथ में नहीं मिली।

अब वह हिस्सा जो अमावस्या का असली केंद्र है — पितरों के लिए क्या करें, और तर्पण घर पर कैसे करें।

अमावस्या पर पितरों का तर्पण कैसे करें?

भोर की धुंध में नदी के घाट पर कमर तक पानी में खड़े सफ़ेद धोती पहने पुरुष हाथ में कुशा लिए काले तिल मिला जल अर्पित करते हुए, पीछे सीढ़ी पर सफ़ेद साड़ी में पत्नी फूल और तिल की थाली लिए — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
तिल-तर्पण — काले तिल मिला जल, हाथ में कुशा, पितरों के नाम से।

तर्पण का अर्थ है "तृप्त करना" — पितरों को जल और काले तिल अर्पित करना। Wikipedia के Tarpana लेख के अनुसार तिल-तर्पण अमावस्या, संक्रांति, ग्रहण और पितृपक्ष में किया जाता है। घर पर सरल क्रम:

  1. स्नान करके साफ़ वस्त्र पहनें। एक थाली या परात में साफ़ जल, उसमें थोड़े काले तिल।
  2. दाहिने हाथ की अनामिका (रिंग फ़िंगर) में कुशा की अंगूठी (पवित्री) — न मिले तो कुशा का एक तिनका हाथ में।
  3. जनेऊ पहनते हों तो उसे दाहिने कंधे पर (अपसव्य/प्राचीनावीती) करें — पितृ-कर्म में यही रीत है (साभार: Wikipedia, Tarpana)।
  4. दोनों हाथों की अंजलि में तिल-जल लें और उसे अँगूठे और तर्जनी के बीच के हिस्से (पितृ-तीर्थ) से धीरे-धीरे गिराएँ।
  5. हर अंजलि के साथ पितरों का नाम लें — पिता, दादा, परदादा; और माँ की ओर से भी। नाम याद न हों तो "सभी पितरों के लिए" कहें।
  6. अंत में हाथ जोड़कर पितरों से क्षमा और आशीर्वाद माँगें, और जल किसी पौधे की जड़ में डाल दें (तुलसी में नहीं)।

कौन तर्पण करे: Wikipedia के अनुसार परंपरा में तिल-तर्पण वे करते हैं जिनके पिता जीवित नहीं हैं। जिनके माता-पिता जीवित हैं, वे भी अमावस्या पर दीपदान, दान और भोजन का हिस्सा निकाल सकते हैं। स्त्रियाँ तर्पण करें या नहीं, इस पर परिवारों में अलग रीतें हैं — अपने कुल की परंपरा मानें।

पितरों के लिए भोजन का हिस्सा — कौवे, गाय और ज़रूरतमंद

धूप में घर की छत की मुंडेर पर केले के पत्ते पर चावल, सब्ज़ी और रोटी रखती सफ़ेद-लाल किनारी की साड़ी पहने स्त्री, पास में खाना चुगता कौवा — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
छत पर पितरों के नाम का भाग — कौवे को भोजन।

श्राद्ध में कौवे को भोजन या पिंड देने की प्रथा आज भी चलती है (साभार: Wikipedia, Śrāddha)। अमावस्या पर बहुत से घरों में भोजन बनने के बाद सबसे पहले एक पत्तल पर थोड़ा-थोड़ा सब कुछ निकालकर छत पर रखा जाता है। साथ में गाय के लिए एक रोटी, और किसी भूखे या ज़रूरतमंद को भोजन — यह भाव ज़्यादा ज़रूरी है कि पितरों के नाम से किसी का पेट भरे।

अमावस्या को क्या दान करना चाहिए?

दान की कोई एक सूची ग्रंथ में मुझे नहीं मिली; परंपरा में ये चीज़ें आम हैं: काले तिल, अन्न (चावल, गेहूँ), गुड़, सफ़ेद वस्त्र, और सर्दियों में कंबल। सबसे अच्छा दान वह है जो लेने वाले के काम आए — किसी वृद्धाश्रम में भोजन, किसी मज़दूर को कंबल।

अमावस्या की रात क्या करें?

अमावस्या की रात चाँद नहीं होता, इसलिए पुराने समय में यह सबसे अँधेरी रात होती थी। परंपरा में इस रात तीन काम किए जाते हैं:

"अमावस्या की रात नकारात्मक शक्तियाँ जागती हैं" जैसी बातें लोक-भय हैं। जिन ग्रंथों के अनुवाद से मैंने मिलान किया, उनमें ऐसा कोई कथन नहीं मिला। अँधेरी रात में सुनसान जगह न जाना — यह पुराने समय की व्यावहारिक सावधानी भी थी।

अमावस्या को पीपल की पूजा कैसे करें?

ढलती शाम में विशाल पीपल के पेड़ की मोटी जड़ों के बीच पत्थर पर रखा जलता मिट्टी का दीया, पास में तेल की कटोरी और बिखरे काले तिल, ऊपर दिल के आकार के पीपल के पत्ते — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
पीपल के नीचे सरसों के तेल का दीपक — शनि अमावस्या की प्रचलित रीत।
  1. सुबह स्नान के बाद पीपल की जड़ में जल (कई घरों में जल में थोड़ा दूध और काले तिल) चढ़ाएँ।
  2. कच्चा सफ़ेद सूत लेकर पीपल की परिक्रमा करते हुए तने पर लपेटें — सोमवती अमावस्या पर 108 परिक्रमा की रीत कई घरों में है।
  3. शाम को पीपल के नीचे दीपक — शनि अमावस्या पर सरसों के तेल का।
  4. ध्यान रहे — पीपल का पत्ता न तोड़ें; विष्णु पुराण का पेड़-पत्ते वाला नियम यहीं सबसे ज़्यादा लागू होता है।

अमावस्या का व्रत कैसे करें?

अमावस्या पर व्रत रखने की परंपरा है — Wikipedia के अनुसार इस दिन लोग उपवास रखते हैं और विवाहित स्त्रियाँ पति की कुशलता के लिए शिव की पूजा करती हैं। पर अमावस्या व्रत का कोई एक तय विधान मुझे मनुस्मृति में नहीं मिला; वहाँ अमावस्या का मुख्य कर्म श्राद्ध है। आम तौर पर व्रत ऐसे रखा जाता है:

व्रत में क्या खाएँ, इसकी विस्तार से बात हमारे लेख व्रत में क्या खाना चाहिए में है।

सोमवती, शनि, मौनी, पितृ और हरियाली अमावस्या — क्या फ़र्क़ है?

हर अमावस्या एक ही तिथि है; नाम वार या महीने से बदलता है:

नामकबख़ास बात
सोमवती अमावस्याजब अमावस्या सोमवार को पड़ेपीपल की परिक्रमा, सुहाग के लिए व्रत (परंपरा)। सोमवार व्रत से जुड़ाव।
शनि (शनिश्चरी) अमावस्याजब अमावस्या शनिवार को पड़ेपीपल के नीचे सरसों के तेल का दीपक, काले तिल का दान (परंपरा)। ज्येष्ठ की अमावस्या को शनि जयंती भी मनाई जाती है (Wikipedia)।
मौनी अमावस्यामाघ महीने की अमावस्यामौन रहना, सुबह पवित्र स्नान (साभार: Wikipedia, Mauni Amavasya)।
सर्वपितृ / महालया अमावस्यापितृपक्ष का अंतिम दिनसभी पितरों का श्राद्ध — जिनकी तिथि याद न हो, उनका भी।
हरियाली अमावस्यासावन की अमावस्यापेड़ लगाने की परंपरा (उत्तर भारत)।
दिवाली की अमावस्याकार्तिक अमावस्या (अमांत पंचांग में आश्विन)लक्ष्मी-पूजा — साल की एकमात्र अमावस्या जिसे पूरी तरह उत्सव की तरह मनाया जाता है।
मंदिर के आँगन में विशाल पीपल के तने पर कच्चा सफ़ेद सूत लपेटती रंग-बिरंगी साड़ियों में तीन स्त्रियाँ, नीचे पीतल का लोटा और फूल — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
सोमवती अमावस्या — पीपल पर कच्चा सूत लपेटकर परिक्रमा।
सूर्योदय की धुंध में चौड़ी नदी में हाथ जोड़े स्नान करते स्त्री-पुरुष श्रद्धालु, घाट की सीढ़ियों पर पूजा की थाली, दूर नावें — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
मौनी अमावस्या — मौन और भोर का नदी-स्नान।

अमावस्या शुभ है या अशुभ?

ग्रंथों में अमावस्या "अशुभ" नहीं, "पितरों का पर्व" है। मनुस्मृति 4.150 और 4.153 पर्व-दिनों (जिनमें अमावस्या भी है) पर सावित्री को आहुति देने और देव-प्रतिमाओं के दर्शन करने की बात करती है। दिवाली जैसा सबसे बड़ा उत्सव भी अमावस्या की रात ही मनाया जाता है।

नए काम, गृह-प्रवेश या विवाह के लिए अमावस्या से बचना ज्योतिष और मुहूर्त-परंपरा की बात है। और "अमावस्या को जन्मे बच्चे का भाग्य ख़राब होता है" — ऐसा कोई कथन मुझे इन ग्रंथों में नहीं मिला; इस डर से किसी माँ को परेशान नहीं होना चाहिए।

अपनी अमावस्या की तारीख़ कैसे देखें?

"अमावस्या कब है" हर महीने बदलता है, इसलिए यहाँ तारीख़ें नहीं, तरीक़ा दे रहा हूँ — जो हर साल काम आएगा:

  1. पंचांग या कैलेंडर में "कृष्ण पक्ष" का आख़िरी दिन देखें — वही अमावस्या है। पूर्णिमा के लगभग 15 दिन बाद आती है।
  2. तिथि सूर्योदय के समय से गिनी जाती है। कई बार अमावस्या दोपहर में शुरू होकर अगले दिन दोपहर तक रहती है — तब व्रत-स्नान आम तौर पर उस दिन होता है जिस दिन सूर्योदय के समय अमावस्या हो। पितृ-कर्म के लिए दोपहर का समय देखा जाता है।
  3. अमांत और पूर्णिमांत — उत्तर भारत (पूर्णिमांत) और महाराष्ट्र-गुजरात-दक्षिण (अमांत) में महीने का नाम अलग हो सकता है, पर अमावस्या का दिन वही रहता है।
  4. पंचांग-ऐप में अपना शहर चुनें, दिल्ली नहीं।

भारत से बाहर अमावस्या कैसे मनाएँ?

रात में ऊँची इमारतों वाले शहर की बालकनी की रेलिंग पर मिट्टी का दीया रखती कुर्ता-दुपट्टा पहने भारतीय स्त्री पीठ की ओर से, पास में तिल और फूलों की थाली, ऊपर बिना चाँद का आसमान — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
अपार्टमेंट की बालकनी पर अमावस्या का दीपक।

शास्त्र में क्या मिला, क्या नहीं

बातमिला?कहाँ
अमावस्या पर हर महीने पितरों का श्राद्ध✅ मिलामनुस्मृति 3.122, 3.123, 3.127
पितर अमावस्या पर चंद्र-अमृत से महीने भर तृप्त✅ मिलाविष्णु पुराण, अध्याय 12
अमावस्या पर पेड़ की डाल/पत्ता तोड़ना दोष✅ मिलाविष्णु पुराण, अध्याय 12
अमावस्या पर ब्रह्मचर्य✅ मिलामनुस्मृति 4.128
अमावस्या पर वेद-पाठ नहीं✅ मिलामनुस्मृति 4.113–114
बाल धोना मना❌ नहीं मिलापरंपरा
बाल-नाखून काटना मना❌ नहीं मिलापरंपरा
"नकारात्मक शक्तियाँ जागती हैं"❌ नहीं मिलालोक-मान्यता
अमावस्या को जन्म अशुभ❌ नहीं मिला—

"नहीं मिला" का अर्थ "नहीं है" नहीं। धर्मशास्त्र और पुराण-साहित्य बहुत बड़ा है; यह मेरी इस खोज का नतीजा है, अंतिम फ़ैसला नहीं।

निचोड़: अमावस्या डर का दिन नहीं, पितरों को याद करने का दिन है — ग्रंथ यही कहते हैं। तर्पण या पितरों का स्मरण, भोजन का एक हिस्सा, थोड़ा दान, और शाम को एक दीपक — यही इसका सार है। ग्रंथ में जो साफ़ मिला, वह है पेड़-पत्ते न तोड़ना और संयम रखना। बाल धोने और नाखून काटने की मनाही घरों की परंपरा है — मानें तो सम्मान से मानें, पर सेहत और सफ़ाई की क़ीमत पर नहीं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

अमावस्या के दिन क्या नहीं करना चाहिए?
ग्रंथों में अमावस्या के लिए तीन नियम मिले: पेड़ की डाल या पत्ता न तोड़ें (विष्णु पुराण, अध्याय 12 — उस दिन चंद्रमा वृक्षों में वास करता है), ब्रह्मचर्य रखें (मनुस्मृति 4.128), और उस दिन वेद-पाठ न करें (मनुस्मृति 4.113–114)। इसके अलावा परंपरा में मांस-मदिरा और तामसिक भोजन, बाल धोना, बाल-नाखून काटना, नया बड़ा काम शुरू करना और रात को सुनसान जगह जाना टाला जाता है। बाल और नाखून वाले नियमों का आधार मुझे इन ग्रंथों में नहीं मिला — ये घरों की परंपरा हैं। तुलसी या बिल्वपत्र पूजा के लिए चाहिए हों तो एक दिन पहले तोड़कर रख लें।
अमावस्या के दिन क्या करना चाहिए?
अमावस्या मुख्य रूप से पितरों का दिन है — मनुस्मृति 3.122 में हर महीने अमावस्या पर पितरों का श्राद्ध करने को कहा गया है। घर पर इतना किया जा सकता है: सुबह स्नान, काले तिल मिले जल से तर्पण या पितरों का स्मरण, भोजन बनने के बाद पितरों के नाम से एक हिस्सा कौवे, गाय या किसी ज़रूरतमंद को, सामर्थ्य से दान (तिल, अन्न, गुड़, वस्त्र, कंबल), शाम को घर की देहरी पर या पीपल के नीचे दीपक, और मन शांत रखना। सोमवती अमावस्या पर पीपल की परिक्रमा और शनि अमावस्या पर सरसों के तेल का दीपक परंपरा में ख़ास है।
अमावस्या को बाल धोना चाहिए या नहीं?
अमावस्या पर बाल धोने की मनाही घरों की परंपरा है। मनुस्मृति और विष्णु पुराण के जिन अंशों में अमावस्या के नियम हैं, उनमें बाल धोने का कोई निषेध मुझे नहीं मिला। मनुस्मृति के चौथे अध्याय में अमावस्या के नियम वेद-पाठ और ब्रह्मचर्य के बारे में हैं, बाल या तेल के बारे में नहीं। इसलिए यह मानना या न मानना परिवार की रीत पर है। पर सेहत और सफ़ाई पहले — पीरियड्स के बाद का स्नान, पसीना, खुजली या डॉक्टर की सलाह हो तो बाल धो लें। तर्पण से पहले स्नान तो ज़रूरी है; कई परिवार सिर्फ़ शैम्पू से बचते हैं, स्नान से नहीं। लड़कियों के लिए अलग नियम भी ग्रंथ में नहीं मिला।
अमावस्या के दिन नाखून काटना चाहिए या नहीं?
अमावस्या पर नाखून या बाल काटने और दाढ़ी बनाने से बचना परंपरा है, ग्रंथ-वचन नहीं — कम से कम उन अंशों में नहीं जिनसे मैंने मिलान किया। मनुस्मृति 4.69 में नाखून-बाल की बात है, पर वह किसी तिथि से नहीं जुड़ी। यह रीत इस भाव से आती है कि अमावस्या पितरों के श्राद्ध का दिन है, और श्राद्ध के समय बाल-नाख़ून न काटने की परंपरा पितृपक्ष में भी दिखती है। व्यावहारिक हल: रीत मानती हैं तो एक दिन पहले नाखून काट लें। नाखून टूट गया हो या चोट का डर हो, तो काट लेना ही ठीक है — इस पर किसी दंड या पाप का उल्लेख मुझे किसी ग्रंथ में नहीं मिला।
अमावस्या पर पितरों का तर्पण घर पर कैसे करें?
स्नान के बाद एक थाली या परात में साफ़ जल लें और उसमें काले तिल मिलाएँ। दाहिने हाथ की अनामिका में कुशा की अंगूठी पहनें (न मिले तो कुशा का तिनका हाथ में रखें)। जनेऊ हो तो उसे दाहिने कंधे पर करें — पितृ-कर्म की यही रीत है (Wikipedia, Tarpana)। अंजलि में तिल-जल लेकर अँगूठे और तर्जनी के बीच (पितृ-तीर्थ) से धीरे-धीरे गिराएँ और हर बार पिता, दादा, परदादा और माँ की ओर के पितरों का नाम लें; नाम याद न हों तो "सभी पितरों के लिए" कहें। अंत में हाथ जोड़कर आशीर्वाद माँगें और जल किसी पौधे की जड़ में डाल दें। परंपरा में तिल-तर्पण वे करते हैं जिनके पिता जीवित नहीं हैं।
अमावस्या के दिन क्या दान करना चाहिए?
दान की कोई एक तय सूची मुझे ग्रंथों में नहीं मिली; परंपरा में अमावस्या पर ये चीज़ें आम तौर पर दान की जाती हैं: काले तिल, अन्न (चावल, गेहूँ), गुड़, सफ़ेद वस्त्र, और सर्दियों में कंबल। शनि अमावस्या पर काले तिल, सरसों का तेल और काला कपड़ा; सोमवती अमावस्या पर सुहाग की सामग्री दान करने का चलन है। पितरों के नाम से भोजन का हिस्सा कौवे, गाय और किसी भूखे को देना भी दान ही है — श्राद्ध में कौवे को भोजन देने की प्रथा आज भी चलती है (Wikipedia, Śrāddha)। सबसे अच्छा दान वह है जो लेने वाले के सच में काम आए।
सोमवती अमावस्या और शनि अमावस्या में क्या फ़र्क़ है?
दोनों एक ही तिथि हैं — कृष्ण पक्ष का अंतिम दिन — फ़र्क़ सिर्फ़ वार का है। जब अमावस्या सोमवार को पड़े तो उसे सोमवती अमावस्या कहते हैं (Wikipedia, Amavasya); परंपरा में इस दिन पीपल पर कच्चा सूत लपेटकर परिक्रमा की जाती है और सुहागिनें पति की लंबी आयु के लिए व्रत रखती हैं। जब अमावस्या शनिवार को पड़े तो वह शनि या शनिश्चरी अमावस्या कहलाती है; इस दिन पीपल के नीचे सरसों के तेल का दीपक और काले तिल का दान प्रचलित है। ये दोनों साल में कुछ ही बार आती हैं, इसलिए इनका ख़ास इंतज़ार रहता है।
अमावस्या शुभ होती है या अशुभ?
ग्रंथों में अमावस्या अशुभ नहीं, पितरों का पर्व है। मनुस्मृति 3.122–127 में इसी दिन हर महीने पितरों का श्राद्ध करने का विधान है, और 4.150, 4.153 में पर्व-दिनों पर आहुति देने और देव-प्रतिमाओं के दर्शन करने को कहा गया है। साल का सबसे बड़ा उत्सव दिवाली भी अमावस्या की रात ही मनाया जाता है। नए काम, विवाह या गृह-प्रवेश के लिए अमावस्या से बचना ज्योतिष और मुहूर्त की परंपरा है। "अमावस्या की रात नकारात्मक शक्तियाँ जागती हैं" या "अमावस्या को जन्म अशुभ" — ऐसे कथन मुझे इन ग्रंथों में नहीं मिले; इनसे डरने की ज़रूरत नहीं।

संदर्भ के लिए उपयोग किए गए स्रोत — मनुस्मृति 3.122, 3.123, 3.127, 3.282, 4.69, 4.113–114, 4.128, 4.150, 4.153 (अनुवाद: G. Bühler) और विष्णु पुराण, अध्याय 12 (अनुवाद: H. H. Wilson) — दोनों साभार: sacred-texts.com; शब्द का अर्थ, सोमवती अमावस्या, शनि जयंती और व्रत: Wikipedia (Amavasya); तर्पण की विधि: Wikipedia (Tarpana); कौवे को भोजन: Wikipedia (Śrāddha); मौनी अमावस्या: Wikipedia (Mauni Amavasya)। तीन बातें साफ़ कह देना ज़रूरी है। पहली — अमावस्या पर बाल धोने, बाल-नाखून काटने की मनाही, "नकारात्मक शक्तियों" की बात और अमावस्या को जन्म अशुभ होने का कथन इन ग्रंथों में मुझे नहीं मिला; यह खोज का नतीजा है, अंतिम निर्णय नहीं। दूसरी — हर परिवार और क्षेत्र की रीत अलग है; अपने बड़ों और अपने शहर के पंचांग को प्राथमिकता दें। तीसरी — यह लेख किसी को व्रत रखने के लिए नहीं कहता और चिकित्सा-सलाह नहीं है; कोई बीमारी, गर्भावस्था या दवा हो तो व्रत से पहले डॉक्टर से पूछें। किसी ब्रांड या दुकान की सिफ़ारिश नहीं।