एक नज़र में — तीनों रस्में

  • कन्यादान: माता-पिता बेटी का हाथ वर के हाथ में सौंपते हैं और ऊपर से जल की धार छोड़कर संकल्प लेते हैं।
  • हथलेवा (पाणिग्रहण): दुल्हन की मेहंदी लगी हथेली पर सिक्का, हल्दी की गाँठ, चावल, फूल और दूब रखकर दूल्हे का हाथ मिलाया जाता है, फिर दोनों हाथ कपड़े और मौली से बाँधे जाते हैं।
  • मांग भराई (सिंदूर दान): फेरों के बाद दूल्हा सोने-चाँदी की अँगूठी या सिक्के से दुल्हन की मांग में सिंदूर भरता है।

Google पर लोग सबसे ज़्यादा यही पूछते हैं — कन्यादान कौन करता है, कन्यादान कौन-कौन कर सकता है, कन्यादान क्यों किया जाता है, हथलेवा क्या होता है। इन सवालों के जवाब किसी एक किताब में नहीं मिलते। कुछ बातें ग्रंथों में हैं, और बहुत-सी बातें घरों की रीत में। इस लेख में दोनों को अलग-अलग साफ़ लिखा है, ताकि आप जानें कि कौन-सी बात कहाँ से आई।

शुरुआत उसी सवाल से, जो हर शादी के मंडप में किसी न किसी घर में उठता है — पिता न हों, तो कन्यादान कौन करे?

कन्यादान कौन करता है — और कौन-कौन कर सकता है?

कन्यादान आमतौर पर दुल्हन के माता-पिता करते हैं। पुरानी रीत में यह पिता की भूमिका मानी जाती थी — Wikipedia का Hindu wedding वाला लेख भी लिखता है कि कन्यादान दुल्हन के पिता करते हैं (Hindu wedding, साभार: Wikipedia)। आज ज़्यादातर घरों में माता-पिता दोनों साथ बैठते हैं — माँ का हाथ भी उसी कलश के नीचे होता है।

राजस्थान और हरियाणा के परिवारों में प्रचलित परंपरा के अनुभव के अनुसार, जब माता-पिता न हों या किसी कारण से रस्म न कर सकें, तो यह ज़िम्मेदारी घर के बड़े उठाते हैं:

स्थितिकन्यादान कौन करता है
माता-पिता दोनों हैंमाता-पिता साथ मिलकर
केवल माँ हैंकई परिवारों में माँ स्वयं; कुछ घरों में माँ के साथ परिवार का कोई बड़ा पुरुष
माता-पिता नहीं हैंदादा-दादी, चाचा-चाची, ताऊ-ताई या मामा-मामी
बड़े भी नहीं हैंबड़ा भाई और भाभी

कौन करे, इसका कोई एक नियम पूरे देश में नहीं है। जो परिवार दुल्हन को पाल-पोसकर बड़ा करता है, वही उसे विदा करता है — रीत का भाव यही है। अपने कुल-पुरोहित और घर के बड़ों की बात को पहले रखें।

पर "दान" शब्द पर आज सबसे ज़्यादा सवाल उठते हैं — क्या बेटी कोई वस्तु है? ग्रंथ इस पर क्या कहते हैं, पहले वह देख लें।

कन्यादान क्यों किया जाता है? "दान" का अर्थ

कन्यादान का शाब्दिक अर्थ है कन्या का दान — कन्या यानी बेटी, दान यानी देना। विवाह के आठ प्रकारों में सबसे ऊँचा माना गया ब्राह्म विवाह इसी पर टिका है। मनुस्मृति (3.27) कहती है:

आच्छाद्य चार्चयित्वा च श्रुतशीलवते स्वयम् ।
आहूय दानं कन्याया ब्राह्मो धर्मः प्रकीर्तितः ॥

अर्थ: जब पिता स्वयं विद्या और अच्छे चरित्र वाले वर को बुलाकर, बेटी को वस्त्र पहनाकर और उसका सम्मान करके उसे सौंपता है, तो यह ब्राह्म विवाह कहलाता है। — मनुस्मृति 3.27, अनुवाद: गंगानाथ झा (साभार: wisdomlib.org)

इस श्लोक में तीन बातें ध्यान देने लायक़ हैं:

  • वर को घर बुलाकर दिया जाता है — यानी यह सौदा नहीं, सम्मान है।
  • बेटी को वस्त्र पहनाकर और सम्मान करके विदा किया जाता है।
  • वर की योग्यता विद्या और चरित्र से आँकी गई है, धन से नहीं।

जिन ग्रंथों के अनुवाद से मैंने मिलान किया, उनमें कन्यादान के ठीक बाद पाणिग्रहण आता है — जहाँ वर ख़ुद आगे बढ़कर हाथ थामता है और जीवन भर साथ निभाने का वचन देता है। इसलिए बहुत-से परिवार कहते हैं कि कन्यादान बेटी को "देना" नहीं, उसकी ज़िम्मेदारी एक भरोसेमंद हाथ में "सौंपना" है। फेरों और सप्तपदी के वचनों पर हमारा अलग लेख है: शादी में कितने फेरे होते हैं और सातों वचन।

हथलेवा: दूल्हे ने दुल्हन का मेहंदी लगा हाथ अपने हाथ में थामा हुआ, दुल्हन की कलाई में लाल-हरी-सुनहरी चूड़ियाँ और हथफूल, ऊपर दूल्हे का गुलाबी पटका — Roopalia के लिए खींची गई फ़ोटो
फ़ोटो: धनपत सिंह

हथलेवा क्या होता है? हथलेवा का अर्थ

हथलेवा का अर्थ है "हाथ लेना" — विवाह में वर का वधू का हाथ अपने हाथ में लेना। शास्त्रों की भाषा में इसे पाणिग्रहण कहते हैं (पाणि = हाथ, ग्रहण = थामना)। राजस्थान, हरियाणा और मारवाड़ी परिवारों में यही नाम — हथलेवा — सबसे ज़्यादा बोला जाता है, और कई जगह दुल्हन के हाथ की ख़ास मेहंदी को भी "हथलेवे की मेहंदी" कहते हैं।

पारस्कर गृह्यसूत्र (1.6.3) में इस क्षण का मंत्र आता है। उसके अनुवाद का भाव है — "सौभाग्य के लिए मैं तुम्हारा हाथ थामता हूँ, ताकि तुम मुझ पति के साथ बुढ़ापे तक जियो।" सूत्र यह भी बताता है कि वर वधू का दाहिना हाथ अँगूठे सहित थामता है। (पारस्कर गृह्यसूत्र 1.6.3, अनुवाद: Hermann Oldenberg, साभार: wisdomlib.org)

यानी कन्यादान में माता-पिता हाथ सौंपते हैं, और हथलेवा में वर उस हाथ को ज़िम्मेदारी से थामता है। दोनों रस्में एक-दूसरे के बिना अधूरी हैं, इसलिए ज़्यादातर घरों में ये एक साथ, एक ही क्रम में होती हैं।

अब वह सवाल जो रस्म से एक दिन पहले हर घर में पूछा जाता है — हथेली में रखना क्या है?

हथलेवा और कन्यादान की विधि — हथेली में क्या रखा जाता है

राजस्थान और हरियाणा के परिवारों में प्रचलित परंपरा के अनुसार, मंडप में फेरों से पहले पंडित जी के मंत्रों के बीच रस्म इस क्रम में होती है:

  1. हाथ पीले करना: दुल्हन के दाहिने हाथ की हथेली पर मेहंदी या हल्दी का लेप लगाया जाता है। "बेटी के हाथ पीले करना" कहावत यहीं से आई है।
  2. हथेली की सामग्री: उस हथेली पर रखे जाते हैं — चाँदी का सिक्का या नक़द रुपये, सूखी हल्दी की गाँठ, अक्षत (साबुत चावल), फूल और दूब। कई घरों में पान का पत्ता भी।
  3. हाथों का मिलाप: दुल्हन का हाथ दूल्हे के हाथ से मिलाया जाता है। कहीं दूल्हे का हाथ ऊपर रखा जाता है, कहीं दूल्हे की खुली हथेली नीचे और दुल्हन का हाथ ऊपर — जैसा इस लेख की पहली तस्वीर में दिख रहा है।
  4. हाथ बाँधना: जुड़े हुए हाथों को लाल या पीले कपड़े (हथलेवे का रुमाल) और मौली से बाँध दिया जाता है।
  5. कन्यादान का संकल्प: माता-पिता ऊपर से कलश की जलधारा गिराते हुए संकल्प लेते हैं। यही कन्यादान का क्षण है।
हथेली पर क्याउसका भाव (परिवारों में जैसा बताया जाता है)
मेहंदी या हल्दीशुभ शुरुआत, "हाथ पीले होना"
चाँदी का सिक्का / रुपयेघर में बरकत, साझा गृहस्थी
हल्दी की गाँठमंगल और सेहत
अक्षत (साबुत चावल)अन्न की कमी न हो; "अक्षत" यानी जो टूटे नहीं
फूल और दूबताज़गी और बढ़ती गृहस्थी — दूब की तरह फैलना

इस लेख की पहली तस्वीर ध्यान से देखिए — दुल्हन की मेहंदी लगी हथेली दूल्हे की हथेली पर टिकी है, बीच में पीले फूल, नोट और शगुन हैं, और कलाई पर मौली बँधी है। यह असली हथलेवे का क्षण है।

लावा (खील) की रस्म — इसमें भाई क्यों आता है?

हथलेवे के आसपास एक छोटी रस्म और होती है जिसे बहुत-से लोग "लावा छिड़कने की रस्म" कहते हैं। इसमें दुल्हन का भाई आगे आता है। पारस्कर गृह्यसूत्र (1.6.1) के अनुवाद में भी यही मिलता है — दुल्हन का भाई उसकी जुड़ी हुई अंजलि में भुने हुए धान (लावा) डालता है, और वधू उसे अग्नि में अर्पित करती है (साभार: wisdomlib.org)।

यह पढ़कर अच्छा लगता है कि जिस रस्म को आज भी गाँवों में भाई निभाता है, वह बहुत पुराने गृह्यसूत्रों में भी उसी रूप में लिखी मिलती है। विदा होती बहन के हाथ में भाई का दिया अन्न — रिश्ता यहीं ख़त्म नहीं होता, यही इसका संदेश है।

हाथ बँध गए, संकल्प हो गया — अब अग्नि के चारों ओर फेरे।

गठबंधन और फेरे

कन्यादान और हथलेवे के बाद दुल्हन की चुनरी का कोना दूल्हे के पटके से बाँधा जाता है — यही गठबंधन है। फिर दोनों हवन की अग्नि के चारों ओर फेरे लेते हैं। उत्तर भारत में, राजस्थान और हरियाणा समेत, आमतौर पर सात फेरे होते हैं, और फेरे व सप्तपदी दो अलग रस्में हैं। गाँठ में क्या रखा जाता है और सातों वचनों का असली अर्थ क्या है, यह हमने विस्तार से इस लेख में लिखा है।

घर के भीतर बने छोटे मंडप में फेरों का क्षण: लाल-सुनहरी चुनरी में सिर झुकाए दुल्हन और सफ़ेद शेरवानी, पगड़ी व गुलाबी पटके में दूल्हा, दोनों के कपड़े गठबंधन में बँधे, पीछे बैठे परिवार के लोग — Roopalia के लिए खींची गई फ़ोटो
फ़ोटो: धनपत सिंह

मांग भराई की रस्म — मांग किस चीज़ से भरी जाती है?

फेरे पूरे होने के बाद दूल्हा दुल्हन की मांग में सिंदूर भरता है। इसे मांग भराई या सिंदूर दान कहते हैं, और बहुत-से परिवार इसे वह क्षण मानते हैं जब लड़की "सुहागन" बनती है।

राजस्थान और हरियाणा के परिवारों में प्रचलित परंपरा के अनुभव के अनुसार, मांग इन चीज़ों से भरी जाती है:

  • सोने या चाँदी की अँगूठी से — यह सबसे आम तरीका है। अँगूठी में सिंदूर लेकर माथे की ओर से मांग में चलाया जाता है।
  • चाँदी या सोने के सिक्के से — कुछ समाजों और घरों में।
  • कई परिवारों में सिंदूर तीन बार भरा जाता है।
मांग भराई: दूल्हा अँगूठी में सिंदूर लेकर दुल्हन की मांग भरता हुआ, दुल्हन की नज़रें नीचे, माथे पर मांग-टीका, नाक में बड़ी नथ और गले में कुंदन का हार — Roopalia के लिए खींची गई फ़ोटो
फ़ोटो: धनपत सिंह

ऊपर की तस्वीर में वही क्षण है — दूल्हे की उँगलियों में अँगूठी, मांग में लाल सिंदूर की लकीर, और दुल्हन की झुकी हुई नज़र। सिंदूर का अर्थ, उसकी कथा और बाज़ार के मिलावटी सिंदूर से कैसे बचें, यह हमारे लेख सिंदूर क्यों लगाया जाता है में है। ध्यान रहे, शादी से पहले की रस्मों (जैसे गोद भराई) में मांग में सिंदूर नहीं भरा जाता — वह केवल फेरों के बाद होता है।

ये रस्में सदियों से चली आ रही हैं, पर पिछले पचास-साठ सालों में इनका रूप काफ़ी बदला है।

कन्यादान और हथलेवा — पहले और अब में क्या बदला

बातपहलेअब
कन्यादान कौन करतामुख्य रूप से पिताज़्यादातर माता-पिता दोनों साथ; पिता न हों तो माँ भी
मंडप कहाँघर के आँगन या कमरे मेंबैंक्वेट हॉल, मैरिज गार्डन, होटल
रस्मों का समयअलग-अलग दिन, कई दिन तकतिलक, गोद भराई, फेरे अक्सर एक-दो दिन में
माहौलघर की स्त्रियों के विदाई और कन्यादान के गीतगीत कम, डीजे, फ़ोटोग्राफ़र और वीडियो ज़्यादा
रस्म का नाम और भाव"दान"कई परिवार इसे "बेटी सौंपना" या पाणिग्रहण कहना पसंद करते हैं

पुराने समय में कन्यादान के समय घर की स्त्रियाँ जो गीत गाती थीं, उनमें बेटी के जाने का दुख होता था — Wikipedia का Kanyadana वाला लेख भी कन्यादान से जुड़े ऐसे गीतों का ज़िक्र करता है जिनमें माता-पिता बेटी के बिछड़ने का दुख गाते हैं (Kanyadana, साभार: Wikipedia)। आज भी बहुत-से गाँवों में ये गीत बचे हैं, पर शहरों में इनकी जगह रिकॉर्डेड संगीत ने ले ली है।

जो नहीं बदला, वह है रस्म का मूल — हथेली पर हल्दी-मेहंदी, उस पर सिक्का और चावल, ऊपर से जल की धार, और वह पल जब पूरा मंडप चुप हो जाता है।

भारत से बाहर कन्यादान और हथलेवा कैसे करें

अमेरिका, कनाडा या इंग्लैंड में शादी हो, तो ये रस्में थोड़े बदले रूप में आसानी से हो जाती हैं:

  • सामग्री: हल्दी की गाँठ, साबुत चावल और मौली भारतीय किराना दुकानों पर मिल जाते हैं। चाँदी का सिक्का न मिले तो कोई भी सिक्का या नोट शगुन के रूप में रखा जा सकता है।
  • अग्नि: होटल या बैंक्वेट हॉल में हवन कुंड जलाने से पहले जगह वालों से अनुमति ले लें — कई जगह धुएँ के अलार्म के नियम होते हैं। छोटा कुंड और कम सामग्री रखें।
  • मेहमानों को समझाना: ग़ैर-भारतीय मेहमानों के लिए एक छोटा कार्ड छपवाएँ, जिसमें हर रस्म का एक वाक्य में अर्थ हो। इसके लिए हमारी अंग्रेज़ी गाइड काम आएगी: What Happens at an Indian Wedding?
  • दादा-दादी दूर हों: कई परिवार वीडियो कॉल पर भारत में बैठे बड़ों का आशीर्वाद लेकर ही कन्यादान शुरू करते हैं।

कन्यादान, हथलेवा और मांग भराई — तीनों रस्मों में एक बात साझा है: हर बार हाथ से हाथ में कुछ सौंपा जाता है। माता-पिता बेटी का हाथ सौंपते हैं, भाई अन्न सौंपता है, और वर सिंदूर से अपना वचन। रीत घर-घर अलग हो सकती है, पर इस सौंपने का भाव हर जगह एक है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कन्यादान कौन करता है?
कन्यादान दुल्हन के माता-पिता करते हैं। पुरानी रीत में यह मुख्य रूप से पिता की भूमिका थी, पर आज ज़्यादातर परिवारों में माता-पिता दोनों साथ बैठकर बेटी का हाथ वर के हाथ में सौंपते हैं और ऊपर से कलश की जलधारा छोड़कर संकल्प लेते हैं। राजस्थान और हरियाणा के परिवारों में प्रचलित परंपरा के अनुभव के अनुसार, माता-पिता न हों तो दादा-दादी, चाचा-चाची, ताऊ-ताई, मामा-मामी या बड़े भाई-भाभी यह रस्म निभाते हैं। रीत परिवार और क्षेत्र के अनुसार अलग हो सकती है, इसलिए अपने पुरोहित और बड़ों की बात मानें।
कन्यादान कौन-कौन कर सकता है?
कन्यादान वही करता है जो परिवार में दुल्हन का अभिभावक माना जाए। सबसे पहले माता-पिता; पिता न हों तो कई परिवारों में माँ स्वयं; माता-पिता दोनों न हों तो दादा-दादी, चाचा-चाची, ताऊ-ताई या मामा-मामी; और ये भी न हों तो बड़ा भाई और भाभी। पूरे देश में इसका एक तय नियम नहीं है। भाव यह है कि जिसने बेटी को पाला-पोसा, वही उसे विदा करे। इसलिए अपने कुल-पुरोहित और घर के बड़ों की रीत को पहले रखें।
कन्यादान क्यों किया जाता है?
कन्यादान का अर्थ है बेटी का हाथ एक भरोसेमंद वर को सौंपना। मनुस्मृति (3.27) में ब्राह्म विवाह का वर्णन है, जिसमें पिता विद्या और अच्छे चरित्र वाले वर को स्वयं बुलाकर, बेटी को वस्त्र पहनाकर और सम्मान करके उसे सौंपता है (अनुवाद: गंगानाथ झा)। इसके ठीक बाद पाणिग्रहण (हथलेवा) होता है, जिसमें वर हाथ थामकर जीवन भर साथ निभाने का वचन देता है। इसलिए बहुत-से परिवार इसे बेटी को "देना" नहीं, उसकी ज़िम्मेदारी सौंपना मानते हैं।
हथलेवा क्या होता है?
हथलेवा का अर्थ है "हाथ लेना" — विवाह में वर का वधू का हाथ अपने हाथ में थामना। शास्त्रों में इसे पाणिग्रहण कहते हैं। पारस्कर गृह्यसूत्र (1.6.3) के अनुवाद के अनुसार वर यह कहते हुए वधू का दाहिना हाथ थामता है कि "सौभाग्य के लिए मैं तुम्हारा हाथ थामता हूँ, ताकि तुम मेरे साथ बुढ़ापे तक जियो" (अनुवाद: Hermann Oldenberg)। राजस्थान, हरियाणा और मारवाड़ी परिवारों में यह रस्म कन्यादान के साथ, फेरों से पहले होती है, और जुड़े हुए हाथ कपड़े व मौली से बाँधे जाते हैं।
हथलेवा में हथेली में क्या रखा जाता है?
राजस्थान और हरियाणा के परिवारों में प्रचलित परंपरा के अनुभव के अनुसार, पहले दुल्हन की दाहिनी हथेली पर मेहंदी या हल्दी का लेप लगाया जाता है। फिर उस पर चाँदी का सिक्का या नक़द रुपये, सूखी हल्दी की गाँठ, अक्षत (साबुत चावल), फूल और दूब रखी जाती है; कई घरों में पान का पत्ता भी। इसके बाद दूल्हे का हाथ मिलाया जाता है, दोनों हाथ लाल या पीले रुमाल और मौली से बाँधे जाते हैं, और माता-पिता कलश से जल की धार छोड़कर कन्यादान का संकल्प लेते हैं।
शादी में मांग किस चीज़ से भरी जाती है?
राजस्थान और हरियाणा के परिवारों में प्रचलित परंपरा के अनुभव के अनुसार, फेरे पूरे होने के बाद दूल्हा सोने या चाँदी की अँगूठी से दुल्हन की मांग में सिंदूर भरता है — यह सबसे आम तरीका है। कुछ समाजों में चाँदी या सोने के सिक्के से मांग भरी जाती है, और कई परिवारों में सिंदूर तीन बार भरा जाता है। इसे मांग भराई या सिंदूर दान कहते हैं। शादी से पहले की रस्मों में, जैसे गोद भराई में, मांग में सिंदूर नहीं भरा जाता।

अस्वीकरण एवं स्रोत: मनुस्मृति 3.27, अनुवाद: गंगानाथ झा; पारस्कर गृह्यसूत्र 1.6.1 और 1.6.3, अनुवाद: Hermann Oldenberg (दोनों साभार: wisdomlib.org); Wikipedia (Kanyadana, Hindu wedding)। कौन करता है, हथेली की सामग्री, मांग भराई और "पहले और अब" की बातें राजस्थान और हरियाणा के परिवारों में प्रचलित परंपरा के अनुभव के अनुसार। यह लेख केवल शैक्षणिक (educational) उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। रीतियाँ क्षेत्र और परिवार के अनुसार अलग हो सकती हैं, इसलिए घर के बड़ों और अपने पुरोहित की रीत को पहले रखें।
इस लेख में जिन चित्रों के नीचे 'फ़ोटो: धनपत सिंह' लिखा है, वे असली फ़ोटो हैं; बाक़ी चित्र विषय समझाने के लिए AI से बनाए गए उदाहरण हैं।