सुबह का समय है। लोटे में जल भर लिया है। और आप सोच रही हैं — अर्घ्य किस दिशा में दूँ, और यह जल गिरेगा कहाँ?
फिर दूसरा सवाल आता है, जो असल में दिन भर साथ रहता है — खाना कब खाना है? किसी ने कहा था सूरज डूबने से पहले। किसी और ने कहा था एक बार, बस। और किसी ने नमक के लिए मना कर दिया था।
मैंने ये सब सवाल इंटरनेट पर खोजे, और फिर वही सवाल लेकर पुराणों तक गया। जो मिला, वह इंटरनेट पर छपी बात के उलट निकला।
🙏 इस लेख का हर शास्त्रीय हवाला खोलकर मिलाया गया है और उसका लिंक साथ है। जो बात मुझे शास्त्र में नहीं मिली, वह भी साफ़ लिखी है — और उनमें एक ऐसा नियम है जो लगभग हर घर में माना जाता है।
🩺 यह लेख किसी को व्रत रखने के लिए नहीं कह रहा। यह सिर्फ़ बता रहा है कि परंपरा ने क्या कहा है। सेहत का फ़ैसला अपने डॉक्टर से पूछकर कीजिए — नीचे एक पूरा हिस्सा इसी पर है।
रविवार किसका दिन है — और उसका पुराना नाम क्या है
रविवार सूर्य देव का दिन है। यह बात सबको पता है। पर इस दिन का एक पुराना नाम भी है जो अब कम सुनाई देता है — आदित्यवार।
यह नाम मायने रखता है, क्योंकि शास्त्र में रविवार का व्रत इसी नाम से दर्ज है। मत्स्य पुराण के जिस अध्याय में यह व्रत आता है, उसके अंत की पंक्ति ही है — आदित्यवारव्रतकथनम्, यानी "आदित्यवार व्रत का कथन"।
और शिव पुराण में हर वार का अपना फल गिनाया गया है। रविवार के बारे में वह कहता है —
“The first day of the week [viz., Ādityavāra] dedicated to the sun (Āditya) has the special merit of the removal of sin.”
— शिव पुराण 1.14, विद्येश्वर संहिता
यानी रविवार का व्रत माँगने का व्रत नहीं है। वह छोड़ने का व्रत है।
संकल्प — वह क़दम जो सबसे ज़्यादा छोड़ा जाता है
व्रत भूखे रहने से शुरू नहीं होता। वह संकल्प से शुरू होता है। बिना संकल्प के उपवास सिर्फ़ भूख है।
संकल्प में तीन बातें तय करनी होती हैं, और तीनों पहले से:
- कितने रविवार — बारह, इक्कीस, या एक वर्ष। संख्या बाद में नहीं बदलती।
- किस रूप में — फलाहार के साथ, या एक समय का पूरा भोजन।
- किसके लिए — यह आपके और सूर्य देव के बीच की बात है।
हाथ में जल, अक्षत और एक लाल फूल लेकर संकल्प कीजिए, फिर वह जल पूजा स्थान के पास रख दीजिए। व्रत पूरा होने पर उसे किसी पौधे की जड़ में छोड़ दीजिए।
और एक बात, जो परंपरा में बहुत साफ़ है — ऐसी संख्या चुनिए जो निभ सके। इक्कीस का संकल्प लेकर नौवें पर छोड़ देना, सात का संकल्प लेकर पूरा करने से बुरा माना गया है।
सूर्य को अर्घ्य — पूरा तरीका
रविवार की पूजा का केंद्र यही है। बाक़ी सब उसके आसपास है।
समय — सूर्योदय के बाद का पहला घंटा। तब सूरज आँखों को चुभता नहीं और क्षितिज पर दिखता है। बादल हों या सूरज न दिखे, तो भी अर्घ्य दिया जाता है — दिशा से दिया जाता है, दर्शन से नहीं।
दिशा — पूर्व की ओर मुँह करके खड़े होइए।
जल में क्या — मत्स्य पुराण के इसी अध्याय में अर्घ्य के साथ लाल पुष्प और तिल का उल्लेख है। घरों में इसके साथ अक्षत, थोड़ा रोली और लाल चंदन भी डाला जाता है। गुड़हल सबसे प्रचलित फूल है।
बर्तन — ताँबे का लोटा। यह परंपरा में सूर्य की धातु मानी गई है।
कैसे — लोटा दोनों हाथों से सिर के स्तर तक उठाइए और जल की पतली, अटूट धार नीचे गिराइए। धार टूटनी नहीं चाहिए। आँखें धार के आर-पार सूरज पर रहें — इसीलिए कहा जाता है कि सूर्य को जल की धार से देखिए, सीधे नहीं।
कितनी बार — तीन बार जल चढ़ाना सबसे प्रचलित है। कुछ घरों में एक ही बार। दोनों चलते हैं।
जल गिरे कहाँ — मिट्टी में, पौधे की जड़ में, या किसी साफ़ जगह। यह ध्यान रखिए कि गिरा हुआ जल पाँव के नीचे न आए। यही एक नियम है जो हर परंपरा में मिलता है।
अगर छत, आँगन या खुली ज़मीन न हो — तो ताँबे की चौड़ी थाली हाथ में लीजिए, उसी में अर्घ्य दीजिए, और बाद में वह जल गमले या बग़ीचे की मिट्टी में डाल दीजिए।
यह व्यवस्था मुझे किसी ग्रंथ में लिखी नहीं मिली — यह व्यावहारिक हल है, जो फ़्लैट में रहने वालों और भारत से बाहर रहने वालों ने निकाला है। पर यह उसी नियम को निभाता है जो ग्रंथ में है: जल मिट्टी तक पहुँचे।
रविवार व्रत की पूजा विधि — क़दम दर क़दम
- सूर्योदय से पहले उठिए और स्नान कीजिए। परंपरा में इस दिन का स्नान पूजा का हिस्सा माना गया है, अलग चीज़ नहीं।
- लाल या गेरुआ वस्त्र पहनिए। यह अनिवार्य नियम नहीं है, पर रविवार से लाल रंग का नाता शास्त्र में ही है — आगे देखिए।
- संकल्प लीजिए।
- अर्घ्य दीजिए, ऊपर लिखे तरीक़े से।
- दीपक जलाइए — घी का, या तिल के तेल का।
- लाल फूल अर्पित कीजिए, रोली और अक्षत लगाइए।
- भोग रखिए — गुड़, गेहूँ, और कोई एक मीठा पदार्थ।
- मंत्र — सबसे सरल और सबसे प्रामाणिक है ॐ सूर्याय नमः। जितनी बार मन करे। आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करने की परंपरा भी है; वह वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड में है (सर्ग 105, कुछ संस्करणों में 107), जहाँ अगस्त्य मुनि युद्ध से थके हुए राम को वह सिखाते हैं।
- कथा पढ़िए या सुनिए — रविवार व्रत कथा पूरी, आरती की विधि सहित, और साथ में वह दूसरी कथा जो सचमुच पुराण में मिलती है।
- प्रसाद बाँटिए — और थोड़ा घर के बाहर भी भेजिए।
सामग्री की सूची
- ताँबे का लोटा और एक चौड़ी थाली
- लाल फूल — गुड़हल सबसे प्रचलित, कनेर भी
- लाल चंदन — शास्त्र में इसका अपना काम है, आगे देखिए
- रोली, अक्षत (साबुत चावल)
- तिल — अर्घ्य के जल में
- गेहूँ और गुड़ — सूर्य से जुड़े अनाज और मिठास
- घी या तिल के तेल का दीपक
- धूप या कपूर
- दान के लिए कुछ — गेहूँ, गुड़, लाल कपड़ा, या जो बन सके
अब वह हिस्सा, जिसके लिए यह लेख लिखा गया है।
शास्त्र क्या कहता है — मत्स्य पुराण, अध्याय 97
रविवार व्रत का सबसे स्पष्ट शास्त्रीय आधार मत्स्य पुराण के अध्याय 97 में है। पूरा अध्याय इसी व्रत का है — बीस श्लोक, जिनमें नंदिकेश्वर नारद को यह व्रत बताते हैं।
और उसका तीसरा श्लोक वह कहता है जो आज लगभग कोई नहीं कहता:
“…इसलिए रविवार को सदा नक्ताशन करे — यानी केवल रात में भोजन।”
— मत्स्य पुराण 97.3, आदित्यवारव्रतकथनम्
नक्त का अर्थ है रात। नक्ताशन यानी रात में किया जाने वाला भोजन। शास्त्र रविवार के लिए यही कहता है।
अब इसे उस बात के साथ रखकर देखिए जो हर बड़े पेज पर छपी है — "भोजन सिर्फ़ एक समय, और सूर्यास्त से पहले।" यह उल्टा है। और मुझे कोई ऐसा पृष्ठ नहीं मिला जिसने मत्स्य पुराण खोलकर देखा हो।
इसका व्यावहारिक मतलब क्या है?
अगर आप दिन भर फलाहार पर रहकर शाम को, सूरज ढलने के बाद एक बार भोजन करती हैं — तो आप वही कर रही हैं जो मत्स्य पुराण कहता है। यह "ढीला" व्रत नहीं है। यह शास्त्रीय वाला है।
और अगर आपके घर में सूर्यास्त से पहले खाने का चलन है, तो उसे बदलने की ज़रूरत नहीं — वह भी लंबी परंपरा है। बस यह जान लीजिए कि वह ग्रंथ से नहीं, चलन से आया है।
उसी अध्याय में और क्या-क्या है:
- 97.4 — जब रविवार हस्त नक्षत्र के साथ पड़े, तो उससे पहले वाले शनिवार को एकभक्त (दिन में एक बार भोजन) रखा जाता है।
- 97.5 — रविवार की संध्या ब्राह्मण-भोजन के बाद लाल चंदन से बारह पंखुड़ियों का कमल बनाया जाता है।
- 97.8 — उस कमल के आगे सूर्य के घोड़े अंकित किए जाते हैं।
- 97.13 — पारण का भोजन तेल-रहित हो।
- 97.17 — जो एक वर्ष तक यह व्रत निभाता है, उसके पाप नष्ट होते हैं और वह सूर्यलोक को प्राप्त होता है।
तो "तेल-तला नहीं खाना" वाला नियम हवा में नहीं है — वह ठीक इसी अध्याय में है, और पारण के भोजन के लिए है।
तीन बार बारह — एक संख्या जो तीन जगह मिलती है
यह बात मुझे खोजते-खोजते मिली, और लगा कि साझा करने लायक़ है।
- बारह आदित्य — अदिति के बारह पुत्र, जिन्हें द्वादश आदित्य कहा गया है। अग्नि पुराण के 51वें अध्याय में उनके नाम गिनाए गए हैं।
- बारह पंखुड़ी का कमल — मत्स्य पुराण 97.5 में, रविवार की पूजा के लिए।
- बारह नामित रविवार — भविष्य पुराण के ब्राह्म पर्व में बारह रविवारों के अपने-अपने नाम हैं: नन्द, भद्र, सौम्य, कामद, पुत्रद, जय, जयन्त, विजय, आदित्याभिमुख, हृदय, रोगहा और महाश्वेता।
यानी वह बारह पंखुड़ियों वाला कमल सजावट नहीं है। वह बारह आदित्यों के लिए बारह जगहें हैं। और "बारह रविवार करने चाहिए" वाली जो बात घरों में चलती है, उसकी जड़ शायद इसी गिनती में है।
शास्त्र बनाम मान्यता — साफ़-साफ़
यह तालिका इस लेख का सबसे ईमानदार हिस्सा है। बाईं ओर वह नियम है जो आपने सुना होगा; दाईं ओर यह कि मुझे वह कहाँ मिला और कहाँ नहीं।
| प्रचलित नियम | शास्त्र में? | बात |
|---|---|---|
| रात में भोजन (नक्त) | हाँ | मत्स्य पुराण 97.3 — सीधा और स्पष्ट। |
| सूर्यास्त से पहले एक बार भोजन | नहीं मिला | यह सबसे प्रचलित निर्देश है, पर मत्स्य 97 इसके उलट कहता है। यह चलन से आया है, ग्रंथ से नहीं। |
| तेल-तला नहीं | हाँ | मत्स्य 97.13 — पारण का भोजन तेल-रहित हो। |
| नमक नहीं | नहीं मिला | पूरे अध्याय 97 में लवण शब्द आता ही नहीं। नीचे इस पर अलग हिस्सा है। |
| लाल रंग, लाल फूल, लाल चंदन | हाँ | मत्स्य 97.5 में लाल चंदन, और अर्घ्य में लाल पुष्प। |
| एक वर्ष तक निभाना | हाँ | मत्स्य 97.17। |
| बारह रविवार | अप्रत्यक्ष रूप से | भविष्य पुराण में बारह नामित रविवार हैं। "बारह करो" वाला सीधा आदेश मुझे नहीं मिला। |
| तीस रविवार | नहीं मिला | यह संख्या कहीं नहीं मिली। |
| बाल न धोएँ, नाख़ून न काटें | नहीं मिला | किसी पुराण में नहीं मिला। यह ज्योतिष और लोक-परंपरा की बात है। |
एक सावधानी: "नहीं मिला" का अर्थ "नहीं है" नहीं होता। मैंने जहाँ-जहाँ खोजा वहाँ नहीं मिला, और मेरी खोज की अपनी सीमा है। पर जो मिला, उसका पता साथ लिखा है — यही इस तालिका का पूरा मक़सद है।
रविवार व्रत में क्या खाना चाहिए — और शाम को क्या
दिन में: फल, दूध, दही, मेवे, नारियल पानी। गेहूँ और गुड़ इस दिन शुभ माने गए हैं।
शाम को, सूरज ढलने के बाद — एक बार: सादा भोजन। चावल या गेहूँ, एक दाल, एक सब्ज़ी। तेल-तला नहीं (मत्स्य 97.13)। प्याज़-लहसुन नहीं।
छोड़ी जाने वाली चीज़ें: मांस-मछली-अंडा, शराब, प्याज़-लहसुन, और तला-भुना। कुछ परंपराओं में इस दिन खटाई भी छोड़ी जाती है।
"रविवार व्रत में शाम को क्या खाना चाहिए" — यह सवाल गूगल पर अपने आप आता है।
इसका जवाब यही है: वही एक भोजन जो व्रत का असली भोजन है। शाम का खाना व्रत तोड़ना नहीं है — वही व्रत है।
व्रत के दिन क्या चलता है और क्या नहीं, इसकी पूरी सूची — एकादशी से शिवरात्रि तक, हर व्रत की अलग — व्रत में क्या खाना चाहिए और क्या नहीं में दी है।
नमक वाला सवाल — जो असल में दो सवाल हैं
गूगल पर "रविवार को नमक" लिखते ही जो सुझाव आते हैं, उनमें दो बिलकुल अलग सवाल घुले-मिले हैं। हर पेज इन्हें एक मानकर चलता है। ये एक नहीं हैं।
पहला सवाल — रविवार को नमक खाना चाहिए या नहीं?
यह मान्यता बहुत फैली हुई है। पर मत्स्य पुराण के उस पूरे अध्याय में, जो इसी व्रत का है, लवण शब्द एक बार भी नहीं आता। न मनाही, न अनुमति। वहाँ जिस चीज़ की मनाही है, वह तेल है।
तो यह नियम कहाँ से आया? सबसे भरोसेमंद जवाब यह है कि नमक छोड़ना भारत की लगभग हर व्रत-परंपरा का साझा हिस्सा है — साधारण नमक छोड़ना संयम का चिह्न माना गया है, और यह रविवार तक भी पहुँच गया। इसे मानना ग़लत नहीं है। बस इसे "शास्त्र का आदेश" कहना ग़लत होगा।
दूसरा सवाल — रविवार को नमक ख़रीदना चाहिए या नहीं?
यह पहले वाले से बिलकुल अलग मान्यता है, और इसका व्रत से कोई नाता नहीं। यह घर-ख़र्च और शुभ-अशुभ दिन वाली लोक-मान्यता है। इसका कोई शास्त्रीय आधार मुझे नहीं मिला — और यह भी ध्यान रहे कि यह मान्यता क्षेत्र के हिसाब से बदलती है; कहीं शनिवार के लिए यही बात कही जाती है।
कितने रविवार, और कब से शुरू करें
कब से — किसी भी शुक्ल पक्ष के रविवार से। माघ, अगहन (मार्गशीर्ष) और भाद्रपद के रविवारों को कई क्षेत्रों में विशेष माना जाता है, और लोग इन्हीं महीनों से शुरू करते हैं।
यहाँ एक बात साफ़ कर दूँ। मैंने भादो रविवार, अगहन रविवार और माघ रविवार — तीनों को खोजा। ये तीनों जीवित परंपराएँ हैं और लोग इन्हें नाम लेकर खोजते हैं। बिहार के देव सूर्य मंदिर (औरंगाबाद) में भादों के रविवारों पर भारी भीड़ जुटती है; वह मंदिर छठी से आठवीं सदी के बीच का माना जाता है और बाक़ी सूर्य मंदिरों के विपरीत पश्चिमाभिमुख है। पर इन तीनों महीनों के रविवारों का कोई अलग शास्त्रीय विधान मुझे नहीं मिला — वह क्षेत्रीय परंपरा है, और उसे उसी रूप में मानिए।
कितने — तीन उत्तर चलन में हैं, और तीनों की जड़ अलग है:
- बारह — भविष्य पुराण के बारह नामित रविवारों से जुड़ता है।
- एक वर्ष — मत्स्य पुराण 97.17 का अपना विधान।
- तीस — यह संख्या मुझे कहीं नहीं मिली। चलन में है, आधार नहीं मिला।
जो निभ सके, वही चुनिए। संकल्प तोड़ना, कम संख्या का संकल्प लेने से भारी माना गया है।
रविवार व्रत का उद्यापन
उद्यापन वह क्रिया है जिससे संकल्प पूरा घोषित होता है। संख्या पूरी होने पर आने वाले रविवार को कीजिए।
- सुबह सामान्य विधि से पूजा और अर्घ्य।
- सूर्य देव के निमित्त हवन — जहाँ संभव हो। न हो सके तो दीपक और धूप से भी काम चल जाता है।
- ब्राह्मण-भोजन या किसी ज़रूरतमंद को भोजन। यह मत्स्य पुराण के अध्याय में भी है — वहाँ ब्राह्मण-भोजन के बाद ही कमल बनाने की बात है।
- दान — गेहूँ, गुड़, लाल वस्त्र, ताँबे का पात्र। जो सामर्थ्य हो।
- अंत में क्षमा-प्रार्थना, और संकल्प का जल पौधे की जड़ में।
उद्यापन में खर्च का कोई नियम नहीं है। परंपरा सामर्थ्य देखती है, रक़म नहीं। किसी एक ज़रूरतमंद को भरपेट भोजन करा देना पूरा उद्यापन है।
कौन-सा दिन किस देवता का — सातों वार
यह सवाल बहुत खोजा जाता है, इसलिए पूरी तालिका यहीं रख देता हूँ। हर दिन का अपना लेख भी जुड़ा है।
| दिन | देवता | ग्रह | लेख |
|---|---|---|---|
| रविवार | सूर्य देव | सूर्य | यही लेख |
| सोमवार | शिव | चंद्र | सोमवार व्रत — विधि व नियम |
| मंगलवार | हनुमान जी | मंगल | मंगलवार व्रत — विधि व उपाय |
| बुधवार | गणेश जी | बुध | — |
| गुरुवार | विष्णु / बृहस्पति | गुरु | गुरुवार व्रत — विधि व कथा |
| शुक्रवार | संतोषी माता / लक्ष्मी | शुक्र | शुक्रवार व्रत — विधि व नियम |
| शनिवार | शनि देव | शनि | शनिवार व्रत — विधि व उद्यापन |
भारत से बाहर रविवार का व्रत
भारत से बाहर रहने वालों के लिए इस व्रत में एक सुविधा है और एक अड़चन।
सुविधा — अमेरिका, कनाडा, इंग्लैंड, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में रविवार छुट्टी का दिन है। सातों वारों में यही एक व्रत है जो वहाँ की ज़िंदगी में बिना खींचतान के बैठ जाता है। सोमवार और मंगलवार का व्रत वहाँ काम के दिन पड़ता है; रविवार नहीं।
अड़चन — सूर्योदय। लंदन में दिसंबर के आख़िर में सूरज सुबह आठ बजे के आसपास निकलता है। यानी अर्घ्य नाश्ते के समय पड़ेगा, भोर में नहीं। और यह कोई चूक नहीं है — अर्घ्य अपने शहर के सूर्योदय पर दिया जाता है, भारत के सूर्योदय पर नहीं।
इस पर पूरी बात — अपने शहर का समय कैसे देखें, फ़्लैट में अर्घ्य कैसे दें, और ठंड में क्या ध्यान रखें — अंग्रेज़ी वाले लेख में विस्तार से है।
और यह भी काम का है: आपके शहर में त्योहार की तारीख़ भारत से अलग क्यों होती है — वही गणित यहाँ भी लगता है।
सेहत — यह हिस्सा छोड़िए मत
रविवार का व्रत धूप से जुड़ा है, इसलिए दो बातें साफ़ कर देनी चाहिए।
विटामिन डी का दावा। यह कहा जाता है कि सूर्य को अर्घ्य देने से विटामिन डी मिलता है। ब्रिटेन की NHS साफ़ कहती है — "अक्टूबर से मार्च की शुरुआत तक हम धूप से पर्याप्त विटामिन डी नहीं बना पाते", और यह भी कि साँवली त्वचा वालों को धूप से कम विटामिन डी मिलता है। यानी सर्दियों की सुबह का अर्घ्य आस्था की चीज़ है, विटामिन डी का स्रोत नहीं। दोनों को मिलाना ग़लत होगा।
किन्हें सावधानी चाहिए। मेदांता की रोगी-शिक्षा सामग्री कहती है कि मधुमेह, उच्च रक्तचाप या हृदय रोग वाले लोगों को व्रत रखने से पहले अपने डॉक्टर की अनुमति लेनी चाहिए, और कठोर व्रत गर्भवती तथा स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए सुरक्षित नहीं है। स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. स्मिति जैन गर्भावस्था के बारे में कहती हैं — "गर्भवती महिलाओं को लंबे समय तक बिना अन्न-जल के पूर्ण व्रत नहीं रखना चाहिए… निर्जलीकरण से जटिलताएँ हो सकती हैं।"
नमक छोड़ना अधिकांश लोगों के लिए एक दिन की मामूली बात है। पर अगर आप रक्तचाप की दवा लेती हैं, या पेशाब बढ़ाने वाली दवा (diuretic) पर हैं, तो यह बात अपने डॉक्टर से पूछ लीजिए।
यह लेख किसी से व्रत रखने को नहीं कह रहा। परंपरा ने ख़ुद कभी यह नहीं कहा कि शरीर तोड़कर व्रत करो। बीमारी, गर्भावस्था, बुढ़ापा और यात्रा — इन सब में छूट हर व्रत-परंपरा में है।
रविवार व्रत की विधि क्या है?
रविवार व्रत में क्या खाना चाहिए और शाम को क्या?
रविवार व्रत में नमक खाना चाहिए या नहीं?
सूर्य को अर्घ्य देने का सही तरीका और समय क्या है?
रविवार का व्रत कितने रविवार तक रखना चाहिए?
रविवार व्रत कब से शुरू करना चाहिए?
रविवार व्रत का उद्यापन कैसे करें?
रविवार किस भगवान का दिन है?
भारत से बाहर रहकर रविवार का व्रत कैसे रखें?
स्रोत और सावधानी: इस लेख का मुख्य आधार मत्स्य पुराण का अध्याय 97 (आदित्यवारव्रतकथनम्) है, जिसे खोलकर मिलाया गया — 97.3 (रविवार को नक्त यानी रात का भोजन), 97.4 (हस्त नक्षत्र पर शनिवार को एकभक्त), 97.5 (लाल चंदन का बारह-दल कमल, ब्राह्मण-भोजन के बाद), 97.8 (कमल के आगे सूर्य के घोड़े), 97.13 (पारण का भोजन तेल-रहित) और 97.17 (एक वर्ष का फल)। साथ में शिव पुराण 1.14 (रविवार का फल — पाप का नाश), भविष्य पुराण ब्राह्म पर्व के बारह नामित रविवार, अग्नि पुराण 51 (द्वादश आदित्य) और वाल्मीकि रामायण युद्धकांड सर्ग 105 (आदित्य हृदय; कुछ संस्करणों में 107)। तीन बातें साफ़ कह देना ज़रूरी है। पहली — अध्याय 97 में लवण यानी नमक शब्द एक बार भी नहीं आता, इसलिए "रविवार को नमक नहीं" वाले नियम का शास्त्रीय आधार हमें नहीं मिला; यह व्रत-परंपरा का साझा चलन है। दूसरी — भादो, अगहन और माघ के रविवारों की परंपराएँ जीवित हैं, पर उनका कोई अलग शास्त्रीय विधान हमें नहीं मिला। तीसरी — "नहीं मिला" का अर्थ "नहीं है" नहीं; यह हमारी खोज का ईमानदार नतीजा है, अंतिम निर्णय नहीं। यह लेख किसी को व्रत रखने के लिए नहीं कहता; सेहत संबंधी फ़ैसला अपने डॉक्टर से पूछकर कीजिए।