करवा चौथ की सुबह है। सरगी हो चुकी है, मेहंदी अभी गीली है, शाम की थाली सजकर रखी है — और तभी पता चलता है कि पीरियड्स शुरू हो गए। मन में सबसे पहला सवाल यही आता है: अब पूजा का क्या होगा? व्रत रखूँ या तोड़ दूँ? कथा में बैठ सकती हूँ या नहीं?

यह सवाल हर पीढ़ी की स्त्री ने पूछा है, और हर घर में इसका जवाब अलग मिलता है। कहीं दादी कहती हैं "चार दिन रसोई और मंदिर दोनों से दूर", कहीं माँ कहती हैं "मन से जाप कर लो, भगवान सब जानते हैं"। Google पर भी यही सवाल सबसे ज़्यादा पूछा जाता है — पीरियड्स में पूजा कर सकते हैं या नहीं, मंदिर जा सकते हैं या नहीं, और व्रत का क्या करें।

इंटरनेट पर इस सवाल के जवाब ज़्यादातर "शास्त्रों में लिखा है" से शुरू होते हैं — पर किस शास्त्र में, किस अध्याय में, यह जिन पन्नों पर मैंने देखा उनमें नहीं मिला। इसलिए मैंने उन ग्रंथों के प्रामाणिक अनुवादों से ख़ुद मिलान किया जिनसे यह मान्यता आई है। नतीजा कई लोगों को चौंका सकता है।

पीरियड्स में पूजा कर सकते हैं या नहीं — सीधा जवाब

जिन मुख्य ग्रंथों के अनुवाद से मैंने मिलान किया, उनमें पीरियड्स (रजस्वला अवस्था) में पूजा करने, मंदिर जाने या व्रत रखने पर कोई सीधी, शब्दशः रोक नहीं मिली। ग्रंथों में जो नियम मिलते हैं, वे अलग रहने, भोजन, पति-पत्नी के संबंध और घर के काम से जुड़े हैं। मूर्ति छूने को दोष मानकर प्रायश्चित्त का उल्लेख अग्नि पुराण में मिलता है। "व्रत न तोड़ें, पूजा परिवार का कोई और करे" — यह परंपरा का प्रचलित समाधान है।

एक नज़र में:

  • मान्यता का मूल: तैत्तिरीय संहिता 2.5.1 की इंद्र वाली कथा।
  • नियम किस बारे में हैं: तीन दिन अलग रहना, अन्न, संबंध, शृंगार और घर का काम — वसिष्ठ धर्मसूत्र 5, मनुस्मृति 4 और 5।
  • शुद्धि: स्राव रुकने पर स्नान से (मनुस्मृति 5.66)।
  • मूर्ति: रजस्वला के छूने पर प्रायश्चित्त — अग्नि पुराण 174।
  • मंदिर-प्रवेश और व्रत पर शब्दशः निषेध: मुख्य ग्रंथों में नहीं मिला।
  • आज का व्यवहार: हर परिवार की अपनी रीत है; निर्णय स्त्री और उसके परिवार का।

यह मान्यता कहाँ से आई? — इंद्र की कथा

रजस्वला से जुड़े लगभग सभी नियमों की जड़ एक वैदिक कथा है। कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता (2.5.1) में कथा है कि इंद्र ने विश्वरूप का वध किया और उस पाप (ब्रह्महत्या) का बोझ उठाने के लिए धरती, पेड़ों और स्त्रियों से एक-एक तिहाई भाग लेने को कहा। स्त्रियों ने एक-तिहाई भाग लिया, बदले में वरदान भी माँगा:

“They took a third of his guilt, it became (a woman) with stained garments; … Therefore one should not converse with (a woman) with stained garments”

— तैत्तिरीय संहिता 2.5.1, अनुवाद: A. B. Keith (कृष्ण यजुर्वेद, कांड 2, प्रपाठक 5 — ऑनलाइन पन्ना पाठकों के लिए नहीं खुलता, इसलिए लिंक नहीं दिया)

यानी सबसे पुराने पाठ में नियम बोलचाल, साथ बैठने और अन्न से जुड़े हैं — पूजा, मूर्ति या मंदिर का इसमें कोई ज़िक्र नहीं। यही कथा श्रीमद्भागवत में भी आती है: “As a result of those reactions, women manifest the signs of menstruation every month.” (भागवत 6.9.9, अनुवाद: A. C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada, साभार: Vedabase)।

नक़्क़ाशीदार लकड़ी के व्यासपीठ पर खुली ताड़पत्र की पोथी, पीछे लाल कपड़े में बँधे पुराने ग्रंथ, पीतल का दीपक और गेंदे के फूल — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
जो "शास्त्रों में लिखा है" कहा जाता है, उसे ग्रंथों के प्रामाणिक अनुवादों से मिलाना — इस लेख का आधार यही है।

धर्मसूत्र और स्मृतियाँ असल में क्या कहती हैं

वसिष्ठ धर्मसूत्र (अध्याय 5) में सबसे विस्तार से नियम हैं। वहाँ लिखा है कि रजस्वला तीन दिन-रात अशुद्ध मानी जाती है — “A woman in her courses is impure during three (days and) nights.” — और इन दिनों वह आँखों में अंजन न लगाए, तेल न लगाए, ज़मीन पर सोए, दिन में न सोए, आग न छुए, घर के कामों में न लगे। (वसिष्ठ धर्मसूत्र 5.5–6, अनुवाद: Georg Bühler, साभार: sacred-texts.com)

पर इसी अध्याय की एक पंक्ति पर कम ध्यान जाता है — ठीक इन नियमों से पहले लिखा है:

“For month by month the menstrual excretion takes away her sins.”

— वसिष्ठ धर्मसूत्र 5.4, अनुवाद: Georg Bühler (साभार: sacred-texts.com)

यानी वही ग्रंथ, जो तीन दिन के नियम देता है, मासिक धर्म को स्त्री के पाप धोने वाला भी कहता है। इन नियमों में पूजा, मूर्ति, मंदिर या व्रत का नाम नहीं मिला — घर के रोज़ के कामों से तीन दिन का विश्राम, यही इनका रूप है।

मनुस्मृति के नियम ज़्यादातर पुरुष-गृहस्थ के लिए हैं — इन दिनों पत्नी के पास न जाए (4.40), रजस्वला से बात न करे (4.57), उसका छुआ भोजन न खाए (4.208)। शुद्धि के बारे में लिखा है: “a menstruating female becomes pure by bathing after the menstrual secretion has ceased (to flow).” (मनुस्मृति 5.66, अनुवाद: G. Bühler, साभार: sacred-texts.com; अध्याय 4 के नियम यहाँ)। ध्यान रहे, मनुस्मृति के अलग-अलग संस्करणों में श्लोक-संख्या बदल जाती है; यहाँ Bühler वाले संस्करण की संख्या दी है।

पाराशर स्मृति (अध्याय 7) में चौथे दिन स्नान से शुद्धि की बात है, और यह कि देव-पितृ कर्म स्राव पूरी तरह रुकने के बाद करे। देव-कर्म से जुड़ा सबसे सीधा धर्मशास्त्रीय वाक्य यही मिला। (इसका जो अनुवाद मिला, उस पर अनुवादक का नाम नहीं है, इसलिए यहाँ केवल ग्रंथ का नाम दे रहा हूँ।)

तो फिर "पीरियड्स में भगवान को नहीं छूते" वाली बात किस ग्रंथ में है? वह मिली — पर एक पुराण में, और एक अलग रूप में।

मूर्ति छूना और मंदिर जाना — अग्नि पुराण क्या कहता है

जितने ग्रंथ मैंने देखे, उनमें रजस्वला और देव-प्रतिमा को साथ जोड़ने वाला सबसे साफ़ पाठ अग्नि पुराण, अध्याय 174 में मिला। यह अध्याय पूजा में हुई चूक के प्रायश्चित्त का है। उसमें लिखा है कि अगर देव-प्रतिमा को “a woman in her courses” (रजस्वला स्त्री) ने छू लिया हो, तो पूजा करने वाला सौ बार जप करे, दो बार स्नान करे और पंचोपनिषद् मंत्रों से फिर पूजा करे। (अग्नि पुराण 174.1–3, अनुवाद: N. Gangadharan, साभार: wisdomlib.org)

यानी यहाँ मूर्ति-स्पर्श को दोष माना गया है और उसका प्रायश्चित्त बताया गया है — पर यह "पूजा मत करो" या "मंदिर मत जाओ" जैसा सीधा निषेध नहीं है। मंदिर-प्रवेश पर शब्दशः रोक मुझे इन मुख्य ग्रंथों में नहीं मिली। कई मंदिरों के अपने नियम हैं — वे उस मंदिर की परंपरा हैं, और वहाँ जाने पर उनका सम्मान करना चाहिए।

व्रत के बीच पीरियड्स आ जाएँ तो क्या करें

करवा चौथ, नवरात्रि, एकादशी या सोलह सोमवार — व्रत के बीच पीरियड्स आ जाना बहुत आम है। इस पर किसी मूल ग्रंथ का पन्ना मुझे खोजने पर नहीं मिला, पर परंपरा में एक श्लोक उद्धृत किया जाता है जिसका भाव है कि लंबा व्रत शुरू कर चुकी स्त्री के रजस्वला होने से उसका व्रत बाधित नहीं होता। इसी के आधार पर ज़्यादातर परिवारों में यह चलन है:

  1. व्रत न तोड़ें — उपवास और संकल्प चलता रहता है।
  2. पूजा कोई और करे — पति, सास, बेटी या परिवार का कोई सदस्य आपकी ओर से पूजा और आरती करे।
  3. आप मन से जुड़ी रहें — हाथ जोड़कर पास बैठें, मन में मंत्र या नाम-जप करें।
  4. कथा सुनें — कथा सुनने से रोकने की बात किसी ग्रंथ में मुझे नहीं मिली।
  5. उद्यापन या नया व्रत — कई परिवार इसे पीरियड्स के बाद के दिन पर रखते हैं।
घर के मंदिर में सफ़ेद कुर्ते में पति आरती करते हुए, पास में लाल-पीली साड़ी में व्रत वाली पत्नी पानी का गिलास और फलों की प्लेट के साथ बैठकर हाथ जोड़े देखती हुई — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
व्रत आपका, आरती पति के हाथ से — बहुत से परिवारों का यही रास्ता है।

करवा चौथ की पूरी कथा और चंद्रोदय की विधि हमारे लेख करवा चौथ व्रत कथा में है, और व्रत में क्या खाएँ, यह व्रत में क्या खाना चाहिए में।

सफ़ेद चादर पर घेरे में बैठी लाल साड़ियों में स्त्रियाँ, बीच में करवे, थालियाँ और दीपक, एक बड़ी स्त्री कथा पढ़ती हुई और किनारे बैठी एक युवा स्त्री हाथ जोड़े सुनती हुई — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
थाली न सही, कथा में साथ — घेरे से बाहर कोई नहीं।

पूजा नहीं तो क्या कर सकती हैं?

जो परिवार इन दिनों मूर्ति-पूजा से दूर रहने की रीत मानते हैं, वे भी भक्ति से दूर रहने को नहीं कहते। आमतौर पर ये चीज़ें की जाती हैं:

बिस्तर पर तकियों के सहारे रज़ाई ओढ़े बैठी युवा स्त्री हाथ में माला लेकर आँखें मूँदे जप करती हुई, पास की मेज़ पर चाय का कप और जलता दीपक — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
आराम भी, जप भी — भक्ति के लिए मंदिर तक जाना ज़रूरी नहीं।

दूसरा पक्ष: जहाँ रजस्वला होना उत्सव है

हिंदू परंपरा इस विषय पर एक जैसी नहीं है। Wikipedia के शब्दों में, “Hinduism's views on menstruation are diverse.” (Menstrual taboo, साभार: Wikipedia) दो उदाहरण:

बरसात के मौसम में गाँव के पेड़ से बँधे गेंदे की मालाओं से सजे झूलों पर नई साड़ियों में हँसती हुई युवतियाँ, पीछे धान के हरे खेत — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
रजो पर्व जैसे उत्सव में स्त्री और धरती, दोनों के रजस्वला होने का सम्मान।

अदालत में भी यह सवाल पहुँचा है। केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की स्त्रियों के प्रवेश पर रोक के मामले में “On 28 September 2018, the Supreme Court of India ruled that women of all ages could enter the temple of Sabarimala.” — यह फ़ैसला 4:1 के बहुमत से था। उस रोक का कारण मंदिर के देवता का ब्रह्मचारी रूप बताया जाता है। पुनर्विचार याचिकाओं के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ के पास है। (Entry of women to Sabarimala, साभार: Wikipedia; स्थिति 9 अक्टूबर 2026 तक के पन्ने के अनुसार)

सेहत की बात: व्रत रख रही हैं तो

पीरियड्स शरीर की एक सामान्य प्रक्रिया है। NHS के अनुसार “Your period can last between 2 and 7 days, but it will usually last for about 5 days.” (NHS — Periods)। WHO का कहना है कि मासिक धर्म को “positive and healthy not something to be ashamed of” समझा जाना चाहिए (WHO), और UNICEF India साफ़ लिखता है — “period blood is not bad or impure.” (UNICEF India)

व्रत के दिनों में एक बात का ख़ास ध्यान रखें: “Heavy periods and pregnancy are very common causes of iron deficiency anaemia.” (NHS — Iron deficiency anaemia)। अगर पीरियड्स भारी हैं, चक्कर या बहुत थकान लग रही है, तो निर्जला व्रत न रखें — पानी पीती रहें और डॉक्टर से पूछें। NHS के अनुसार जब भारी पीरियड्स जीवन पर असर डालने लगें, तो डॉक्टर से मिलना चाहिए।

स्टील की थाली में पालक, भुने काले चने, गुड़, खजूर, अनार के दाने और तिल के लड्डू, पास में नींबू वाला पानी का गिलास — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
व्रत खोलने के बाद आयरन वाला भोजन — पालक, चना, गुड़, खजूर, अनार।

भारत से बाहर: जब घर में पूजा करने वाला कोई और न हो

भारत से बाहर कई स्त्रियाँ अकेली रहती हैं, या घर में पूजा सिर्फ़ वही करती हैं। तब "पूजा कोई और करे" वाला रास्ता नहीं बचता। कुछ व्यावहारिक तरीक़े:

  1. मानस-पूजा — मन में भगवान को फूल, दीप और भोग अर्पित करने की कल्पना; मूर्ति छूने की ज़रूरत नहीं।
  2. वीडियो कॉल पर परिवार — माँ या सास भारत से आरती करें, आप स्क्रीन के सामने हाथ जोड़कर साथ रहें।
  3. मंदिर के नियम पूछ लें — भारत से बाहर हर मंदिर की अपनी व्यवस्था होती है; जाने से पहले वहाँ के पुजारी या समिति से पूछना सबसे सही है।
  4. दफ़्तर और व्रत — काम के दिन निर्जला व्रत और पीरियड्स साथ हों तो पानी और फल वाला व्रत बेहतर है।
भारत से बाहर सर्दी की शाम एक फ़्लैट में ग़लीचे पर बैठी युवती माला से जप करती हुई, पास की मेज़ पर टैबलेट पर माँ वीडियो कॉल में हाथ हिलाती हुई, खिड़की के बाहर बर्फ़ वाली इमारतें — AI-निर्मित चित्र (Roopalia)
घर से दूर — माला हाथ में, माँ स्क्रीन पर।

बिना मंदिर के घर पर पूजा का तरीक़ा हमारे लेख बिना मंदिर के घर पर पूजा कैसे करें में है।

मैंने क्या खोजा — क्या मिला, क्या नहीं

सवालनतीजा
मान्यता का मूलमिला — तैत्तिरीय संहिता 2.5.1; भागवत 6.9.9।
तीन दिन के नियममिले — वसिष्ठ धर्मसूत्र 5.5–6: अलग रहना, आग, घर का काम आदि।
शुद्धि कबमिला — स्राव रुकने पर स्नान (मनुस्मृति 5.66); चौथे दिन (पाराशर स्मृति 7)।
मूर्ति छूनामिला — छूने पर प्रायश्चित्त, अग्नि पुराण 174.1–3।
पूजा या मंदिर-प्रवेश पर शब्दशः निषेधइन मुख्य ग्रंथों में नहीं मिला।
व्रत तोड़ने का नियममूल ग्रंथ का पन्ना नहीं मिला; परंपरा: व्रत चलता रहे।
मासिक धर्म को सकारात्मक कहने वाला पाठमिला — वसिष्ठ 5.4; अम्बुबाची, रजो पर्व।

"नहीं मिला" का अर्थ "नहीं है" नहीं। यह इन ग्रंथों में मेरी खोज का नतीजा है, अंतिम फ़ैसला नहीं — धर्मशास्त्र बहुत बड़ा है, और हर समुदाय की परंपरा अलग है।

निचोड़। रजस्वला के नियम वैदिक कथा से आए हैं, और धर्मसूत्रों में वे तीन दिन के अलगाव और विश्राम के रूप में हैं। मूर्ति छूने पर प्रायश्चित्त अग्नि पुराण में है, पर पूजा, मंदिर या व्रत पर सीधी शब्दशः रोक इन मुख्य ग्रंथों में नहीं मिली।

इसलिए सबसे संतुलित रास्ता वही है जो ज़्यादातर घर अपनाते हैं: व्रत चलने दें, मूर्ति-पूजा परिवार का कोई और करे, और आप मन से जुड़ी रहें। और अगर आपका परिवार अलग मानता है, तो वह भी एक परंपरा है — बस डर से नहीं, समझ से मानिए।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

पीरियड्स में पूजा कर सकते हैं या नहीं?
जिन मुख्य ग्रंथों के अनुवाद से मैंने मिलान किया — तैत्तिरीय संहिता 2.5.1, वसिष्ठ धर्मसूत्र अध्याय 5 और मनुस्मृति अध्याय 4–5 — उनमें पीरियड्स में पूजा करने पर कोई सीधी, शब्दशः रोक नहीं मिली। इन ग्रंथों के नियम तीन दिन अलग रहने, भोजन, पति-पत्नी के संबंध और घर के काम से जुड़े हैं। अग्नि पुराण 174 में रजस्वला के देव-प्रतिमा छूने पर प्रायश्चित्त बताया गया है, इसलिए बहुत से परिवार इन दिनों मूर्ति को नहीं छूते और पूजा परिवार का कोई और सदस्य करता है। मन में जप, प्रार्थना, कथा और भजन सुनने पर किसी नियम में रोक मुझे नहीं मिली। अंतिम निर्णय स्त्री और उसके परिवार की रीत का है।
पीरियड्स में मंदिर जा सकते हैं या नहीं?
मंदिर-प्रवेश पर शब्दशः निषेध मुझे तैत्तिरीय संहिता, वसिष्ठ धर्मसूत्र, मनुस्मृति और अग्नि पुराण में नहीं मिला। अग्नि पुराण 174 केवल देव-प्रतिमा छू लेने पर प्रायश्चित्त की बात करता है। पर हर मंदिर की अपनी परंपरा और नियम होते हैं — कई मंदिरों में इन दिनों प्रवेश नहीं किया जाता, जबकि कामाख्या जैसे स्थानों पर देवी के रजस्वला होने का उत्सव (अम्बुबाची मेला) मनाया जाता है। सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर 2018 को 4:1 से सभी उम्र की स्त्रियों के प्रवेश के पक्ष में फ़ैसला दिया था, और मामला अब बड़ी पीठ के पास है। किसी मंदिर में जाने से पहले वहाँ के नियम पूछकर उनका सम्मान करना सबसे सही है।
पीरियड्स में व्रत रख सकते हैं या नहीं?
हाँ, परंपरा में व्रत चलता रहता है। व्रत तोड़ने का कोई नियम मुझे किसी मूल ग्रंथ में नहीं मिला; परंपरा में उद्धृत एक श्लोक का भाव यही है कि व्रत शुरू कर चुकी स्त्री के रजस्वला होने से व्रत बाधित नहीं होता। ज़्यादातर परिवारों में उपवास और संकल्प जारी रहता है, मूर्ति-पूजा परिवार का कोई और करता है, और स्त्री मन से जप करती है। सेहत का ध्यान ज़रूरी है: NHS के अनुसार भारी पीरियड्स आयरन की कमी (एनीमिया) का आम कारण हैं। चक्कर, बहुत थकान या भारी स्राव हो तो निर्जला व्रत न रखें, पानी और फल लें, और डॉक्टर से पूछें। यह लेख किसी को व्रत रखने के लिए नहीं कहता।
करवा चौथ के व्रत में पीरियड्स आ जाएँ तो क्या करें?
ज़्यादातर परिवारों में करवा चौथ का व्रत नहीं तोड़ा जाता। सरगी, उपवास और चंद्रमा को देखकर व्रत खोलना — यह सब पहले की तरह चलता है। पूजा की थाली, करवा और मूर्ति का स्पर्श सास, ननद या पति कर देते हैं, और व्रत वाली स्त्री पास बैठकर हाथ जोड़े कथा सुनती है। चंद्रमा को अर्घ्य भी कई घरों में पति या परिवार का कोई सदस्य दिलवाता है। कथा सुनने पर रोक मुझे किसी ग्रंथ में नहीं मिली। करवा चौथ निर्जला होता है, इसलिए भारी पीरियड्स, चक्कर या कमज़ोरी हो तो पानी लेने में संकोच न करें — सेहत पहले है, और यह निर्णय परिवार के साथ बैठकर लें।
नवरात्रि में पीरियड्स आ जाएँ तो पूजा कैसे करें?
नवरात्रि के बीच पीरियड्स आने पर ज़्यादातर परिवारों में उपवास जारी रहता है, पर कलश, अखंड ज्योति और मूर्ति का स्पर्श परिवार का कोई और सदस्य संभालता है — आरती, भोग और ज्योत में घी डालना वही करता है। स्त्री दूर बैठकर दुर्गा सप्तशती का पाठ सुन सकती है, मन में मंत्र-जप कर सकती है, और आरती में हाथ जोड़कर शामिल हो सकती है। कन्या-पूजन या उद्यापन कई परिवार पीरियड्स ख़त्म होने के बाद के दिन पर करते हैं। अग्नि पुराण 174 में मूर्ति-स्पर्श पर प्रायश्चित्त की बात है, इसी कारण यह सावधानी रखी जाती है; पूजा देखने या सुनने पर रोक मुझे नहीं मिली।
क्या पीरियड्स में मंत्र जप या भगवान का नाम ले सकते हैं?
मन में नाम-जप, मंत्र-जप, प्रार्थना या ध्यान पर रोक मुझे तैत्तिरीय संहिता, वसिष्ठ धर्मसूत्र, मनुस्मृति या अग्नि पुराण में नहीं मिली। इन ग्रंथों के नियम अलग रहने, भोजन, घर के काम और मूर्ति-स्पर्श से जुड़े हैं, भगवान को याद करने से नहीं। इसीलिए जो परिवार इन दिनों मूर्ति-पूजा से दूर रहते हैं, वे भी मानस-जप को सही मानते हैं — माला से या बिना माला। कई संत और कथावाचक भी इन दिनों नाम-जप की सलाह देते हैं। भजन सुनना, कथा सुनना और आरती में हाथ जोड़कर शामिल होना भी आम है। भक्ति के लिए मंदिर जाना या मूर्ति छूना ज़रूरी नहीं।
पीरियड्स के कितने दिन बाद पूजा करनी चाहिए?
ग्रंथों में शुद्धि के दो रूप मिले। मनुस्मृति 5.66 (Bühler अनुवाद) के अनुसार स्राव रुकने के बाद स्नान से स्त्री शुद्ध होती है। पाराशर स्मृति (अध्याय 7) चौथे दिन स्नान से शुद्धि की बात करती है, और यह कि देव-पितृ कर्म स्राव पूरी तरह रुकने के बाद हो। वसिष्ठ धर्मसूत्र 5.5 रजस्वला को तीन दिन-रात अशुद्ध बताता है। इसलिए ज़्यादातर परिवारों में चौथे या पाँचवें दिन सिर धोकर स्नान के बाद पूजा फिर शुरू की जाती है। NHS के अनुसार पीरियड्स आमतौर पर 5 दिन, और 2 से 7 दिन तक चल सकते हैं — इसलिए कई स्त्रियाँ स्राव रुकने तक रुकती हैं। अपने परिवार की रीत के अनुसार चलें।
शास्त्रों में पीरियड्स को अशुद्ध क्यों कहा गया है?
यह धारणा तैत्तिरीय संहिता 2.5.1 की कथा से आई है, जिसमें इंद्र की ब्रह्महत्या का एक-तिहाई भाग स्त्रियों ने लिया और वह मासिक धर्म के रूप में प्रकट हुआ; यही कथा भागवत 6.9.9 में भी है। इसी आधार पर धर्मसूत्रों ने तीन दिन की अशुद्धि मानी। पर यही वसिष्ठ धर्मसूत्र 5.4 कहता है कि मासिक धर्म हर महीने स्त्री के पाप धो देता है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार यह शरीर की सामान्य प्रक्रिया है — UNICEF India के शब्दों में "period blood is not bad or impure", और WHO इसे शर्म की नहीं, स्वास्थ्य की बात कहता है। कामाख्या और रजो पर्व जैसी परंपराएँ इसे उर्वरता और जीवन से जोड़कर उत्सव भी मनाती हैं।

स्रोत और सावधानी: ग्रंथ प्रामाणिक स्रोतों से मिलाए गए — तैत्तिरीय संहिता 2.5.1 (अनुवाद: A. B. Keith; ऑनलाइन पन्ना पाठकों के लिए नहीं खुलता, इसलिए लिंक नहीं), श्रीमद्भागवत 6.9.9 (अनुवाद: A. C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada; साभार: Vedabase), वसिष्ठ धर्मसूत्र 5 और मनुस्मृति 4–5 (अनुवाद: Georg Bühler; साभार: sacred-texts.com), अग्नि पुराण 174 (अनुवाद: N. Gangadharan; साभार: wisdomlib.org); पाराशर स्मृति 7 का केवल नाम (अनुवादक का नाम नहीं मिला)। परंपराएँ: Wikipedia (Ambubachi Mela, Raja Parba, Menstrual taboo, Entry of women to Sabarimala); स्वास्थ्य: NHS, WHO, UNICEF India। तीन बातें साफ़ कह देना ज़रूरी है। पहली — पूजा, मंदिर-प्रवेश या व्रत पर शब्दशः निषेध इन ग्रंथों में नहीं मिला, और व्रत वाले नियम का मूल ग्रंथ-पन्ना भी नहीं मिला; यह खोज का नतीजा है, अंतिम निर्णय नहीं। दूसरी — हर मंदिर और परिवार की अपनी परंपरा है, उसका सम्मान करें। तीसरी — यह लेख किसी को व्रत रखने के लिए नहीं कहता और चिकित्सा-सलाह नहीं है; भारी पीरियड्स, चक्कर या कमज़ोरी में डॉक्टर से पूछें। किसी ब्रांड या दुकान की सिफ़ारिश नहीं।